मनुष्य संज्ञानात्मक भावात्मक प्राणी - human cognitive affective animal
मनुष्य संज्ञानात्मक भावात्मक प्राणी - human cognitive affective animal
यह बात आश्चर्यजनक नहीं है कि व्यक्ति पूर्णतः तार्किक रूप से सामाजिक अनुमान नहीं करता । सामाजिक जीवन में बहुधा तर्क से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति कि भावनायें होती हैं। प्रायः लोग प्रामाणिक तथ्यों की अवहेलना कर भावनात्मक आधार पर सामाजिक निर्णय लेते हैं। लेयन्स (1983) तथा मिल्लर एवं कैटर (1982) ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक संज्ञान और सामाजिक अनुक्रियाओं में लोग सांख्यिकीय रीति से प्रमाणित तथ्य को सही ना मानकर अपने मित्रों की अतार्किक बातों को सत्य मान लेते हैं।
उपर्युक्त अभिग्रहों की उत्पत्ति सामाजिक संज्ञान के अध्ययनों के इतिहास में अलग-अलग समयों पर हुई। शोधकर्ताओं ने इन अभिग्रहों में किसी एक को वरीयता देकर सामाजिक संज्ञान अर्जन में निहित प्रक्रमों का अध्ययन किया है। ये अभिग्रह एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी परस्पर विरोधी न होकर एक दूसरे के पूरक हैं।
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