हिंदू विवाह: एक धार्मिक संस्कार - Hindi Marriage A Religious Sacrament
हिंदू विवाह: एक धार्मिक संस्कार - Hindi Marriage A Religious Sacrament
हिंदू विवाह के उद्देश्य एवं विविध स्वरूपों से स्पष्ट है कि यह एक धार्मिक संस्कार है, कोई समझौता मात्र नहीं। हिंदू विवाह में प्रारंभ से लेकर अंत तक अनेक प्रकार के धार्मिक विधि विधानों, अनुष्ठानों एवं आदर्शों की प्रधानता पायी गयी है। हिंदू विवाह के उद्देश्यों से जीवन में धार्मिकता को एक पवित्र व अटूट बंधन माना गया है जिसे इच्छानुसार कभी भी तोड़ना अनुचित और पाप समझा जाता है। हिंदू विवाह व्यक्ति के जीवन को परिष्कृत करता है उसे आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित व अवसर प्रदान करता है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कर्तव्य पथ पर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। हिंदू विवाह की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
(1) विवाह का प्रमुख आधार धर्म (Religion as Main Basis of Marriage):
हिंदू विवाह के उद्देश्यों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि यहाँ विवाह का मुख्य आधार धर्म है।
प्रत्येक हिंदू के लिए अपनी पत्नी सहित पंच महायज्ञ करना आवश्यक कर्तव्य बताया गया है। हिन्दु धर्मशास्त्रों के अनुसार बिना पत्नी के काई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जा सकता। यहाँ विवाह मुख्य रूप से कर्तव्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है। डॉ. कपाड़िया ने उचित ही लिखा है, “यह स्पष्ट है कि जब हिंदू विचारकों ने धर्म को विवाह का प्रथम तथा सर्वोच्च उद्देश्य सन्तानोत्पाद को इसका दूसरा श्रेष्ठ उद्देश्य माना तो स्वभाविक रूप से विवाह पर धर्म का आधिपत्य हो गया। विवाह की इच्छा रति या संतानोत्पत्ति के लिए इतनी अधिक नहीं की जाती थी जितनी अपने धार्मिक कर्तव्यों के पालनार्थ के लिए एक साथी प्राप्त करने के लिए।"
विवाह का दूसरा उद्देश्य संतानोत्पत्ति माना गया। मोक्ष प्राप्ति के लिए परिवार में पुत्र का होना आवश्यक समझा जाता था। विवाह का तीसरा उद्देश्य रति जिसे अधिक महत्व नहीं दिया गया, इसलिए इसका स्थान सबसे निम्न है। इस विवरण से स्पष्ट है कि विविध धार्मिक क्रियाओं के संपादन की दृष्टि से विवाह एक आवश्यक संस्कार है।
(2) विवाह की अविच्छेद प्रकृति (Irrevocable Nature of Marriage):
हिंदू विवाह एक ईश्वर-इच्छित पवित्र बंधन के रूप में माना जाता है जो कभी तोड़ा नहीं जा सकता। हिंदू विवाह में बँधने वाले लोग मृत्यु पर्यन्त तक एक-दूसरे से बँधे रहते हैं। विवाह हिंदू धर्म में जन्म-जन्मांतर का संबंध माना गया है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि जन्म जन्मांतर के साथी फिर से मिल जाते हैं। विवाह की इस अविच्छेद प्रकृति के कारण ही पति-पत्नी एक-दूसरे से अनुकूलन करने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ व्यक्ति को सामंजस्य द्वारा विवाह को सफल बनाने के लिए प्रेरित किया गया है। दाम्पत्य जीवन में त्याग को महत्व देते हुए एक-दूसरे के अनुसार स्वयं को परिवर्तित करने का प्रयत्न करते हैं। इसी कारण संभवतः प्राचीन भारतीय परिवार में दाम्पत्य जीवन में संभवतः संघर्ष व अलगाव की संभावना नहीं पायी जाती थी अतः यह एक धार्मिक रूप से पवित्र गठबंधन है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता।
(3) ऋणों से मुक्त होने हेतु विवाह आवश्यक (Marriage essential for Getting Rid of Rins):
धर्मशास्त्रों में विवाह को स्वर्ग का द्वार माना गया है। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए विवाह आवश्यक है
और बिना गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किए ऋणों से मुक्त होना संभव नहीं है। व्यक्ति पर जन्म से अनेक ऋण रहते हैं और विवाह करके ही वह पंचमहायज्ञों द्वारा विविध ऋणों से छुटकारा पा सकता है। विवाह द्वारा पत्नी प्राप्त किए बिना व्यक्ति वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम के दायित्वों को भी पूर्ण नहीं कर सकता। धार्मिक साहित्य में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि विवाह किए बिना तपस्वियों एवं ऋषियों तक को स्वर्ग प्राप्त नहीं हो सकता।
