समूह प्रभाव का परिचय - introduction of Group influence
समूह प्रभाव का परिचय - introduction of Group influence
समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा समूह प्रभाव का विस्तृत रूप से अध्ययन किया गया है ऐसे प्रभावों का अध्ययन हम यहां निम्नलिखित 6 प्रमुख भागों में बांटकर करेंगे
1- सामाजिक सरलीकरण
2- जन संकुलन
3- सामाजिक श्रमावनयन
4. निरस्त्रीकरण
5 - समूह ध्रुवीकरण
6- समूह सोच
1. सामाजिक सरलीकरण- जब समाज मनोवैज्ञानिकों ने शहरीकरण पर अध्ययन करना शुरू किया तो उनके सामने एक प्रश्न आता है वह प्रश्न है - दूसरों की उपस्थिति मात्र से किसी व्यक्ति का व्यवहार किस तरह प्रभावित होता है? या उपस्थिति मात्र से तात्पर्य होता है कि दूसरा व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह उस परिस्थिति में जिस में कोई व्यक्ति कार्य कर रहा होता है, कोई अंतर क्रिया नहीं करता है बल्कि सिर्फ वह अपना केवल शारीरिक उपस्थिति बना कर रखता है भक्ति को निष्क्रिय श्रोता या सहभागी वार्ता कहा जाता है.
परीक्षण-इस पर सबसे पहले ट्रिपलेट (Triplett, 1897) ने साधारण परीक्षण किया जिसमें उन्होंने पाया कि जब साइकिल चलाने वाला व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के साथ प्रतियोगिता करते हुए चलाता है, तो वह काफी तेजी से दौड़ लगा पाता है परंतु यदि वह अकेले साइकिल चलाता है. तो उसकी गति धीमी हो है जाती है. इस परीक्षण के पीछे सोच यह थी कि अन्य लोगों की उपस्थिति से साइकिल चलाने वाले व्यक्ति में शायद अतिरिक्त शारीरिक उर्जा उत्पन्न हो जाती है जो उसे तेजी से दौड़ लगाने के लिए बाध्य करता है.
अपने इस शोध प्राकल्पना की जांच करने के उद्देश्य से उन्होंने एक प्रयोग बच्चों पर किया जो समाज मनोविज्ञान के क्षेत्र में पहला प्रयोग था. उन्होंने बच्चों को रील पर रस्सी लपेटने का कार्य जल्द से जल्द करने को कहा. कुल प्रयास के आधे प्रयासों में प्रत्येक बच्चा इस कार्य को एकांत परिस्थिति में अलग अलग किया परंतु बाकी आधे प्रयासों में दो के समूह में जिसमें आपस में प्रतियोगिता थी. किया, परिणामों में देखा गया कि प्रतियोगिता की परिस्थिति में बच्चे एकांत परिस्थिति की तुलना में अधिक तेजी से कार्य किए तथा उनका निष्पादन भी काफी अच्छा था. विभिन्न प्रकार के अध्ययनों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि दूसरों की उपस्थिति में कार्य निष्पादन में मदद तथा बाधा दोनों ही होती है विरोधी परिणाम में समाज मनोवैज्ञानिकों को एक ऐसी व्याख्या की खोज के लिए मजबूर कर दिया जिससे समूह बाधक तथा सरली कृत दोनों प्रभाव का वर्णन संतोषजनक ढंग से हो सके.
2. जन संकुलन - जन संकुलन एक महत्वपूर्ण संप्रत्यय है जिसके माध्यम से समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यक्ति के व्यवहार पर पड़ने वाले समूह प्रभावों का अध्ययन किया जाता है समानता जन संकुलन से तात्पर्य कम जगह में अधिक लोगों के एकत्रित हो जाने से उत्पन्न स्थिति से होता है स्पष्ट तो हर जगह तथा व्यक्तियों की संख्या के साथ जन संतुलन को यहां जोड़ा गया है परंतु वास्तविकता यह है
कि जन संकुलन की वैज्ञानिक परिभाषा में जगह तथा व्यक्तियों की संख्या को महत्व नहीं दिया जाता है व्यक्ति एक बस में होने पर जल संतुलन का अनुभव कर सकता है परंतु बस के जगह के बराबर वाले किसी कमरे में स्थित की गई पार्टी में ऐसा अनुभव नहीं कर सकता है.
