भारतीय गांव: एक इकाई के रूप में - Indian Village: As an Unit

भारतीय गांव: एक इकाई के रूप में - Indian Village: As an Unit


समाजशास्त्रियों ने इस बात को सिद्ध करने का प्रयास किया है कि गांव एक इकाई है। प्रत्येक गांव लोगों का एक समूह है जो एक क्षेत्र में बसा होता है और जो कुछ दूरी पर बसे ऐसे ही समूह से भिन्न होता है। गांव की पृथकता. वहां यातायात और सड़कों की कमी, अधिकतर लोगों की कृषि पर निर्भरता, गाँव के लोगों की आर्थिक दृष्टि से पारस्परिक निर्भरता, समुदाय के समान्य अनुभव एवं परंपराएं. सामुदायिक उत्सव एवं त्योहारों का महत्व आदि कारकों की उपस्थिति गांव की एकता को संभव एवं स्वाभाविक बनाती है। पोस्ट ऑफिस की दृष्टि से भी प्रत्येक गांव को एक इकाई माना गया है। राजस्व एकत्रित करने की दृष्टि से भी सरकारी खातों में एक गांव की भौगोलिक सीमा को मान्यता दी गई है। उसी के आधार पर लगान वसूल किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से भी प्रत्येक गांव का एक ग्राम देवता होता है जिसे सभी मानते हैं और लोंगो का विश्वास है कि वह संकट के समय सारे गांव की रक्षा करता है। प्रत्येक गांव के कुछ ऐसे विशेषताएं होती हैं जिनके आधार पर दूसरे गांव वाले उसे पहचानते हैं।

राजनीति दृष्टि से भी गांव एक इकाई है। वह प्रशासन की सबसे छोटी कड़ी है। ग्राम पंचायत शासन एवं विकास के कार्य को करती है। इस प्रकार गांव को भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से एक इकाई माना गया है।


इस ग्रामीण एकता के दर्शन उस समय होते हैं जब गांव में आकस्मिक संकट, महामारी, बाढ़ आदि कोई प्रकोप आ गया हो, करों या किसी वैधानिक नियमों का सामूहिक विरोध करना हो, धार्मिक उत्सव या सामुदायिक त्यौहार मनाना हो|श्रीनिवास ने मैसूर के गांव रामपुरा की सामुदायिक एकता का अच्छा उल्लेख किया है। वे लिखते हैं की अगर किसी वर्ष मानसून नहीं आता है तो इसका अर्थ है सभी के लिए अनावृष्टि। जब कभी हैजा, मलेरिया, प्लेग, चेचक आदि रोग फैलते हैं तो सारा गांव एकता में बंध जाता है। पूरा गांव स्थान छोड़कर दूसरी जगह को चला जाता है। जब श्रीनिवास अध्ययन कर रहे थे तो वर्तमान रामपुरा गांव को बसे हुए 70 वर्ष हुए थे। पुराना गांव दूसरे स्थान पर था। मलेरिया के प्रकोप से बचने के लिए भागकर गांव के लोग नए स्थान पर जा बसे थे। देवता को प्रसन्न करने के लिए गांव के लोग पूजा या आराधना करते थे। बीमारी को संस्कारिक रूप से गांव के बाहर फेंक आते थे।

गांव की सीमा का भौगोलिक ही नहीं सांस्कारिक महत्व भी है। रामपुरा की भांति ही डॉ. चौहान ने राजस्थान के एक गांव राणावतो की सादड़ी में अकाल वा प्लेग के समय ग्रामवासियों द्वारा प्रकट की गई एकता का उल्लेख किया है।


गांव की संस्कारी एकता भी महत्वपूर्ण है। 1948 रामपुरा में सूखा पड़ा जिससे गर्मी की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ा। गांव वालों की मान्यता थी कि उन्हें ईश्वर ने यह दंड दिया है। एक मान्यता यह भी थी कि कोढ़ी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसे जलाने या नदी में फेंकने के स्थान पर गाड़ने से धरती माता अपवित्र हो जाती हैं और रुष्ट होकर प्राकृतिक विपदा भेजती हैं। रामपुरा में उसी समय एक घटना घटी। रामपुरा गांव के तालाब की मछलियों को नीलामी करने की बात का पता चला तो उन्होंने प्रतिक्रिया व्यक्त की कि सरकार को ऐसा करने का क्या हक है, यह तो गांव वालों के अधिकारों का अतिक्रमण है। नीलामी के समय कोई भी गांव वाला वहां नहीं पहुंचा। रामपुरा गांव की एकता उस समय भी देखी जा सकती है जब वे अपने को दूसरे गांव वालों से भी भिन्न समझते हैं। रामपुरा के लोग अपने को पास के गांव भी बिहाली (Bihalli) से परिष्कृत मानते हैं। वे मानते हैं कि करे (Kere) गांव के लोग रामपुरा को पिछड़ा हुआ और अपने को विकसित मांगते हैं। एक गांव का सदस्य होना उस व्यक्ति के लिए गर्व की बात है।


दो गांव के बीच संघर्ष होने की स्थिति में भी ग्राम एकता देखी जा सकती है। इस समय में गांव की सभी एक होकर मुकाबला करते हैं। गांव की एकता बनाए रखने में प्रभु जाति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रभु जाति वह जाति है जो जनसंख्या, समाजिक स्थिति, आर्थिक तथा राजनैतिक दृष्टि से सत्ता से सम्पन्न होती है। वह समुदाय की व्यवस्था बनाए रखने का प्रयत्न करती है।


आलोचना (Criticism)- कुछ समाजशास्त्रियों ने ग्राम समुदाय की एकता को स्वीकार नहीं किया है और उन्होंने ग्रामीण समुदाय एकता नष्ट करने वाले तत्वों का उल्लेख किया है। वे ग्रामीण एकता के विपरीत निम्नांकित तर्क देते हैं।


(1) गांव में अनेक जातियां निवास करती हैं। एक गांव में रहने वाली जाति दूसरे गांव में रहने वाली अपनी ही जाति से घनिष्ठ रूप से संबंधित है खान-पान तथा विवाह द्वारा वे परस्पर जुड़ी हुई हैं। विभिन्न गांव में बसने वाली एक ही जाति गांव की एकता को नष्ट कर देती है

तथा गांव एकता के स्थान पर जातीय एकता को अधिक महत्व देती है। यह जातीय झगड़े गांव में बसी अपने ही जाति के बायोवृद्ध लोगों के पास निपटाने के लिए जाती हैं।


(2) यह ठीक है कि गांव के बीच प्राचीन समय में यातायात और संचार के साधनों का अभाव था फिर भी इन पड़ोसी गांव के बीच घनिष्ठ आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक संबंध में पाए जाते थे। इससे ग्राम एकता के स्थान पर आने ग्रामों की एकता पाई जाती थी। सभी गांव परस्पर अन्योन्याश्रित थे।


(3) एक केंद्रित गांव (Nucleated Village) में भी ग्राम एकता की भावना जाति और गांव के पारस्परिक निर्भरता के कारण नष्ट नहीं कमजोर अवश्य हो जाती है। छितरे हुए गांव (Scattered Villages) में तो यह बहुत ही कमजोर हो जाती है। अतः ग्राम एकता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जा सकता।