मानवाधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय घोषणा पत्र - international declaration for human rights
मानवाधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय घोषणा पत्र - international declaration for human rights
व्यक्ति के मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु संयक्त राष्ट्र संघ काफी समय से प्रयासरत है। संयुक्त राष्ट्र संघ का मजबूती से विश्वास है कि यदि दुनिया, सामाजिक प्रगति स्वतंत्रता समानता शांति, आदि के साथ आगे बढ़े तो मानव की गरिमा और मानवाधिकारों की रक्षा आसानी से की जा सकती है। आज संयुक्त राष्ट्र संघ समकालीन विश्व में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष लोगों के लिए केन्द्रीय भूमिका अदा कर रहा ने है। अपनी एक घोषणा में संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा था कि प्रत्येक सदस्य राष्ट्र को अपने यहाँ एक राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था की स्थापना करनी चाहिए जो उस राष्ट्र विशेष में मानवाधिकारों के लिए कार्य करेगा। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सबसे पहली चर्चा सन 1996 में की थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के सन 1996 की आर्थिक सामाजिक परिषद में मानवाधिकारों पर चर्चा की गई थी।
सन 1960 के दशक में इस बारे में और विस्तार से चर्चा दुनियाभर में की गई थी। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फासीवादी शक्तियों के विरुद्ध युद्धरत देशों और उनके मित्र देशों के प्रतिनिधियो की कई बैठकें और सम्मलेन हुए। जनवरी 1942 से ये देश संयुक्त राष्ट्र कहलाने लगे। इन बैठकों और सम्मेलनों में युद्ध के संचालन के लिए सामूहिक रणनीतीयों और जिन लक्ष्यों के लिए वे लड़ रहे थे उनसे सम्बन्धित प्रश्नों पर विचार-विमर्श और समझौते हुए। ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ और चीन के प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन संयुक्त राज्य अमेरिका के डंबार्टन ओक्स नामक स्थान में हुआ, जिसका उद्देश्य एक शांति-रक्षक संस्था की योजना बनाना था, डंबारटन ओक्स में तैयार की गई योजना पर 25 अप्रैल 1945 को अमेरिका के ही सान फ्रांसिस्को नगर में आयोजित सम्मेलन में चर्चा हुई। इस सम्म्मेलन में 50 देशों प्रतिनिधि शामिल हुए, जिनमें भारत के प्रतिनिधि भी थे। 26 जून 1945 को सम्मेलन में शरीक सभी देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर किये।
इस अधिकार पत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन की व्यवस्था की गई है। यह अधिकार पत्र २४ अक्टूबर 1945 को लागू हो गया। इसमें फासीवाद बर्बरता के विरुद्ध युद्धरत देशों की जनता की आकांक्षाये प्रतिबिम्बित हुई और मानवाधिकारों" तथा "व्यक्ति की गरिमा" में आस्था का इजहार किया गया। मूल मानवाधिकारों की सार्वजनीन घोषणा कोई संधिया क़ानूनी समझौता अथवा बंधनकारी वैधानिक दस्तावेज नहीं, बल्कि संकल्प और सिध्दांत की घोषणा थी। तथापि उसने कई देशों के संविधानो और वैधानिक प्रणालियों को प्रभावित किया।
उक्त घोषणा के बाद जैसा कि हम पहले कह चुके है, कई और घोषणाएँ की गई है। खास खास मसलों और विशिष्ट पहलुओं के बारे में मानवाधिकार विषयक सिध्दांत विस्तृत रूप में प्रस्तुत किए गए है। साथ ही कई प्रसंविदाओ और अभिसमयों में भी ख़ास ख़ास पहलों के सम्बन्ध में विशिष्ट अधिकारों की विषद व्याख्याएँ की गई है। एक अर्थ में इन प्रसंविदाओ और अभिसमयो को अधिक महत्वपूर्ण माना जा सकता है। क्योंकि इन हस्ताक्षर करने वाले देशों ने इनका पालन करने की स्पष्ट सहमति दी हैं।
मानवाधिकारों की समकालीन अवधारणा के विकास के कतिपय पहलुओं का जिक्र करना उपयोगी होगा। इस विकासमन अवधारणा की चर्चा सामान्यतः मानवाधिकारों के तीन चरणों को ध्यान में रखकर की जाती है। प्रथम चरण के अधिकार वे थे जिनका सम्बन्ध मुख्य रूप से व्यक्ति के नागरिक तथा राजनितिक अधिकारों से या स्वतंत्रता अभिमुख" अधिकारों से था। इनका उद्धेश्य सरकारों को व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं में हस्तक्षेप करने से अपने हाथ रोकने के लिए उनपर निषेधात्मक दायित्व" आरोपित करना था। वे अधिकार 19वीं सदी से आरंभ होने वाले सभी उदारवादी और लोकतान्त्रिक आंदोलनों के प्रमुख प्रयोजनों में से थे।
दूसरे चरण के अधिकार वे है, जिन्हें सुरक्षा अभिमुख" कहा जा सकता है, और इनमे सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक सुरक्षा की व्यवस्था है। सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों की प्रकृति सकरात्मक है, क्योंकि इनके कारण राज्यों के लिए लाजिमी हो जाता है
कि वे इन अधिकारों का पालन सुनिश्चित करे. मानवाधिकारो की सार्वजनीन घोषणा उन सिद्धांतो के सम्बन्ध में एक एक इसी आम सहमति को प्रतिबिंबित करती है जो प्रथम तथा द्वितीय चरणों के अधिकारों का आधार है।
तृतीय चरण के मानवाधिकारो का उद्भव अपेक्षाकृत हाल में हुआ है। उनका विकास उन नए सरोकारों के उत्तर में हुआ है, जिनके सम्बन्ध में हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय आम सहमति पैदा हुई है। इनमे पर्यावरण सम्बन्धी, सांस्कृतिक तथा विकासात्मक अधिकारों का समावेश है। उनका सम्बन्ध व्यक्तियों की बजाय समूहों और जन समाजों के अधिकारों से है. और इनमें आत्म निर्णय का अधिकार, विकास का अधिकार, आदि शामिल है। इन अधिकारों के सम्बंध में अंतरराष्ट्रीय आम सहमती पैदा करने में विकासशील देशों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। 1986 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा अपने गई विकास के अधिकार की घोषणा इन अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।
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