सामान्यीकरण एवं प्रतिवेदन का प्रस्तुतीकरण - Generalization and Reporting

 सामान्यीकरण एवं प्रतिवेदन का प्रस्तुतीकरण - Generalization and Reporting


सामाजिक शोध का यह सबसे अंतिम लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चरण है। प्रतिवेदन के माध्यम से ही एक शोधकर्ता अनुसंधान से प्राप्त सभी तथ्यों को व्यवस्थित कर के जनसामान्य के सामने प्रस्तुत करता है। शोध प्रतिवेदन मुख्यतः तीन भागों में विभाजित होना आवश्यक है प्रथम भाग. पद्धतिशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य तथा अवधारणाओं के स्पष्टीकरण से संबंधित होता है। इस भाग में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सूचनाओं को प्राप्त करने के लिए निदर्शन का चुनाव किस प्रकार किया गया तथा अध्ययन के किन पद्धतियों को उपयोग में लाया गया। दूसरा भाग, सबसे अधिक विस्तृत होता है अध्ययन विषय के विभिन्न पक्षों से संबंधित तथ्य की विवेचना इस तरह की जाती है जिससे विभिन्न तथ्यों के बीच कारणात्मक संबंध स्थापित किए जा सकें।

इसी विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि किन्ही विशेष दशाओं के घटित होने के कारण क्या हैं तथा विभिन्न घटनाएं मानवीय संबंधों और सामाजिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। प्रतिवेदन का तीसरा भाग सामान्य निष्कर्ष से संबंधित होता है। इसी को हम सामान्यीकरण कहते हैं। उदाहरण के लिए. एम. एन. श्रीनिवास ने अपने अध्ययन के आधार पर यह सामान्यीकरण प्रस्तुत किया कि जिस क्षेत्र में संस्कृतिकरण का प्रभाव अधिक होता है, उसमें जातिय गतिशीलता उतनी ही अधिक होती है। इसी तरह मैक्स वेबर ने विभिन्न धर्मों का अध्ययन करते हुए यह सामान्य निष्कर्ष दिया कि किसी विशेष समाज की आर्थिक व्यवस्था वहां के धार्मिक आचारों की प्रकृति से प्रभावित होती है। तात्पर्य यह है कि सामान्यीकरण एक ऐसा निष्कर्ष है जो अध्ययन से प्राप्त होने वाली सामान्य प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। सामान्यीकरण के आधार पर ही पुराने सिद्धांतों का मूल्यांकन किया जाता है तथा नए सिद्धांतों को विकसित किया जाता है।

संपूर्ण शोध प्रतिवेदन की भाषा बहुत वैज्ञानिक और व्यवस्थित होना आवश्यक है। वास्तव में प्रतिवेदन में शोधकर्ता द्वारा जो निष्कर्ष दिए जाते हैं, उन्हीं के आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि शोध कार्य किस सीमा तक वैज्ञानिक है। प्रतिवेदन प्रस्तुत करते समय महत्वपूर्ण सांख्यिकीय तथ्यों को विभिन्न प्रकार के चित्रों द्वारा प्रस्तुत करना उपयोगी होता है जिससे साधारण व्यक्ति भी उसके अभिप्राय को समझ सके। प्रतिवेदन के अंत में, अध्ययन विषय को स्पष्ट करने के लिए जिन विद्वानों के कथनों अथवा उनके द्वारा दी गई सूचनाओं का उपयोग किया जाए. उनका उल्लेख संदर्भ सूची के रूप में करना आवश्यक होता है। इससे प्रतिवेदन में अधिक प्रामाणिकता आ जाती हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ महत्वपूर्ण लेकिन लंबी तालिकाओं तथा प्रश्नावली के प्रारूप आदि को परिशिष्ट के रूप में देना आवश्यक होता है।


उपयुक्त संपूर्ण विवेचन से स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक शोध एक लंबी प्रक्रिया है तथा इसके प्रत्येक स्तर पर शोधकर्ता के लिए अनेक सावधानियों को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। एक अध्ययनकर्ता शोध के विभिन्न चरणों के प्रति जितना अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है, उसकी सफलता की संभावना उतनी ही अधिक बढ़ जाती है।