बौद्ध धर्म का प्रभाव - influence of buddhism

बौद्ध धर्म का प्रभाव - influence of buddhism


बौद्ध धर्म ने भारतीय जनता के समक्ष आने वाली कई समस्याओं का निराकरण किया। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में पूर्वोत्तर भारत में कई समस्याएं और कुरीतियाँ व्याप्त थीं तथा इन समस्याओं और कुरीतियों का विरोध बौद्ध धर्म द्वारा किया गया। इस धर्म ने इस कहस्त्र में पर्याप्त जागरूकता का परिचय दिया तथा लोगों को इसके बारे में अवगत कराया। खेती के लिए लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग, व्यापार व सिक्कों आदि के प्रचलन के कारण व्यक्ति को धन-संपत्ति आदि को संचित करने का अवसर प्राप्त हुआ। स्वाभाविक है, इस अवसर ने सामाजिक-आर्थिक स्तर पर असमानता को जन्म दिया। इस असमानता को दूर कर समानतापूर्ण व्यवस्था नियोजित करने के प्रयोजन से बौद्ध धर्म ने धन के संचय का विरोध किया और यह घोषणा की कि धन-संचय नहीं करना चाहिए। गौतम बुद्ध ने उपदेश दिया कि किसानों को बीज मुहैया कराना चाहिए, व्यापारियों को धन देना चाहिए तथा श्रमिकों को मजदूरी मिलनी चाहिए। इन प्रयासों के द्वारा ही दरिद्रता दूर किया जा सकता है। बौद्ध धर्म में घृणा, क्रूरता तथा हिंसा को जन्म देने वाली दशा के रूप में दरिद्रता को मान्यता दी गई है। यहाँ यह मान्यता है कि जो व्यक्ति किसी दरिद्र को भीख दान देगा, वह अगले जन्म में धनवान होगा।


बौद्ध धर्म में भिक्षुओं के आचरण संबंधी नियम भी निर्धारित किए गए हैं। इन नियमों में भोजन, वेश-भूषा और यौन आदि से संबंधित निषेध बताए गए हैं। वे सोना-चाँदी ना ही इस्तेमाल कर सकते थे और ना ही उन्हें दान में प्राप्त करने अथवा क्रय-विक्रय करने के अधिकार दिए गए थे। हालांकि बुद्ध की मृत्यु के उपरांत ए नियम शिथिल पड़ गए। बौद्ध धर्म में ईसा पूर्व पाँचवीं सदी के दौरान भौतिक जीवन में विद्यमान बुराइयों का निराकरण करने का प्रयास किया गया और साथ ही लोगों के सामाजिक व आर्थिक जीवन में आए उथल-पुथल तथा असमानता को दूर करने का प्रयास किया गया। इसके अलावा इन परिवर्तनों को स्थाई आधार प्रदान करने का प्रयत्न भी किया गया। बाद में बौद्ध संघ में कर्जदारों के प्रवेश को निषिद्ध कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि धनवानों और महाजनों से कर्ज लेकर लोग संघ में शामिल नहीं हो सकने के कारण लेनदारों के शिकंजे से मुक्त नहीं हो सकते थे। इसी प्रकार दासों के प्रवेश को निषिद्ध कर संघ ने मालिकों के लिए लाभकर उपाय प्रस्तुत किया। इस प्रकार से सामाजिक व आर्थिक जीवन में आने वाले परिवर्तनों को स्थाई तौर पर व्यवस्था में शामिल करने का प्रयास किया गया।


सामान्यतः बौद्ध भिक्षुओं को संसार से विरक्त ही रहते थे और लोभी ब्राह्मणों के विरोध की भावना भी कभी-कभी उनमें देखने को मिलती थी। हालांकि इसके बावजूद कई मामलों में इनमें समानता देखने को मिलती है


• बौद्ध भिक्षु और ब्राह्मण दोनों ही उत्पादन व्यवस्था में भागीदार नहीं रहते थे तथा भीख अथवा दान में प्राप्त वस्तुओं पर ही जीवन बसर करते थे।


• दोनों के मतों में भी समानता देखने को मिलती थी। उनका मानना था कि परिवार का पालन पोषण करना. निजी संपत्ति की रक्षा करना और राजा की आज्ञा को मानना उचित होता है। 


• दोनों ने वर्गमूलक समाज का समर्थन किया है।


बौद्ध भिक्षुओं तथा ब्राह्मणों में भेद इस बात का था कि बौद्ध भिक्षुओं का निर्धारण उनके गुण और कर्मों के आधार पर किया जाता था, जबकि ब्राह्मणों का निर्धारण उनके जन्म के आधार पर होता था।


यह सर्वविदित है कि बौद्ध धर्म का मूल लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करना था। जिन लोगों को पुरानी सामाजिक व्यवस्था में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया, जो लोग शोषण का शिकार हुए तथा जिन्हें संपत्ति के द्वारा उत्पन्न सामाजिक असमानताओं के विरोधी थे इन सभी लोगों को बौद्ध धर्म के रूप में एक बेहतर विकल्प मिला। हालांकि इन सभी समस्याओं से मुक्ति केवल बौद्ध भिक्षुओं को ही मिल सकती थी, अन्य सभी गृहस्थों को मौजूदा स्थिति में अनुकूलन कर सकने हेतु केवल उपदेश ही दिए जाते थे। बौद्ध धर्म यदि किसी के लिए अत्यंत लाभकर सिद्ध हुआ तो वह स्त्री और शूद्रों के लिए हुआ। बौद्ध धर्म में इनके लिए किसी प्रकार के निषेधों को नहीं लागू किया गया, उन्हें वे सभी अधिकार प्राप्त थे. जो अन्य लोगों को प्रदान किए गए थे। इसके अलावा बौद्ध धर्म ने अहिंसा और प्रत्येक जीव के लिए प्रेम व दया की भावना को विकसित कर संसार के लिए नया मानदंड प्रस्तुत किया।


इतना ही नहीं बौद्ध धर्म ने बौद्धिक और साहित्यिक जगत में भी चेतना जागृत करने का काम किया। इसने बताया कि किसी भी वस्तु को ऐसे ही स्वीकार अथवा अस्वीकार नहीं करना चाहिए. पहले उस वस्तु के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल करनी चाहिए, उसके गुण-दोष आदि को भली प्रकार से समझ लेने के पश्चात ही उसे स्वीकार अथवा अस्वीकार करना चाहिए। इस धारणा ने अंधविश्वास के स्थान पर बुद्धिवाद को पनपने के लिए स्थान प्रदान किया।