सामाजिक व्यवस्था का आतंरिक विभेदीकरण - internal differentiation of the social system

सामाजिक व्यवस्था का आतंरिक विभेदीकरण - internal differentiation of the social system


सामाजिक व्यवस्था का आतंरिक विभेदीकरण का वर्णन करते हुए पारसन्स ने चार प्रकार के तथ्यों का वर्णन किया है। प्रथम, उन्होंने ऐसी संस्थाओं का उल्लेख किया है जो विभिन्न स्थितियों और सामाजिक व्यवस्था के बीच तथा विभिन्न स्थितियों के बीच के संबंधों को परिभाषित निर्धारित एवं निश्चित करती हैं। चूँकि ये संबंधों को परिभाषित करती है इसलिए उसने इन्हें संबंधात्मक संस्थाएँ कहा है। संबंधात्मक संस्थाएँ विभिन्न स्थितियों में विभेद करती है और उनके एक-दूसरे के साथ संबंधों का निर्धारण करती हैं। द्वितीय, कर्ताओं की समस्त क्रियाएँ स्वार्थी प आधारित हैं। इसलिए यह आवश्यसक है कि उनकी क्रियाओं की समस्त क्रियाएँ स्वार्थों पर आधारित हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि उनकी क्रियाओं पर नियमन एवं नियंत्रण किया जाए जिससे कि वे सकारात्मक साधनों का ही प्रयोग अपने स्वार्थों की पूर्ति में करें। चूँकि ये संस्थाएँ नियमन करती है, इसलिए उसने इन्हें नियामक संस्थाएँ कहा है। तृतीय, कुछ संस्थाएँ ऐसी होती हैं जिनका संबंध सांस्कृतिक व्यवस्था से होता है, इसलिए पारसन्स ने उन्हें सांस्कृतिक संस्थाएँ कहा है। चतुर्थ, कुछ को उसने संबंधात्मक नियामक संस्थाएँ कहा है।