अपरिहार्यता - Indispensability

अपरिहार्यता - Indispensability

कुछ ( प्रकार्य ) (Functions) ऐसे हैं जो अपरिहार्य हैं। वे इस संदर्भ में अपरिहार्य हैं कि जब तक उन्हें न किया जाए, समाज जीवित नहीं रह सकता। मर्टन ने सुझाव दिया है कि इन्हें प्रकार्यात्मक पूर्वआवश्यकताएँ (Functional prerequisites) या एक समाज के लिए प्रकार्यात्मक दृष्टि से अनिवार्य पूर्व- दशाएँ (Pre-Conditions Functionally Necessary) कहना चाहिए।


दूसरा यह है कि इन प्रकार्यों को पूरा करने के लिए कुछ निश्चित सांस्कृतिक या सामाजिक स्वरूप की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। प्रकार्यात्मक आवश्यकताएँ अनिवार्य हैं, निश्चायक नहीं। इनका यही अभिप्राय है उन प्रकार्यों को पूरा करने के लिए यह अनिवार्य है कि सामाजिक संरचना होनी चाहिए, पर कौन-सी होनी चाहिए का निश्चय बहुत-कुद तत्वों पर भी आधारित है? मर्टन ने कहा है- "जिस प्रकार एक इकाई के कई प्रकार के प्रकार्य होते हैं, इसी प्रकार एक समान प्रकार्य को कई वैकल्पिक इकाईयों से पूरा किया हा सकता है।"


जब एक अनिवार्य प्रकार्य कई वैकल्पिक वस्तुओं से पूरा किया जा सकता है, तो अपरिहार्य इकाई (Functional item) के स्थान पर प्रकार्यात्मक विकल्प (Functional alternatives) या प्रकार्यात्मक समानतत्व ( Functional equivalents) या प्रकार्यात्मक विकल्प (Functional substitutes) के संबोध (Concepts) विकसित हो जाते हैं। मर्टन ने दो भागों में सामाजिक घटनाओं को विश्लेषण के लिए बाँटा है::


(1) वे घटनाएँ जिनके कार्यों की खोज करना चाहिए उन घटनाओं को करना चाहिए जो प्रतिमानित हों और बार-बार घटती हों जैसे सामाजिक कार्य (Social roles), संस्थात्मक प्रतिमान (Institutional Patterns), सामाजिक प्रक्रियाएँ, सांस्कृतिक प्रतिमान, सांस्कृतिक प्रतिमानित उद्वेग (Culturally Patterned emotions), सामाजिक नियम (Social Norms), सामाजिक संगठन, सामाजिक संरचना, सामाजिक नियंत्रण की पद्धतियाँ इत्यादि।


(2) उद्देश्य, हेतु इत्यादि लिए हुए घटनाएँ - इनके लिए विभिन्न पद्धतियों का प्रयोग करना चाहिए। प्रकार्यात्मक विकल्प या समवस्तुएँ (Functional Alternates or Equivalents)


जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं कि प्रकार्यात्मक विकल्प या समवस्तुएँ एक कार्य को पूरा करने के लिए हो सकते हैं, इसलिए हम यह नहीं कहते कि कोई भी तथ्य अपरिहार्य हैं। जॉनसन ने भी इसका समर्थन किया है। प्रकार्यात्मक विकल्प के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, समाज में एक राजनीतिक सरदास होना चाहिए। यह पैतृक पूर्ण-सत्ताधारी राजाशाही हो सकती है, तो पैतृक सीमित सत्ताधारी राजाशाही भी हो सकता है। दूसरा उदाहरण जजों का है ये निर्वाचित भी हो सकते हैं और नियुक्त किए हुए भी। यहाँ पर एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि दो वस्तुओं या तंत्रों का एकसा ही प्रकार्य नहीं होता। उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है।