उच्च शिक्षा के उद्देश्य - higher education objectives

उच्च शिक्षा के उद्देश्य - higher education objectives


उच्च शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का संकलन करना, नवीन ज्ञान की खोज करना तथा ज्ञान का व्यापक प्रसार करना है। राधाकृष्णन आयोग (1952-53) के अनुसार विश्वविद्यालय शिक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है -


• प्रजातंत्र की सफलता के लिए कुशल नागरिक तैयार करना।


• विभिनन व्यवसायों, वाणिज्य, कृषि, उद्योग, राजनीति, प्रशासन आदि के लिए छात्रों को प्रशिक्षण देना।


• छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना। 


कोठारी आयोग (1964-66) के अनुसार उच्च शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित थे


• नेतृत्व का विकास करना। इसके लिए प्रतिभाशाली युवकों को खोजकर उन्हें मानसिक शक्ति, अभिरूचि, सुप्रवृति एवं नैतिकता का विकास करना।


• नवीन ज्ञान की खोज करना। सत्य की प्राप्ति के लिए निर्भय होकर कार्य करना तथा नवीन आवश्यकताओं व अन्वेषणों के सन्दर्भ में प्राचीन ज्ञान का विश्लेषण करना।


• कृषि, कला, विज्ञान तकनीकी चिकित्सा तथा अन्य व्यवयायों में निपुण एवं प्रशिक्षित नागरिक तैयार करना।


• शिक्षा द्वारा समानता व सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना तथा सांस्कृतिक एवं सामाजिक भिन्नताओं को कम करना।


• अध्यापकों तथा छात्रों में एवं उनके माध्यम से समस्त समाज में सत् जीवन के लिए आवश्यक मूल्य विकसित करना। 


नियंत्रण तथा प्रशासन भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना राज्यों की विधायिका या केंद्र को संसद के द्वारा पारित अधिनियमों के द्वारा की जा सकती है। विधायिका या संसद ही अधिनियमों के द्वारा विश्वविद्यालयों के स्वरूप कार्यक्षेत्र तथा कार्यों को परिभाषित करती है। यदपि विश्वविद्यालय एक स्वायत संस्था है फिर भी केंद्र एवं राज्य सरकार का परोक्ष नियंत्रण इनके ऊपर रहता है। विश्वविद्यालय संघ भी विश्वविद्यालयों के ऊपर क्रमश: आर्थिक तथा शैक्षिक नियंत्रण रखते हैं। किसी विश्वविद्यालय का आन्तरिक नियंत्रण मुख्य रूप से तीन परिषदों कार्यकारिणी परिषद कोर्ट तथा विद्या परिषद् के अधीन रहता है।


विश्वविद्यालय के प्रशासन के लिए विश्वविद्यालय का अधिकारी वर्ग मुख्य रूप से उत्तरदायी होता है। किसी विश्वविद्यालय के प्रमुख अधिकारी कुलाधिपति कुलपति कुलसचिव, वित्त अधिकारी, परीक्षा नियंत्रक, संकाय अध्यक्ष पुस्तकालयाध्यक्ष, अनुशासन अधिकारी होते हैं। शिक्षण कार्य में विभागाध्यक्ष की भूमिका मुख्य रहती है।


उच्च शिक्षा में मूल्यांकन - कुछ विश्वविद्यालयों में वार्षिक परीक्षा एवं कुछ विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर पद्धति से अध्यापन कार्य चल रहा है। इसमें बाह्य एवं आन्तरिक परीक्षा के माध्यम से वस्तुनिष्ठ लघु उत्तरीय एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्नो के माध्यम से छात्रों की योग्यता का मूल्यांकन किया जाता है।


स्वायत्तता - वर्तमान में विश्वविद्यालय स्वायत्तताहीन संस्थाएं बनकर रह गई है। विश्वविद्यालयों को कम से कम छात्रों के प्रवेश के संबंध में अध्यापको की नियुक्ति व पदोन्नति के सम्बन्ध में तथा पाठ्यक्रम के निर्माण के संबंध में पूर्ण स्वायत्तता होनी चाहिए।


अन्तर्विषयी अधिगमन - मनुष्य का पूरा ज्ञान एक अन्तरंग इकाई के रूप में रहता है। केवल अध्ययन की सरलता के लिए ज्ञान को हम विभिन्न विषयों या संकायों के रूप में बाट देते है। समान प्रकार के ज्ञान के समूह को किसी विशेष विषय के रूप में जाना जाने लगता है प्रत्येक विषय की अपनी कुछ मान्यताएं, धारणाएं तथा संकल्पनाएं होती है, जिनके आधार पर उस विषय के ज्ञान के भण्डार में वृद्धि होती है। परन्तु विषयों को बंद कमरों अलग-अलग बंद नही किया जा सकता किसी एक विषय के अध्ययन में दूसरे विषयों के ज्ञान की आवश्यकता होती है।

अन्तर्विषयी अधिगमन का उद्देश्य विभिन्न संकाय या विषयों को एक दूसरे के निकट लाकर उनमें परस्पर संबंध स्थापित करना है।


कार्य अनुभव - कार्य अनुभव को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। यह श्रम का सम्मान की भावना के बढ़ाने के साथ-साथ छात्र-छात्राओं की अभिरुचियों की अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करता है।


समन्वयात्मक संस्थाएं - उच्च शिक्षा एवं अनुसन्धान के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि कुछ ऐसी संस्थाएं हो जो उच्च शिक्षा में समन्वयन व गुणात्मक उन्नयन का कार्य कर सके। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय विश्वविद्यालय संघ तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् ऐसी ही समन्वयात्मक संस्थाएं है।


शैक्षिक सुधार - उच्च शिक्षा में शैक्षिक सुधार लाने के लिए अनेक व्यूह रचनाएं बनाई गई थी इनमें प्रवेश परीक्षा, अनुसंधान व पाठ्यक्रम उन्नयन की दिशा में अनेक सुधारों की अनुसंसा की गई। इसमें सेमेस्टर प्रणाली, क्रेडिट प्रणाली, श्रेयांम संचयन समान शैक्षिक कैलेण्डर, छात्र स्थान्तारण आदि के द्वारा शिक्षा के स्तर, सार्थकता व समान पहुँच को बढ़ाने अपेक्षा की जा रही है।


4.2.4.10. राष्ट्रीय शिक्षा नीति - 1968 में उच्च शिक्षा विश्वविद्यालय शिक्षा के संबंध में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में प्रावधान किये गये कि


• किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या, प्रयोगशालायों, पुस्तकालयों शिक्षकों एवं कर्मचारियों की संख्या एवं अन्य सुविधाओं को देखते हुए निश्चित करनी चाहिए।


• नये विश्वविद्यालयों की स्थापना में सावधानी रखनी चाहिए

इसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था एवं अच्छे शिक्षकों का होना आवश्यक है।


• स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के संगठन तथा इस स्तर पर प्रशिक्षण व अनुसंधान पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।


• उच्च अध्ययन केन्द्रों को मजबूत बनाया जाये उनमें प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान के अच्छे से अच्छे स्तर के लिए केन्द्रो के कुछ समूह बनाना चाहिए।


• विश्वविद्यालयों में अनुसंधान को अधिक सहायता देने की आवश्यकता है।


• विश्वविद्यालय स्तर पर अंशकालीन शिक्षा तथा पत्राचार पाठ्यक्रमों का बड़े पैमाने पर विकास किया जाना चाहिए।