अंतर समूह द्वंद या संघर्ष - intergroup conflict
अंतर समूह द्वंद या संघर्ष - intergroup conflict
समाज मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रीय तथा मानव शास्त्रियों ने सामाजिक संघर्ष या सामूहिक द्वंद के अध्याय पर बल डाला है। जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों या व्यक्तियों के दो या दो से अधिक समूहों के बीच इस ढंग की प्रक्रिया होती है जिसमें लोग किसी न किसी ढंग से एक दूसरे का विरोध करते हैं, तो इसे सामूहिक द्वंद्व कहा जाता है।
ऑल सेन (1978) के शब्दों में, " सामूहिक या सामाजिक द्वंद तब उत्पन्न होता है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति सामाजिक अंतर क्रिया में एक दूसरे का विरोध करते हैं. एक दुर्लभ और असंगत लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए एक दूसरे पर सामाजिक सत्ता का उपयोग करते हैं और अपने विरोध को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा डालते हैं "।
वेबर (1964) में भी सामाजिक संघर्ष को इसी तरह परिभाषित करते हुए कहा है," सामूहिक द्वंद एक सामाजिक संबंध होता है जहां व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार जानबूझकर अन्य पार्टी या पार्टियों के प्रतिरोध के प्रतिकूल अनुक्रिया करता है"।
इन परिभाषा ओं का विश्लेषण करने पर सामूहिक बूंद या संघर्ष के स्वरूप के बारे में कुछ तथ्यों का पता चलता है जो निम्नांकित है-
1- समूह संघर्ष में सामाजिक सत्ता सम्मिलित होती है - सभी तरह के सामाजिक संघर्ष या द्वंद में सामाजिक सत्ता सम्मिलित होती है। इस तरह की सत्ता का प्रयोग करके प्रत्येक समूह अपना अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है। परिणाम यह होता है कि जिसकी सत्ता अधिक शक्तिशाली होती है. वह जीत जाता है अर्थात लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है, तथा जिसकी सत्ता कमजोर होती है वह लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रह जाता है।
2- समूह संघर्ष में असंगति या असामंजस्य सामूहिक इंद एक ऐसा इंद होता है - जिसमें सभी लोगों को वह चीज या वस्तु नहीं मिल पाती है जिसकी उसे चाय होती है। कुछ लोग तो अपनी इच्छा पूरा करने में सफल हो जाते हैं तो कुछ लोग की चाह मात्र चाह बनकर ही रह जाती है
अर्थात सामूहिक संघर्ष की परिस्थिति ऐसी होती है कुछ व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की कीमत पर ही किसी लक्ष्य की प्राप्ति कर सकने में समर्थ हो पाते हैं।
3- समूह संघर्ष अस्वयंभावी होता है- अधिकतर सामाजिक परिस्थितियां इस धमकी होती है कि उनमें सभी व्यक्तियों की रुचियां या उनके विचार शायद ही कभी बिल्कुल ही एक समान होते हैं। वे हमेशा यह कोशिश करते हैं कि उनके द्वारा किए गए अंतः क्रिया से उनकी ही जीत हो। अन्य दूसरे लोग अंतर क्रिया को अपने पक्ष में ले जाने की भरसक कोशिश करते रहते हैं और वे चाहते हैं कि जीत उनकी हो। ऐसी परिस्थिति में समूह या सामाजिक द्वंद्व या संघर्ष अस्वयंभावी होता है।
समूह द्वंद की उपयुक्त विशेषताएं प्रधान हैं। इन विशेषताओं के अलावा समाज मनोवैज्ञानिकों का मत यह भी है कि शुद्ध समूह संघर्ष विरल होता है क्योंकि संघर्ष के साथ साथ प्रायः संयोगिता की भी
भावना पाई जाती है।
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