तथ्य का महत्व - importance of fact
तथ्य का महत्व - importance of fact
व्यक्ति और समाज के जीवन में तथ्यों का अत्यधिक महत्व होता है। इसका कारण यह है कि तथ्य व्यक्ति और समाज के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्यों का संपादन करते हैं, तथ्य के निम्नलिखित महत्व इस प्रकार हैं
1. सिद्धांत का निर्माण तथ्य सिद्धांतों की आधारशिला होते हैं। तथ्यों के अभाव में सिद्धांतों का निर्माण करना अत्यंत ही कठिन कार्य होता है। इसका मौलिक कारण यह है कि सिद्धांत तथ्यों की सहायता से ही बनते हैं। मर्टन इसी आशय के साथ लिखते हैं कि "ठीक सिद्धांत संबंधित तथ्यों के उत्तम भोजन पर ही पनपता है"। अविष्कारों के मूल में तथ्य विद्यमान होते हैं।
गुरुत्वाकर्षण एक तथ्य है। न्यूटन ने इस तथ्य का निर्माण तथ्य के रूप में फल को पेड़ से नीचे गिरते देख कर किया था। वैसे तो संपूर्ण मानव जीवन ही अनेक तथ्यों से भरा पड़ा है। इन तथ्यों का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक की कोई वैज्ञानिक इन्हें न देख ले और उसके आधार पर सिद्धांतों का निर्माण न कर दे। जब वैज्ञानिक तथ्यों को देख कर उसी के अनुरूप अपने विचारों को परिपक्वता प्रदान करता है, तो इसे ही सिद्धांत के नाम से जाना जाता है।
2. सैद्धांतिक पुनर्निर्माण तथ्य का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य किसी विद्यमान तथ्य को अस्वीकार करना और उसका पुनर्निर्माण करना है। जब नवीन तथ्य सामने आते हैं, वैज्ञानिक प्राचीन तथ्यों पर आधारित सिद्धांतों की पुनर्परीक्षा करते हैं।
उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि इससे समय पहले उन्होंने जिस सिद्धांत का निर्माण किया था, वह अपना प्रभाव खो चुका है या उसके प्रभावों में कमी हो गई है। प्रजाति अपराध, आत्महत्या से संबंधित सिद्धांतों का पुनर्निर्माण इसलिए हो रहा है, क्योंकि आज नवीन तथ्य प्रकाश में आ रहे हैं।
3. सिद्धांत की पुनः व्याख्या- तथ्यों का महत्वपूर्ण कार्य है पुनः निर्मित सिद्धांतों की नवीन सिरे से व्याख्या करना और उसे एक नई परिभाषा देना। नवीन तथ्यों के आ जाने से पुनः निर्मित सिद्धांत स्पष्ट हो जाते हैं, संबंधित घटना की अवधारणा को स्पष्ट नहीं कर पाते हैं।
इसके लिए पुराने सिद्धांतों का नवीनीकरण करके उसको पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता होती है।
सिद्धांत का अर्थ- सिद्धांत वैज्ञानिक अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण चरण है। गुडे तथा हॉट ने सिद्धांतों को विज्ञान का उपकरण माना है। इसमें हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोड का पता चलता है, तथ्यों को सुव्यवस्थित करने, वर्गीकृत करने तथा परस्पर संबंधित करने के लिए इसमें अवधारणात्मक प्रारूप होता है। इसमें तथ्यों का सामान्यीकरण के रूप में संक्षिप्तकरण होता है। इसमें तथ्यों के बारे में भविष्यवाणी करने एवं ज्ञान में पाई जाने वाली त्रुटियों का पता चलता है।
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