समूह निर्माण - Group formation
समूह निर्माण - Group formation
समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि समूह का निर्माण कुछ विशेष कारको से होता है ऐसे कारको में निम्नांकित प्रमुख है-
1 - व्यवहार एवं मनोवृति में समानता बर्न (Byme) 1980, फ्लोर ( Flor) 1977, बेरोन ( Baron ) 1982 ने अपने अध्ययनों के आधार पर यह बतलाया कि जिन व्यक्तियों की मनोवृत्ति में समानता या एकरूपता होती है तो उनके व्यवहार में भी समरूपता होती है और तब ऐसे लोगों द्वारा आसानी से एक निर्णय कर लिया जाता है जैसे कक्षा में जिन छात्रों की मनोवृत्ति पढ़ाई के प्रति एक समान होती है उनका एक समूह का निर्माण जल्दी हो जाता है। उस समूह के सभी छात्र लगभग एक समान ढंग से व्यवहार भी करते पाए जाते हैं।
2 - स्थानिक समीपता - फेस्टिगर (feshtinger et al 1968) तथा उनके सहयोगियों का मत है कि समूह निर्माण का एक महत्वपूर्ण कारक स्थानिक समीपता होती है। जब व्यक्तियों के बीच स्थानिक समीपता होती है अर्थात वे एक ही जगह पर रहते हैं तो उनके बीच अंतर क्रिया अधिक होती है और उन्हें एक दूसरे को समझने का पर्याप्त मौका मिलता है। इन सब का परिणाम यह होता है
कि ऐसे व्यक्ति एक समूह में आसानी से संगठित हो जाते हैं। पास पड़ोस के लोगों द्वारा विभिन्न तरह के समूह का निर्माण किए जाने का प्रमुख कारण स्थानिक समय पता होती है
3- पूरक आवश्यकताएं या इच्छाएं समूह के निर्माण में पूरक आवश्यकताओं की भी भूमिका प्रधान होती है। जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता एक दूसरे से भिन्न होती हैं परंतु साथ ही साथ एक दूसरे के द्वारा जब उनकी पूर्ति की संभावना होती है तो ऐसे व्यक्तियों के एक समूह का निर्माण आसानी से हो जाता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति एक दूसरे के प्रति आकर्षित होती है। जैसे बेरोन 1978 तथा क्रश 1981 के अनुसार जब किसी व्यक्ति में पोषण की आवश्यकता तथा दूसरे व्यक्ति में निर्भरता की आवश्यकता हो तो ऐसे दोनों व्यक्ति एक दूसरे के प्रति काफी आकर्षित होंगे और उनसे एक समूह का निर्माण तेजी से होगा।
4- असुरक्षा एवं चिंता का भाव समूह के निर्माण सुरक्षा एवं चिंता की भाव की भी प्रधानता होती है। जब व्यक्ति में किसी कारण से और सुरक्षा तथा चिंता की भाव तीव्र मात्रा में उत्पन्न हो जाती है तो ऐसे लोगों में संबंधित आवश्यकता में वृद्धि हो जाती है और तब व्यक्ति दूसरों के साथ अधिक रहने की इच्छा व्यक्त करता है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति जब अन्य व्यक्ति के साथ होता है
तो उसकी चिंता तो घटती ही है साथ ही साथ अपनी चिंता के बारे में वह दूसरों को बतला कर काफी आफियत अनुभव करता है तथा उसका मन का बोझ हल्का दिखता है।
5- बाहरी धमकी- व्यक्तिगत उस समय समूह में संगठित हो जाते हैं, जब उन्हें किसी कार्य क्या तत्व से भारी खतरा प्राप्त होता है। भारी खतरा से बचने के लिए लोगों में आपसी भेदभाव को मिटा कर एक हो जाने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र हो जाती है। सांप्रदायिक दंगों के समय अक्सर देखा जाता है कि व्यक्तियों में अपने समुदाय के व्यक्तियों के साथ मिलकर विशेष समूह गठित करने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र हो जाती है।
6. कार्यात्मक एकता कार्यात्मक एकता के आधार पर भी समूह का निर्माण होता है। कार्यात्मक एकता से तात्पर्य व्यक्तियों के बीच किसी कार्यालय प्राप्ति के बारे में सहमति से होता है। लेवीन्थाल (levinthal, 1986) ने अपने अध्ययन के आधार पर यह बतलाया कि जब व्यक्तियों में कार्यात्मक एकता में वृद्धि हो जाती है
तो ऐसे लोगों का एक समूह काफी आसानी से विकसित हो जाता है जैसे, यदि आसपास के अधिकतर लोग यदि यही चाहते हैं कि अमुक स्थान में ही मंदिर का निर्माण किया जाए तो ऐसे लोगों का एक समूह बहुत तेजी से विकसित हो जाता है।
7- अधिक अंतर क्रिया- समूह निर्माण का एक सामान्य कारक व्यक्तियों के बीच की गई अंतर क्रियाओं की बारंबारता है। जब व्यक्तियों के बीच प्रायः अंत क्रिया अधिक बार होती है तो इससे उनमें आपस में बोधगमव्यताअधिक बढ़ जाती है जिसका परिणाम यह होता है कि उनमें आपस में संगठित होने की प्रवृत्ति पर हो जाती है और वे लोग आसानी से एक समूह का निर्माण कर लेते हैं। (Myers. 1989)
8- सामाजिक आर्थिक समानता जब व्यक्तियों में सामाजिक एवं आर्थिक स्तर की समानता होती है तो उनके द्वारा एक समूह का निर्माण आसानी से कर लिया जाता है। सामाजिक आर्थिक स्तर में समानता होने से उन्हें एक दूसरे के करीब होने का आकर्षण अधिक बढ़ जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि उनके द्वारा आसानी से एक समूह का निर्माण हो जाता है। (Spencer and Scales, 1979)
वार्तालाप में शामिल हों