हिंदू विवाह: अर्थ एवं परिभाषा - Hindu Marriage: Meaning and Definition

हिंदू विवाह: अर्थ एवं परिभाषा - Hindu Marriage: Meaning and Definition


हिंदू विवाह एक धार्मिक संस्कार के रूप में हिंदू जीवन को स्थायित्व प्रदान करता है। “शतपथ ब्राह्मण" में कहा गया है कि पत्नी निश्चित रूप से पति का अर्धाश है। अतः जब तक पुरूष पत्नी प्राप्त नहीं करता एवं संतान उत्पन्न नहीं करता तब तक वह पूर्ण नहीं होता। हिंदू विवाह ने जहाँ एक ओर व्यक्ति को मानसिक स्थिरता, त्यागमय जीवन की प्रेरणा और व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के समाजीकरण में योग दिया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक जीवन को व्यवस्थित बनाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


हिंदू विवाह संस्था का सामाजिक संरचना में एक विशिष्ट स्थान है। यह पूरे भारतीय सामाजिक व्यवस्था की आधार शिला है क्योंकि विवाह के द्वारा एक व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है जो अन्य सभी आश्रमों का मूल है। प्रत्येक हिंदू के लिए विवाह एक अनिवार्य कर्तव्य माना गया है। हिंदुओं में चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की व्यवस्था की गयी है।

जिनकी पूर्ति गृहस्थ आश्रम में ही संभव है। इस प्रकार हिंदू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति पर तीन ऋण-पितृ ऋण, देव ऋण, ऋषि ऋण चुकाने का भार माना गया है। इन सभी ऋणों से मुक्त होने के लिए विवाह करके संतानोत्पत्ति करना आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार पति-पत्नी व बच्चों से युक्त मानव ही संपूर्ण मानव है। वेदों में अविवाहित पुरूष व स्त्री को अपवित्र माना गया है क्योंकि वह धार्मिक दृष्टि से अपूर्ण है तथा संस्कारों में भाग नहीं ले सकता है। अतः ऐसा माना जा सकता है कि हिंदू विवाह धार्मिक कर्तव्यों की पूर्ति, पुत्र प्राप्ति, पारिवारिक सुख, सामाजिक एकता, पितृ ऋण से मुक्ति, पुरुषार्थ की पूर्ति, समाज की निरंतरता, सामाजीकरण, लालन-पोषण इत्यादि के उद्देश्य से किया जाता है।


हिंदू विवाह की परिभाषाएं (Definitions of Hindu Marriage)


आर. एन. शर्मा:- हिंदू विवाह की परिभाषा एक धार्मिक संस्कार के रूप में की जा सकती है जिसमें धर्म, संतानोत्पत्ति तथा रति के भौतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक उद्देश्यों से एक स्त्री और एक पुरुष स्थायी संबंध में बंध जाते हैं। 


मेघातिथ के अनुसार, "विवाह कन्या को पर बनाने के लिए एक निश्चित क्रम में की जाने वाली अनेक विधियों से संपन्न होने वाला पाणिग्रहण संस्कार है जिसकी अंतिम विधि सप्तर्षि दर्शन है।" 


डॉ. के. एम. कपाडिया, के अनुसार विवाह प्राथमिक रूप से कर्तव्यों की पूर्ति के लिए होता है इसलिए विवाह का मौलिक उद्देश्य धर्म था। हिंदू विवाह को परिभाषित करते हुए आप लिखते हैं कि हिंदू विवाह एक संस्कार है।"


इस प्रकार हिंदू विवाह स्त्री पुरुषों का पति-पत्नी के रूप में एक अलौकिक, अविच्छेद और शाश्वत मिलन है जिसे तोड़ना अधार्मिक माना जाता है। इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखना होगा कि हिंदूओं में एक विवाह को ही आदर्श माना गया है।