स्वास्थ्य - Health
स्वास्थ्य - Health
समाज मनोविज्ञान के क्षेत्र में गए शोधों का एक मुख्य अनुप्रयोग व्यक्ति के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान में है। इसे ही स्वास्थ्य व्यवहार का मनोविज्ञान कहा जाता है। जिस तरह से नैदानिक मनोविज्ञान एवं समाज मनोविज्ञान एक साथ मिलकर सामुदायिक मनोविज्ञान का प्रारूप बनाते हैं और मानसिक कल्याण की समृद्धि के लिए कार्य करते हैं, ठीक उसी तरह से इन दोनों ही शास्त्रों आपस में मिलकर स्वास्थ्य देखरेख मनोविज्ञान के क्षेत्र में योगदान कर सकते हैं जिसका उद्देश्य दैनिक स्वास्थ्य कल्याण को समृद्ध करना होता है। टेलर (1999) के अनुसार इस मनोविज्ञान में स्वास्थ्य एवं मनोवैज्ञानिक चारों के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इस क्षेत्र के मनोवैज्ञानिकों का विश्वास है कि व्यक्ति के किसी विश्वास, मनोवृति एवं व्यवहार का उसकी बीमारी के उत्पन्न होने एवं उसके रोकथाम पर सार्थक प्रभाव पड़ता है। इससे एक संबंधित क्षेत्र जिसे वे व्यवहारात्मक औषध कहा जाता है, मैं इन बीमारियों के उत्पन्न होने तथा उनके रोकथाम में व्यवहारत्मक तथा जैवचिकित्सा (biomedical) ज्ञान को एक साथ संयोजित किया जाता है. जो सामान्यतः साधारण मेडिकल क्षेत्र के माने जाते हैं। स्वास्थ्य मनोविज्ञान तथा व्यवहार औषध दिन की शुरुआत (1970) वाले दशक में हुई थी.
ने स्वास्थ्य व्यवहार के अध्ययन में सैनिकों की भूमिका विशेषकर समाज मनोवैज्ञानिकों की भूमिका पर डाला है कि आजकल लगभग यहां स्थापित हो चुका है कि अधिकांशतः मृत्यु का कारण कोई छूता रोग नहीं होकर दोषपूर्ण जीवन शैली होता है जिसमें उचित सुधार मनोवैज्ञानिक ही कर सकते हैं। ऐसे जीवन शैली में सुधारात्मक उपायों के जरिए उन्नति लाई जा सकती है और तब व्यक्ति का स्वास्थ्य व्यवहार को संतुष्ट किया जा सकता है। अमेरिका में तो इस तरह के दोषपूर्ण जीवन शैली में सुधार लाने के लिए सरकार की ओर से एक विशेष प्रोजेक्ट जिसे हेल्दी पीपुल 2000 इनीशिएटिव ( Healthy people 2000 initiative) की संज्ञा दी गई है, सफलता पूर्वक चलाया जा रहा है।
स्वास्थ्य व्यवहार के क्षेत्र में किए गए अध्ययनों से कुछ प्रमुख तथ्य सामने आए हैं जिन्हें व्यक्तियों के स्वास्थ्य को उन्नत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसे कारक निम्नांकित है-
(i) मनोवैज्ञानिक तनाव से नकारात्मक दैनिक परिवर्तन उत्पन्न होते है।
(ii) सीखी गई स्वास्थ्य आदत (learned health habits) व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है
परंतु वे कभी-कभी हानिकारक भी साबित होते हैं।
(iii) व्यक्तित्व शील गुण व्यक्ति में विशिष्ट बीमारी करने में सहायक होते हैं।
(iv) व्यक्ति किस तरह से बीमारी से नहीं पड़ता है. वह उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना यह कि
वह किस तरह से स्वास्थ्य देखरेख तंत्र के साथ निपटता है।
(v) धूम्रपान करने वालों द्वारा करने वालों की अपेक्षा अल्कोहल तथा कॉफी का भी उपयोग किया जाता है।
स्वास्थ्य व्यवहार के क्षेत्र में किए गए अध्ययनो की समीक्षा से कुछ ऐसे मनोवैज्ञानिक कारक का पता चलता है जिनसे स्वास्थ्य देखरेख व्यवहार काफी प्रभावित होता पाया गया है। भारतीय मनोवैज्ञानिकों की भी इस क्षेत्र में अहम भूमिका रही है। इन सभी अध्ययनों के आलोक में निम्नांकित तीन कारकों को महत्वपूर्ण बतलाया गया है
1- जीवन आसेधक ( life stressors )
2- चित्तवृत्ति कारक ( Dispositional factors)
3- स्वास्थ्य जोखिम व्यवहार ( health risk behaviour)
