वर्ग संघर्ष में विचारधारा - ideology in class struggle

वर्ग संघर्ष में विचारधारा - ideology in class struggle


लेफेब्रे ने कहा कि विचारधाराएँ बराबर ही वास्तविकता का एक उल्टा अथवा टेढ़ा-मेढ़ा प्रस्तु करती हैं। विचारधाराओं का स्वतंत्र अस्तित्व होता है. यह आम लोगों को प्रभावित करती है। इससे आम लोग दबाए जा सकते हैं। लेफेब्रे ने अंतोनियो ग्राम्शी के समान कहा कि विचारधारा की भूमिका यह होती है कि शासक वर्ग के लिए वह मजदूर वर्ग एवं आम जनता से उसके शासन के लिए सहमति प्राप्त करती है। ग्रामची ने शासक वर्ग के वैचारिक वर्चस्व को हेजीमोनी कहा है।


1968 में लेफेब्रे ने मार्क्स का समाजशास्त्र नामक पुस्तक में इस बात को लिखा। उन्होंने कहा विचारधाराएँ आम जनता के सामने अपने को इस रूप में प्रस्तुत करती हैं. जिसमें वे वर्ग शोषण की अवस्था के लिए आध्यात्मिक स्वीकृति और यहाँ तक कि उनका समर्थन प्राप्त करती हैं।

विचारधारा का प्रसार शिक्षा से, मीडिया से रात-दिन होता है। वह शोषित वर्ग के कार्य एवं विचार को प्रभावित करती हैं। संरचनावादी मार्क्सवादी विद्वान लूई अल्थुसर के अनुसार विचारधारा सामाजिक संरचना का एक स्वायत्त तत्व है।


वर्ग संघर्ष के बढ़ने या तीव्र होने से राजनैतिक संघर्ष की संभावना बनती है। ऐसा संघर्ष निश्चित रूप से अधिक तीव्र और व्यापक होता है। ग्यार्ग (जॉर्ज) लूकाच ने यह सही कहा है कि मार्क्स एक ही ने रचना में और क्रमिक रूप से वर्ग संघर्ष की बात नहीं करते हैं। मार्क्स की रचनाओं से इसके संबंध में स्पष्ट निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि वर्ग संघर्ष हिंसात्मक हो। यह चुनाव के माध्यम से भी हो सकता है। ऐसे संघर्ष की चर्चा संरचनात्मक मार्क्सवादियों ने भी की है। पूँजीवाद में वर्ग संघर्ष में हिंसा होती है।