(4) विवाह के लिए आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान एवं संस्कार (Necessary Rituals and Ceremonies for Marriage):
पी.वी.काणे कहते थे कि हिंदू विवाह संपन्न होने के लिए लगभग 39 प्रमुख अनुष्ठानों एवं संस्कारों की आवश्यकता होती है। इन धार्मिक कृत्यों को पूर्ण किए बिना हिंदू विवाह संपन्न नहीं माना जाता। ये सब कृत्य धार्मिक विश्वासों से परिपूर्ण है और इससे स्पष्ट पता चलता है कि वैवाहिक जीवन में धार्मिक कृत्यों को प्रधानता दी गयी है। यहाँ विवाह से संबंधित कुछ प्रमुख संस्कारों का वर्णन किया किया जा रहा है ताकि विवाह की धार्मिक प्रसंस्कारों का वर्णन किया जा रहा है ताकि विवाह की धार्मिक प्रकृति को समझा जा सके
वाग्दान:- इस अनुष्ठान में वर पक्ष की तरफ से रखा गया विवाह प्रस्ताव कन्या पक्ष द्वारा स्वीकार किया जाता है। वैदिक मन्त्रों एवं गृह सूत्रों में वर पक्ष द्वारा विवाह का प्रस्ताव रखने एवं कन्या पक्ष द्वारा इसे स्वीकार करने की व्यवस्था पायी जाती है परंतु आजकल प्रस्ताव कन्या पक्ष द्वारा किया जाता है व स्वीकृति वर पक्ष देता है।
कन्यादान:- पिता अपनी पुत्री को धार्मिक भाव से धार्मिक अनुष्ठानों व मंत्रों के साथ पति को समर्पित करता है और पति इसी भाव से इसे स्वीकार करता है। यहाँ पिता अपनी कन्या को दान के रूप में देता हुआ वर से यह आश्वासन मांगता है कि वह धर्म, अर्थ और काम की पूर्ति में कभी भी अपनी पत्नी का त्याग नहीं करेगा तथा पत्नी भी यह प्रण लेती है कि वह आजीवन अपने पति की संगिनी बनी रहेगी।
विवाह होम:- पवित्र अग्नि की साक्षी में विवाह संपन्न होता है। वर एवं वधु अग्नि में अनेक आहुतियाँ देते हैं। इस समय यह प्रार्थना की जाती है
कि अग्नि कन्या की रक्षा करें, उसकी संतान को परमात्मा लंबी आयु दे, वह जीवित रहने वाली संतान की माता से और पुत्र संबंधी सभी आनंद प्राप्त करे। अग्नि को देवता मानकर उसे आहुतियाँ देकर एक समृद्ध और आदर्श गृहस्थ जीवन की कामना की जाती है।
पाणिग्रहण:- पाणिग्रहण का तात्पर्य दूसरे के हाथ को ग्रहण करना है। इसमें वर वधू का हाथ पकड़कर सात मंत्रों का उच्चारण करता है। ये मंत्र प्रतिज्ञा के रूप में है। वर वधू से कहता है कि, “मैं तेरा हाथ पकड़कर सुख की इच्छा करता हूँ. वृद्धावस्था तक तू मेरे साथ रहना, तेरा पोषण करना मेरा धर्म है और मेरे संतान को जन्म देते हुए तूम सौ वर्षों की दीर्घायु प्राप्त करना।" इन पवित्र वेद मंत्रों से जहाँ गृहस्थ आश्रम के दायित्वों का बोध होता है वहीं यह भी स्पष्ट होता है कि विवाह एक धार्मिक संस्कार है।
अग्नि परिणयन:- इसमें वर व वधु अग्नि की परिक्रमा करते हैं और अग्नि को साक्षी मानकर वर कहता है कि, “मैं सामवेद के समान प्रशंसित हूँ तू ऋग्वेद के समान प्रशंसित है, तू पृथ्वी और मैं सूर्य के समान हूँ. हम दोनों प्रसन्नतापूर्वक विवाह करें, साथ मिलकर उत्तम प्रजा उत्पन्न करें, हमारे बहुत से पुत्र हों. हम और हमारे पुत्र सौ वर्षों तक जीवित रहें।"
अश्यारोहण:- इसके अंतर्गत कन्या का भाई कन्या का पैर उठाकर पत्थर की शिला पर रखवाता है। इस अवसर पर वर वधू से कहता है कि हे देवी-तू इस पत्थर पर चढ़ और इस पत्थर के समान ही धर्म कार्यों में से दृढ़ बनी रहे। यहाँ वधू से सब परिस्थितियों में दृढतापूर्वक मुकाबला करने के लिए कहा गया है।
लाजाहोम:- इसमें वर वधू पूर्व दिशा की ओर मुँह करके खड़े हो जाते हैं फिर वधू अपने भाई से खील (भूना हुआ चावल) लेकर अग्निकुंड में डालते हुए तीन मंत्रों का उच्चारण करती हैं।
कन्या ईश्वर की आज्ञा पालन के लिए पिता को छोड़कर प्रतिकुल में जाने को तैयार है। वह देवताओं से प्रार्थना करती है कि उसका पति दीर्घजीवी हो, पिता व पति दोनों पक्ष धन-धान्य से परिपूर्ण हो तथा पति के साथ उसका प्रेम सर्वदा बढ़ता रहे।