1-जीवन आसेधक - इस क्षेत्र में किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती है जो आसेधक के रूप में होती हैं उससे स्वास्थ्य व्यवहार प्रभावित होते हैं। इस क्षेत्र में आरंभिक कार्य सेली 1956 तथा होल मॉस एवं राहे 1967' द्वारा किया गया तथा इन आसेधको से उत्पन्न तनाव को मापने के लिए इन लोगों ने मापनी भी विकसित किया। भारतीय संदर्भ में एम. अग्रवाल तथा नायडू. (1988) ने एक मापनी विकसित किया जिसका नाम stressful experiences of the past one year " रखा गया। इस मापनी के सहारे अध्ययन करके इन लोगों ने यह बात बताया कि अवांछित घटनाएं अपने आप में बीमारी के लक्षणों का सार्थक भविष्य वाची होता है। इन लोगों का मत था कि अवांछित घटनाएं व्यक्ति के आत्म संप्रत्यय एवं सामाजिक प्रतिमा को कूप्रभावित करता है जिनसे व्यक्ति में जीवन आसेधक के साथ निपटने की क्षमता कम हो जाती है। पुणे में दो अध्ययन ऐसे किए गए हैं जिनसे पता चलता है कि दिन प्रतिदिन के आसेधक किस तरह से मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
एक अध्ययन लिफोर. ईभास एवं पालसेन. (1991) तथा दूसरा अध्ययन लीफोर, पालसेन तथा ईबांस द्वारा (1571) में किया गया। इन अध्ययनों के आधार पर यह बतलाया गया कि चिर कालिक आसेधक जैसे गरीबी, बेरोजगारी, गंदी बस्ती में निवास तथा जन संकुलन का स्वास्थ्य व्यवहार दिन प्रतिदिन की तुलना में अधिक खराब होता है।
कुछ ऐसे भी अध्ययन किए गए जिनसे यह पता चलता है कि किसी बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों द्वारा किस तरह के जीवन आसेधको की अनुभूति की गई है। गुप्ता एवं श्रीवास्तव 1983 ने यक्षमा तथा छाती के रोगियों का एक साल तक अनुवर्ती अध्ययन किया पाया कि ऐसे रोगी जिन्होंने गत 1 साल की अवधि में कोई भी तनावपूर्ण घटना का अनुभव नहीं किया, उन में उन्नति के लक्षण उन रोगियों के तुलना में जिन्होंने ऐसी तनावपूर्ण घटना का अनुभव किया था, अधिक स्पष्ट पाए गए।
अय्यर तथा बागड़िया, 1986 ने न्यूरोडरमैटीटिस ( Neurodermatitis ) से ग्रस्त इस रोगियों के पारिवारिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करने पर कि ऐसे रोगी बाल्यावस्था में संवेगात्मक वंचन (emotional deprivation) से प्रभावित हुए थे. इनकी माताओं में व्यक्तित्व के असामान्य शील गुण थे तथा इनमें आरंभिक अवस्था से ही घबराहट की परिस्थिति में त्वचा को नोचने, रगड़ने आदि की आदत विकसित हो गई थी । इन अध्ययनों से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है कि कोई भी बीमारी के पीछे कोई एक आसेधक नहीं होकर अनेकों आरोधीकों का एक संचई प्रभाव होता है।
2- चित्तवृत्ति कारक- यहां मनोवैज्ञानिकों द्वारा फोटो के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि विभिन्न लोगों के रोगियों में किस तरह के व्यक्तित्व शील गुण शाह चरित होते हैं। हुसैन, मुरुगप्पान. (1992) ने एचआईवी धनात्मक रोगियों की तुलना एचआईवी नेगेटिव रोगियों की तुलना किया और पाया कि HIV रोगियों में चिंता, विषाद, स्नायु विकृति, मद्यपानता, दोष भाव, आत्महत्या सहसंबंध विचार आदि HIV नेगेटिव रोगियों के तुलना में अधिक थे।
उसी तरह से वैध. श्रीवास्तव एवं श्रीवास्तव, 1985 ने कैंसर रोगियों को हाइपरटेंशन रोगियों के साथ तथा दो नियंत्रित समूह जो आयु. योन एवं शिक्षा पर आधारित है. तुलना किया आया कि कैंसर तथा हाइपरटेंशन रोगियों द्वारा सामान्य प्रयोज्यों या नियंत्रित प्रयोज्यो की तुलना में स्नायु विकृत प्रवृत्ति अधिक थी।
इन अध्ययनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि विकृत स्वास्थ्य व्यवहार के साथ कुछ व्यक्तित्व कारक सहचरित होते हैं । कुछ अध्ययनों में यह देखा गया है कि एक विशेष तरह का व्यवहार पेटर्न टाइप ए. व्यवहार पैटर्न में कहा जाता है.
