मानवाधिकार आयोग - Human rights commission
मानवाधिकार आयोग - Human rights commission
भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का एक लम्बा इतिहास है। आधुनिक काल में भारत में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष आजादी से काफी पहले ही प्रारंभ हो गया था। तत्कालीन समय में कांग्रेस पार्टी ने आम भारतीयों के मानवाधिकारों के लिए काफी संघर्ष किया और इस सम्बन्ध में कई प्रस्ताव सरकार को सौंपे गए। भारत को अंग्रेजो की दासता से मुक्ति मिली तो लोगों ने मानवाधिकारों के लिए कई मांगें सरकार के सामने रख दी तदुपरांत सरकार ने आम जनता के मानवाधिकारों को संरक्षण प्रदान करने के लिए कानून में कई प्रावधान किये। धीरे धीरे मानवाधिकारों की स्थिति सुधरने लगी लेकिन 1975 के आस पास भारत में मानवाधिकारों को गहरा धक्का लगा। सन् 1975 से 1977 तक देश भर में लगे राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान लोगों के मानवाधिकारों का बुरी तरह हनन किया गया।
यदि हम इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि 1920 के दशक में पंडित नेहरू और उनके सहयोगियों द्वारा नागरिक स्वतंत्रता संघ को गठित किया गया। इस संगठन ने आम लोगों के मानवाधिकारों के लिए संघर्ष किया और लोगों की बात सरकार के सामने रखी। इसके कुछ समय बाद मद्रास में भी ऐसे संगठनो की स्थापना की गई जिसके नागरिकों को स्वतंत्रता संगठन कहा गया तदुपरांत आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र नागरिक स्वतंत्रता समीति की स्थापना की गई। धीरे-धीरे भारत के दूसरे राज्यों में भी मानवाधिकार संगठनों की स्थापना होने लगी। बाद के वर्षों में 1983 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने सरकार से एक राष्ट्रीय एकाकी मानवाधिकारवादी आयोग की स्थापना करने की सिफारिश की। इस सम्मलेन में यही मांग की गई कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना जल्द से जल्द की जाए।
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