मानवाधिकार सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ - Human Rights Social, Cultural and Historical Context
मानवाधिकार सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ - Human Rights Social, Cultural and Historical Context
आजादी से पहले भारत में मानवाधिकारों की स्थिति काफी खराब थी लेकिन आजदी के पहले से ही मानवाधिकारों की मांग उठने लगी थी। इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि भारत की संस्कृति पांच हजार साल से भी अधिक पुरानी है। इतिहास के इस लंबे काल खंड के दौरान भारत में मानवाधिकार एक परंपरा के रूप में जीवित रहा है। कुछ लोगों का तो कहना है कि मानव अधिकारों की उत्पत्ति कहीं न कहीं भारतीय संस्कृति व सभ्यता से ही हुयी है। इन लोगों का कहना है कि अंग्रेजी के 'राइट' के हिंदी पर्याय 'अधिकार में कहीं अधिक अधिकार समाये हुए हैं अर्थात् अधिकार अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मानवाधिकारों की अवधारणा पूर्णत: पश्चिमी नहीं है अपितु इसमें कहीं न कहीं कुछ भारतीय भी सम्मिलित है।
भारत प्राचीन काल से ही एक धार्मिक देश रहा है और यहां धर्म को सदैव से ही सर्वाधिक महत्व दिया जाता रहा है। यह मानवाधिकारों का महत्व ही है कि भारतीय धर्म में भी मानवाधिकारों को पर्याप्त महत्व दिया गया है। कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता का धर्म की अवधारणा में ही व्यापक मानवीय सामाजिक व्यवस्था के रूप में मानव अधिकारों का उल्लेख भी किया गया था। इस प्रकार पश्चिमी आधुनिक विचारधारा एवं प्राचीन भारतीय धर्म के रूप में मानव अधिकारों की संकल्पना की गयी थी। कहा जा सकता है कि मानवाधिकार की अवधारणा प्राचीन भारतीय सभ्यता में भी विचारणीय थी। उस समय हमारे यहां सनातन धर्म का प्रभाव था सनातन धर्म का विधान न केवल धार्मिक एवं नैतिक विचार था अपितु राजा के व्यवहारों, दण्ड विधानों को भी संतुलित करता था। प्राचीन भारतीय समाज में विधि के सक्षम समता व समानता का पालन का किया जाता था। यह अवधारणा भी मानवाधिकार से ही ओतप्रोत थी। और तो और प्राचीन भारत में युद्धकाल के दौरान भी प्राकृतिक मानव अधिकारों का पालन किया जाता था।
उस समय शाम ढलते ही स्वतः ही युद्ध विराम हो जाता था और फिर कोई किसी दुश्मन सैनिर हमला नहीं करता था। इसी प्रकार युद्ध बंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाता था और उन्हें बेवजह तंग नहीं किया जाता था। प्रसिद्ध महाभारत का तो सूत्र वाक्य ही "मानव से बड़ा कुछ भी नहीं हैं" था। स्पष्ट है कि उस समय मौलिक मानवाधिकारों को काफी महत्व दिया जाता था। श्री भगवत गीता में भी मानव के लिए उसके कर्तव्यों को सर्वोपरि माना गया है। प्रकार जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर महावीर ने भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बल दिया था। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य तो अपने मानवाधिकार संबंधी कार्यों के लिए दूर-दूर तक विख्यात थे। चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधान मंत्री कौटिल्य ने अपने महाग्रंथ अर्थशास्त्र में आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक विधानका निर्धारण किया था। उनका कहना था कि राजा प्रज्ञा के हित के लिए ही होता है इसलिए राजा को सदैव प्रजा के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करना चाहिए। सम्राट अशोक का राजदर्शन भी मानवीय सिद्धांत पर आधारित था। वे दया, मानवता, करूणा और प्रेम पर बल देते हुए मानवाधिकारों के सच्चो पोषक के रूप में काम करते थे।
यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि मानवाधिकारों का प्रश्न तभी उठता है जब किसी के अधिकारों का दमन होता है। जैसे-जैसे अत्याचार बढ़ते हैं वैसे-वैसे मानवाधिकारों की मांग भी जोर पकड़ने लगती है। प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था, वर्ण आधारित थी। पूरी सामाजिक संरचना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों में विभाजित थी। यहां निचले स्तर के वर्ण अर्थात् वैश्या एवं शुद्र पर लगातार अत्याचार किये जाते थे। इस सामाजिक व्यवस्था में अन्याय एवं शोषण का जोर था और इसलिए वहां मानवाधिकारों के पक्ष में भी आवाज थी। इसके बाद आया मध्यकाल हालांकि भारतीय इतिहास का मध्याकाल अपनी बर्बरता के लिए जाना जाता है लेकिन उस प्रतिकूल माहौल में मानवाधिकार किसी न किसी रूप में मौजूद थे। मुगल शासक अकबर और जहांगीर की न्यायाप्रियता तो दूर-दूर तक विख्यात थी। ये दोनों मुगल शासक प्रजा के मानवाधिकारों के प्रति काफी सजग रहते थे। सम्राट अकबर ने अपनी धार्मिक नीति 'दीन-ए-इलाही के द्वारा प्रजा को धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया।
इसी प्रकार मध्यकाल का भक्ति आंदोलन एक व्यापक मानवीय आंदोलन था। जिसमें सारा जोर मानवके प्राकृति अधिकारों पर था। भक्ति आंदोलन का एकमात्र उद्देश्य था सभी प्रकार के भेदभाव को भूल कर प्रेम एवं सहयोग करना। आधुनिक काल में आम जनता के मानवाधिकारों को नई ऊँचाईयां मिलीं। इस दौर में विभिन्न सामाजिक बुराईयो जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, बहुपत्नी प्रथा, जाति प्रथा और अस्पृश्यता के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन खड़ा किया गया। इस दौर के समाज सुधारकों में स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, राजा राम मोहन राय. ज्योतिबा फुले और नारायण गुरू जैसे लोग प्रमुख थे। इन सभी समाज सुधारकों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाया। भारतीय इतिहास के आधुनिक काल में देश विदेशी ताकत का गुलाम था और हमारे यहां स्वतंत्रता आंदोलन पूरे जोर शोर से चल रहा था। आजादी की इस लड़ाई के दौरान सन् 1928 में नेहरू रिपोर्ट' प्रकाश में आयी जिसमें मानवाधिकारों की बात की गयी थी। इसके बाद कांग्रेस का अधिवेशन करांची में हुआ। अधिवंशन के बाद 'कराची प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें हिन्दुस्तानीयों के मानवाधिकारों की बात जोर-शोर से उठाया गया था।
आजादी के साथ ही शासन की बागडोर भारतीयों के हाथ में आ गयी और अंग्रेजी कानून को हटा कर भारतीय कानून लागू कर दिया गया। भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ और हम एक गणतंत्र बन गए। भारतीय संविधान में भी मानवाधिकारों को पर्याप्त स्थान दिया गया था।
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