वैयक्तिक अध्ययन का महत्व - importance of personal study
वैयक्तिक अध्ययन का महत्व - importance of personal study
सामाजिक घटनाओं तथा समस्याओं के अत्यधिक सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन में वैयक्तिक अध्ययन पद्धति अत्यधिक व्यावहारिक एवं उपयोगी सिद्ध हुई है। वर्तमान में यह तथ्य प्रमुख रूप से स्वीकार किया जाने लगा है कि, अधिकांश सामाजिक समस्याओं की प्रकृति व्यक्तिगत होती है तथा वैयक्तिक अध्ययन के आधार पर ही उनके समाधान के व्यावहारिक आधारों को ढूंढ़ा जा सकता है। मानसिक चिकित्सा का तो सम्पूर्ण विकास वैयक्तिक अध्ययन और उसके सफल प्रयोग से ही संबंधित रहा है। वास्तव में, वैयक्तिक अध्ययन विधि सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक दोनों दृष्टियों से उपयोगी समझी गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में इस विधि के गुणों एवं उपयोगिता को निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है :
1. वैयक्तिक अध्ययन के द्वारा किसी भी सामाजिक इकाई अथवा इकाईयों का अत्यधिक सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन किया जा सकता है।
2. वैयक्तिक अध्ययन के द्वारा विभिन्न इकाईयों का सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन की सहायता से अनेक उपयोगी तथा व्यवस्थित परिकल्पनाओं का निर्माण किया जा सकता है, जो इस अध्ययन के साथ-साथ नये अध्ययनों के लिए आधार के रूप में काम कर सकती है।
3. वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी प्राप्त होने के बाद उस अध्ययन अथवा अन्य संबंधित अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में प्रयोग लाये जाने वाले प्रपत्रों जैसे. प्रश्नावली अथवा साक्षात्कार- अनुसूची में सुधार करने का समुचित अवसर प्राप्त हो जाता है।
4. वैयक्तिक अध्ययन के द्वारा ही यह सम्भव हो सकता है कि अध्ययन से संबंधित क्षेत्र, विभिन्न विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली इकाइयों तथा एक ही श्रेणी की इकाइयों में से किस प्रकार सर्वोत्तम निदर्शन प्राप्त किया जा सकता है।
5. सामाजिक सर्वेक्षण तथा अनुसंधान में केवल विषय से संबंधित इकाइयों का अध्ययन करना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि प्रायः जो इकाईयाँ सर्वप्रथम ऊपर से अध्ययन की विरोधी अथवा निरर्थक प्रतीत होती हैं, उनके द्वारा भी कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। • ऐसी विरोधी अथवा निरर्थक इकाइयों का ज्ञान वैयक्तिक अध्ययन के अतिरिक्त अन्य विधि से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
6. वैयक्तिक अध्ययन विधि के द्वारा चयनित सामाजिक इकाई से सम्बद्ध प्रलेखों का विस्तार से अध्ययन करते-करते अनुसंधानकर्ता के ज्ञान में ही वृद्धि नहीं होती बल्कि अध्ययन के प्रति उसकी रूचि में भी वृद्धि हो जाती है, जिससे उसे अध्ययन के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करने की स्वयं ही एक अन्र्तदृष्टि प्राप्त हो जाती है। विषय के प्रति अनुसंधानकर्ता में रूचि एवं ज्ञान बहुत बड़ी सीमा तक अध्ययन की सफलता का परिचायक होता है।
7. चूँकि सामाजिक तथ्य प्रकृति से गुणात्मक होते हैं, वैयक्तिक अध्ययन सामाजिक इकाई इकाइयों से सम्बन्धी व्यक्तियों की रूचियों, मनोवृत्तियों, सामाजिक मूल्यों तथा विशेष परिस्थितियों में उनकी प्रतिक्रियाओं से भली-भाँति संबंधित होने के बाद वैज्ञानिक हो जाता है। इस दृष्टि से, मनोवृत्तियों से सम्बन्धी गुणात्मक विशेषताओं का अध्ययन करने में वैयक्तिक अध्ययन विधि ही सबसे उपयोगी है।
8. वैयक्तिक अध्ययन एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा चयनित इकाई के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य को समझकर एवं उनका समन्वय करके निष्कर्ष प्राप्त करना सम्भव होता है।
9. वैयक्तिक अध्ययन विधि के माध्यम से प्रारम्भिक स्तर पर समस्या से सम्बद्ध इकाईयों की जानकारी प्राप्त कर लेने के पश्चात् किसी भी बड़े अध्ययन को प्रारम्भ करने के लिए उसके समग्र का निर्धारण, निदर्शन की प्राप्ति तथा उपकरणों के निर्माण में सहायता मिलती है। सारांश में, वैयक्तिक अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष उस समय अत्यधिक उपयोगी हो सकते हैं
जब हम विशिष्ट क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट स्रोत एवं प्रविधियों के प्रयोग से अध्ययन कार्य से प्राप्त परिणामों (निष्कर्षों) में एकीकरण करने का प्रयास करें। यह एकीकरण विभिन्न विधा विषयों के स्तर भी किया जाना चाहिए। आज सामाजिक अनुसंधान के क्षेत्र में प्रयोग किये जाने वाले सभी अभिगम अन्तर्विषयी है, और हम विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध ज्ञान का अधिक से अधिक उपयोग करते हुए सामाजिक अनुसंधान की सभी विधियों, जिसमें वैयक्तिक अध्ययन विधि भी सम्मिलित है, को संचालित करना चाहते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हम आधुनिक नागरिक औद्योगिक समाज की जटिलता तथा उसके परिप्रेक्ष्य में किसी भी घटना के घटित होने के लिए उत्तरदायी कारकों की बहुलता को स्वीकार करते हैं। अतः अन्तर्विषयी केन्द्रित वैयक्तिक अध्ययन सामाजिक वास्तविकता को उसकी अधिक पूर्णता में तथा अधिक वस्तुनिष्ठ ढंग से देखने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।
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