सप्तपदी-ग्रन्थि:- बंधन किए हुए वर वधू का उत्तर दिशा की ओर सात पैर चलना ही सप्तपदी है। प्रत्येक पैर साथ-साथ बढ़ते हुए मंत्रोंच्चारण किया जाता है। इन सात मंत्रों में वर वधू की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व स्वयं ग्रहण करता है और अन्न प्राप्ति, शारीरिक व मानसिक बल, धन, सुख, संतान, प्राकृतिक सहायता व सखा भाव की कामना करता है। यहाँ यह भी कामना की जाती है कि उन दोनों के मन एक-दूसरे के अनुकूल बना रहे। के
इन सब धार्मिक विधियों को संपन्न करने के पश्चात ही हिंदू विवाह पूर्ण माना जाता है। इन विधियों पर आधारित हिंदू विवाह निश्चित रूप से धार्मिक संस्कार है।
(5) पतिव्रता का आदर्श (Ideal of Pativrata):
हिंदू विवाह के द्वारा पत्नी आदर्श पतिव्रता के रूप में कार्य करती है। पति की सेवा और उसकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना वह अपने जीवन का प्रथम कर्तव्य समझती है। वह पति को परमेश्वर के रूप में मानती हुई उसकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखती है और उसके लिये हर प्रकार का त्याग करना अपना परम धर्म समझती है। पतिव्रता का यह आदर्श विवाह की धार्मिक प्रकृति को व्यक्त करता है।
(6) पत्नी के लिए संबोधक शब्द (Addressing Words for Wife):
पत्नी के लिए सम्बोधक शब्द से यह भी ज्ञात होता है कि विवाह रति अर्थात् काम इच्छाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि धार्मिक कृत्यों को पूर्ण करने के लिए किया गया है। पत्नी के लिए धर्म-पत्नी, सह धर्मचारिणी आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इन शब्दों का तात्पर्य धार्मिक कार्यों में सहयोग देने वाली पत्नी से है।
(7) स्त्री के लिए एक मात्र संस्कार (The Only Sanksar for Women):
एक हिन्दु पुरूष अपने जीवन काल में अनेक प्रकार के संस्कार संपन्न करता है। इन संस्कारों से उसका शुद्धिकरण एवं व्यक्तिगत का विकास होता है। किंतु स्त्री के जीवन काल में विवाह ही एक मात्र संस्कार है. अन्य संस्कार उसके द्वारा नहीं किए जाते
(8) ब्राह्मणों की उपस्थिति (Presence of Brahmins):
हिंदू समाज व्यवस्था में ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। विवाह कार्य, उन्हीं के द्वारा संपन्न कराया जाता है। किसी कार्य में ब्राह्मण की उपस्थिति उस कार्य की पवित्रता एवं गरिमा को बढ़ाने वाली होती है।
(9) वेद मंत्रों का उच्चारण (Recitation of Vedi Mantas):
विवाह के समय वैदिक रीति-रिवाजों का पालन और वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।
वेदों को हिंदुओं में बहुत ही पवित्र माना जाता है और उनमें जो कुछ लिखा है, वह ईश्वर के मुख से निकले वाक्य माने जाते हैं। अतः वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी विवाह को धार्मिक संस्कार बनाने में योग देता है।
(1.) अग्नि की साक्षी (Presence of Fire):
ब्राह्मणों एवं वेदों की भाँति अग्नि को भी पवित्र माना गया है। इसकी साक्षी में ही वर-वधू विवाह में बंधन मे बांधते हैं। विवाह के समय जो अग्नि प्रज्वलित की जाती है, उसको गृहस्थ सदैव अपने घर में जलाये रखते हैं। साथ ही वर-वधू के सुख एवं संपन्न जीवन के लिए अग्नि से कई प्रकार की प्रार्थना की जाती है।
इन तथ्यों से हिंदू विवाह की धार्मिक प्रकृति स्वतः ही स्पष्ट है, अतः यह कहा जा सकता है कि यह एक धार्मिक संस्कार है। इसे एक सामाजिक समझौता नहीं माना जा सकता। इतना अवश्य है कि आधुनिक कानून के रचयिताओं ने कुछ अंशो में इसे एक समझौता माना है, परंतु न्यायालयों ने इसे एक संस्कार के रूप में स्वीकृति दी है। हिंदू कानून से संबंधित ग्रन्थों में बताया गया है कि सभी हिंदुओं के लिए, चाहे वे किसी भी जाति के क्यों न हो, विवाह एक आवश्यक संस्कार या धार्मिक कृत्य है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 द्वारा यद्यपि स्त्री पुरुषों को विवाह-विच्छेद का अधिकार प्राप्त हो चुका है, तथापि विवाह, विवाह-विच्छेद का अधिकार प्राप्त हो चुका है तथापि विवाह को मात्र समझौता नहीं मानकर एक संस्कार के रूप में माना जाता है। पी.एच. प्रभु ने हिंदू विवाह की प्रकृति के संबंध में लिखा है- "हिंदू के लिए विवाह एक संस्कार है तथा इस कारण विवाह संबंध में जुड़ने वाले पक्षों का संबंध संस्कार रूपी है न कि प्रसंविदा की प्रकृति का।"
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