ऐतिहासिक भौतिकवाद - Historical Materialism

ऐतिहासिक भौतिकवाद - Historical Materialism


कार्ल मार्क्स के समाज संबंधी विचारों का अधिकांश विद्वानों ने विशेष रूप से लेफेब्रू ने ऐतिहासिक भौतिकवाद शीर्षक से विश्लेषण किया है। यह शब्दावली कार्ल मार्क्स ने कभी प्रयोग नहीं की। समाज एवं सामाजिक घटनाओं की व्याख्या के लिए इतिहास की व्याख्या जरूरी है। इतिहास की व्याख्या द्वंद्वात्मकता के आधार पर हो। मूल सिद्धांत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है। इसके आधार पर मार्क्स ने भौतिक जगत एवं सामाजिक जगत, दोनों का ही विश्लेषण किया। इन दोनों विश्लेषणों एवं अध्ययनों का चरित्र जरूर अलग है। भौतिक जगत का विश्लेषण प्राकृतिक विज्ञानों के आधार पर ठोस, वस्तुनिष्ठ एवं मूल्य निरपेक्ष ढंग से होता है। सामाजिक जगत का विश्लेषण सुसंगत एवं ठोस तो होता है, परंतु यह मूल्य निरपेक्ष नहीं हो सकता है।


सामाजिक जगत के विश्लेषण एवं अध्ययन का सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद है। द्वंद्वात्मकता का अर्थ है यथार्थ संपूर्ण होता है एवं इसका आकलन संपूर्णता में ही संभव है। मार्क्स ने समाज का अध्ययन संपूर्णता में किया है। यथार्थ जटिल है। इसके तत्वों को अलग करना संभव नहीं है।

समाज के तत्वों को भी अलग करना संभव नहीं है। सामाजिक जगत का एक स्थिति नहीं प्रक्रिया है। यह स्थिर नहीं होता। इसमें जो स्थिरता दिखती है वह सापेक्षित स्थिरता है। द्वंद्वात्मकता का अर्थ है दो विरोधी शक्तियों में संघर्ष एवं सहयोग की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया संघर्ष का पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है। यही परिवर्तन का कारण है। परिवर्तन आरंभ में बहुत ही सामान्य अर्थात् संख्यात्मक होते हैं। परिवर्तन के संग्रह एवं पकने से गंभीर एवं गुणात्मक परिवर्तन होते हैं। परिवर्तन क्रमिक नहीं, उछाल वाला होता है। परिवर्तन असमान. ऊबड़-खाबड़ और हिंसक होता है एक समाज में सबसे गंभीर परिवर्तन सामाजिक क्रांति होती है। प्रत्येक व्यवस्था को समाप्त होना है। हर चीज पुरानी होकर खत्म होती है। कार्ल मार्क्स की शब्दावली में इसे नकारात्मकता की नकारात्मकता (Negation of negation) कहते हैं।