कोरोनरी हृदय रोग से संचालित होता है। टाइप ए व्यवहार पेटर्न एक ऐसा पेटर्न होता है जिसमें व्यक्ति में अत्यधिक प्रतियोगिता का भाव, समय पर कार्य करने की बाध्यता, किसी कार्य में जरूरत से ज्यादा आवेस्टन, ईर्ष्या, आक्रामकता आदि मुख्य रूप से दिखलाया जाते हैं। टाइप बी व्यवहार इसका विपरीत पैटर्न होता है जिसमें व्यक्ति अधिक तनाव मुक्त, दार्शनिक एवं खुशी की अवस्था में होता है। भाटिया तथा उनके सहयोगियों, 1990 ने सीएचडी (CHD) योग के 72% कैसेट में टाइप ए व्यवहार पेटर्न पाया । उसी तरह से गुलाम, गुप्ता, बंधोपाध्याय एवं मिश्रा, 1990 ने यह पाया कि CHD के रोगियों द्वारा टाइप ए व्यवहार के परीक्षण पर उच्च प्राप्तांक पाए गए।
चित्तवृत्त कारक सहसंबंध अध्ययन के आधार पर तब हम इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दैनिक स्वास्थ्य व्यवहार का साहचर्य व्यक्तित्व के विशेष तरह के शील गुण एवं व्यवहार पैटर्न के साथ भी होता है।
3- स्वास्थ्य जोखिम व्यवहार- स्वास्थ्य जोखिम व्यवहार से तात्पर्य वैसे व्यवहार से होता है जिसे व्यक्ति प्रायः आदतन अपने जीवन में करता है परंतु उससे उसे कोई बीमारी होने का जोखिम बढ़ जाता है।
। टेलर, 1991 ने अपने अध्ययन में पाया कि धूम्रपान एक ऐसा व्यवहार पैटर्न है जिससे कैंसर एवं हृदय रोग के होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। उनका दावा था कि इन रोगों से होने वाले मृत्यु का करीब 25% केसेज को धूम्रपान की आदत को छुड़ाकर बचाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कुछ अध्ययनों में मद्यपान तथा औषध व्यसन को भी प्रमुख जोखिम कारक माना गया है। पाई एवं गर्ग, 1984 ने अपने अध्ययन में 120 रोगियों के केस रिकॉर्ड की जांच किया और पाया कि मद्यपान से मूलतः वैसे पुरुष प्रभावित होते हैं की आयु 26 वर्ष से ऊपर होता है, विवाहित होते हैं तथा न्यूक्लियर परिवार में रहते हैं। इस प्रतिदर्श का करीब 50% से अधिक रोगियों में मद्यपानता तथा मानसिक बीमारी का इतिहास पाया गया। अहमद, रामालिंगम एवं अहमद, 1984 ने नई दिल्ली के नजदीक एक कैंप में कुछ पर्यटको पर जिसमें मॉरीशस तथा उत्तर अमेरिका के कॉलेज छात्र थे. का औषध व्यक्तियों का एक क्रॉस सांस्कृतिक अध्ययन किया। इस अध्ययन में यह पाया गया कि विभिन्न व्यक्तित्व आयामो पर कॉलेज छात्रों में विभिन्नता थी परंतु कोई निश्चित पैटर्न स्पष्ट रूप से देखने को नहीं मिला। गुप्ता एवं नलवा, 1986 ने हीरोइन व्यसनी की तुलना कॉलेज के ऐसे छात्रों से किया जिनमें किसी प्रकार का कोई व्यसन की आदत नहीं थी। परिणाम में देखा गया कि हिरोइन व्यसन को अपने माता पिता के साथ संबंध आत्मक समस्याएं थी तथा यहां तक कि अपने आत्म संप्रत्यय के साथ भी यह लोग ठीक ढंग से संबंध स्थापित नहीं कर पाते थे। हीरोइन व्यसनी का प्राप्तांक डर. दोस भाव आदि के माप पर तुलनात्मक रूप से अधिक था तथा आत्म संप्रत्यय की माप पर निम्न था।
निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वास्थ्य व्यवहार चाहे उसका संबंध मानसिक बीमारी से हो या दैहिक बीमारी से हो, निश्चित रूप से कुछ कार को जैसे जीवन आसेधक, चित्तवृत्ति तथा स्वास्थ्य जोखिम कारक आदि से प्रभावित होते हैं।
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