विवाह के संस्था का महत्व - importance of institution of marriage
विवाह के संस्था का महत्व - importance of institution of marriage
विभिन्न समाजों में विवाह के रूप में चाहे कितनी भी भिन्नता क्यों न पायी जाती हो लेकिन एक संस्था के रूप में विवाह सर्वव्यापी हैं और अपने महत्व के कारण यह सभी समाजों की एक अनिवार्य विशेषता है। विवाह संस्थापक महत्व का इसके उद्देश्यों तथा कार्यों में निहित है जिसे बिंदुओ में देखा जा सकता है -
1. पारिवारिक जीवन की स्थापना यदि हम प्रश्न करें कि विवाह की उत्पत्ति क्यों हुई तो हमें सरलतापूर्वक ज्ञात हो जाता है कि संस्था के रूप में विवाह का महत्व कितना सर्वव्यापी है। बैंकोफन और मॉर्गन ने यह स्पष्ट किया है कि आदिकाल में स्त्री पुरुष के यौनिक संबंध बिल्कुल अनियंत्रित थे। तब ऐसे किसी भी नियम का अभाव था जिससे व्यक्तियों के जीवन को नियंत्रण में रखा जा सके।
इससे न केवल संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गए बल्कि बच्चे के पितृत्व का निर्धारण करना भी लगभग असम्भव था। इन्हीं परिस्थितियों में विकास की एक लम्बी प्रक्रिया के द्वारा विवाह जैसी संस्था की उत्पत्ति हुई तथा इसी के द्वारा व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों को व्यवस्थित किया जा सका। विवाह के द्वारा ही परिवार का निर्माण संभव हो पाता है और वैवाहिक संबंधियों के द्वारा ही नातेदारी व्यवस्था के अंतर्गत प्राथमिक समूहों का निर्माण होता है। इस प्रकार विवाह एक केन्द्रीय संस्था है।
विवाह में होने वाला कोई भी परिवर्तन सामाजिक संगठन और दूसरी संस्थाओं की क्रियाशीलता को प्रभावित करता है।
2. बच्चों को वैधता प्रदान करना एक संस्था के रूप में विवाह का सम्भवतः रूप सबसे महत्वपूर्ण कार्य बच्चों को वैध रूप प्रदान करना है। विवाह की अनुपस्थिति में यदि बच्चे के पितृत्व को ज्ञात न किया जा सके तो इससे बच्चों को समाज में एक सम्मानपूर्ण पद मिलने में ही कठिनाई नहीं होती बल्कि समूह के नैतिक नियम भी कमजोर पड़ जाते हैं। इससे यौन अनैतिकता में वृद्धि होने की सम्भावना रहती है। विवाह इस समस्या का समाधान करके बच्चों को वैध रूप प्रदान करता है और उन्हें एक दृढ पारिवारिक परंपरा से संबद्ध करता है। जिन समाजों में धार्मिक विश्वास तथा पवित्रता की धारणा का महत्व अधिक है वहां बच्चों की वैधता ही उनकी सामाजिक स्थिति का सबसे बड़ा आधार बन जाती है। इस प्रकार हमारे जैसे समाज में तो विवाह के बिना जन्म लेने वाले बच्चों का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है।
3. सामाजिक संबंधों की सुदृढ़ता सामाजिक संबंधों की व्यवस्था को प्रभावित करने में भी विवाह संस्था का प्रमुख योगदान रहा है।
वैवाहिक संबंधों की पृष्ठभभूमि में ही बच्चा कुछ दूसरे व्यक्तियों से अपनी एकरूपता स्थापित करता है। इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति को अपने रक्त संबंधियों, नातेदारों व दूसरे व्यक्तियों के बीच भेद करना सिखाती है। विवाह से संबंधित आदर्श नियम ही व्यक्ति में उचित और अनुचित की धारणा का विकास करते हैं। उचित और अनुचित की यही धारणा बाद में समाज को एक नैतिक व्यवस्था में परिवर्तित कर देती है। यदि विवाह जैसी कोई संस्था समाज में न होती तो सम्भवतः परिवार का निर्माण न होता और यदि अस्थिर प्रकृति के परिवार बन भी जाते तो उनकी कामाचार से रक्षा करना लगभग असम्भव हो जाता। इस प्रकार सामाजिक संबंधों की व्यवस्था को दृढ़ बनाने अथवा दूसरे शब्दों में समाज का निर्माण करने में विवाह के महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसी आधार पर हॉवेल का कथन है कि विवाह का प्रमुख कार्य व्यक्तियों के संबंधों को उनके रक्त संबंधियों और नातेदारों के प्रति परिभाषित करना तथा उन पर नियंत्रण रखना है।
4. व्यक्ति का समाजीकरण व्यक्ति के समाजीकरण में भी विवाह संस्था अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह व्यक्ति को अपने से भिन्न विचार धाराए परंपरा और रहन-सहन के व्यक्तियों से अनुकूलन करना सिखाती है।
विवाह संस्था व्याक्तियों को व्यक्तिवादिता की संकीर्णता से बाहर निकालकर पारिवारिक कल्याथण की भावना को अधिक दृढ बनाती है। यह त्याग को बढ़ावा देती है और पारस्परिक कर्तव्य के प्रति निष्ठा उत्पन्न करती है। यही गुण एक मानव प्राणी को सामाजिक प्राणी के रूप में परिवर्तित करते हैं।
5. संस्कृति का संचरण विवाह संस्था का एक प्रमुख कार्य संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को संचरित करने में सहायता देना और इस प्रकार संस्कृति को स्थायी बनाना है। विवाह की अनुपस्थिति में व्यक्ति के अनुभव पूर्णतया व्यक्तिगत होते हैं। विवाह के द्वारा एक वंश परंपराका निर्माण होता है और सांस्कृतिक विशेषताएँ पिता से उसके पुत्र को मिलने से यह लगातार आगामी पीढ़ी को संचरित होती रहती है। इस प्रकार विवाह केवल जैवकीय आधार पर ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को व्यवस्थित रखने में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
6. यौन संबंधोंकी नियमबद्धता - यौनिक संतुष्टि व्यक्ति की जैविकीय आवश्यकता है तथा विवाह के बिना इसे संस्थागत रूप से पूरा नहीं किया जा सकता। विवाह के द्वारा स्त्री व पुरुष के स्वतंत्र संबंधों की सम्भावना को ही कम नहीं किया जाता बल्कि बच्चों और उनके माता पिता के संबंध को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया जाता है। यही संबंध व्यक्तिगत तथा सामुदायिक जीवन को संगठित बनाते हैं और सांस्कृतिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करते हैं। इस प्रकार विवाह केवल एक संस्था ही नहीं है बल्कि सभी सामाजिक संस्थाओं में इसका महत्व केंद्रीय है।
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