स्टोकोल्स (Stocols, 1978) को सही अर्थ में समझने के लिए यह आवश्यक है कि उपलब्ध जगह तथा व्यक्तियों की संख्या दोनों के प्रति व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक अनुभूति को जानना आवश्यक है. ऐसी स्थिति में तब जन संकुलन तथा उससे संबंधित पद घनत्व के अंतर को समझना अति आवश्यक है, स्टोकोल्स (Stocols, 1972) के अनुसार " स्थानिक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत कारको की अंतर क्रिया से उत्पन्न अभीप्रेरणात्मक अवस्था को जन संकुलन कहा जाता है." फेल्डमैन (Feldman, 1985) के अनुसार " जन संकुलन से तात्पर्य एक परिस्थिति में उत्पन्न मनोवैज्ञानिक या आत्मगत कारको से होता है - किसी विशेष स्थान में व्यक्तियों को दी गई संख्याओं को व्यक्ति किस तरह प्रत्यक्षण करता है." इस प्रकार हम जन संकुलन के स्वरूप के बारे में निम्नांकित तथ्य प्राप्त करते हैं
i: जनसंकुलन का संबंध व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक अनुभूति से होता है ना की परिस्थिति के भौतिक एवं स्थानीय हालातों से.
ii: जन संकुलन घनत्व से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता है. iii: जन संकुलन में व्यक्ति उपलब्ध स्थान में उपस्थित व्यक्तियों की संख्या का विशेष ढंग से प्रशिक्षण करता है.
3. सामाजिक श्रमावनयन - सामाजिक सरलीकरण के समान ही व्यक्ति के व्यवहार पर समूह के प्रभाव के कारण एक दूसरी घटना अक्सर देखने को मिलती है. लताने 1981 ने सामाजिक श्रमावनयन कहां है. अक्सर यह देखा गया है कि जब व्यक्ति एक समूह से होकर कोई कार्य करता है, तो वह अपने ऊपर उठने जवाबदेही रहकर कार्य नहीं करता है जितना कि वह कार्य को अकेले करता है, इसका परिणाम यह होता है कि उस कार्य का निष्पादन खराब हो जाता है इसे ही सामाजिक श्रमावनयन कहा जाता है. मायर्स (Myres, 1988) के शब्दों में- "सामाजिक श्रमावनयन से तात्पर्य लोगों की उस प्रवृत्ति से होता है जिसमें वह किसी सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति की और कार्य करने पर उस कार्य के लिए अकेले उत्तरदाई होने की अपेक्षा कम प्रयास करते हैं.
4. निर्वैयक्तिकरण - व्यक्ति के व्यवहार पर समूह का एक ऐसा भी प्रभाव पड़ता है जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तित्व खो देता है क्योंकि आत्म जानकारी लगभग समाप्त हो जाती है और वह अपने आप को समूह में पड़ता समावेशित कर लेता है. इस स्थिति को festinger, Pepitone, and Newcomb 1952 ने निर्वैयक्तिकरण (deindividuation) संज्ञा दिया है. उसकी एक उत्तम परिभाषा फिशर (Fisher. 1982) ने इस प्रकार दी है-" निर्वैयक्तिकरण एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें समूह में होने पर भी व्यक्ति को व्यक्ति विशेष के रूप में नहीं देखा जाता है बल्कि वे समूह में ही आप लावित हो जाते हैं और अपनी व्यक्ति की पहचान खो जाने का अनुभव करते हैं."
फेल्डमैन (Feldman, 1985) के अनुसार "यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसमें आत्मा विश्वास जानकारी की कमी हो जाती है. अन्य लोगों द्वारा नकारात्मक मूल्यांकन का डर में कमी हो जाती है और परिणाम स्वरूप व्यक्ति आवेग शील, समाज विरोधी रूप से प्रचलित व्यवहारों को करता पाया जाता है." इन परिभाषा के आधार पर हमें निम्नांकित तथ्य प्राप्त होते हैं-
• एक मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है जो विशेष प्रकार की समूह परिस्थिति खासकर वैसी परिस्थिति जो व्यक्ति में गुमनामी उत्पन्न करता है तथा व्यक्ति के ध्यान को अपने आप से अविकसित करता है।
• इसमें व्यक्ति समूह में होते हुए भी अपने व्यक्तित्व से अवगत नहीं होता है।
• इसमें व्यक्ति को नकारात्मक मूल्यांकन का डर नहीं रहता है क्योंकि वह जानता है कि उसकी पहचान संभव नहीं हो पाएगी।
• इसके कारण व्यक्ति प्रायः आवेगसील, आक्रामक, एवं समाज विरोधी व्यवहार करता पाया जाता है।
अतः यह स्पष्ट हुआ कि यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसमें समूह में होते हुए भी व्यक्ति की अपनी पहचान खत्म हो जाती है और इस गुमनामी की आड़ में तरह-तरह के समाज विरोधी व्यवहार को अंजाम देने में वह तनिक भी मुकरता नहीं है.
5. समूह ध्रुवीकरण - समूह ध्रुवीकरण के संप्रत्यय का प्रतिपादन मोस्कोवीसी (Moscovici) एवं फ्रेजर(Fraser) द्वारा किया गया. समूह ध्रुवीकरण से तात्पर्य इस बात से होता है कि समूह परिचर्चा से समूह के सदस्यों की आरंभिक मनोवृति का झुकाव पहले से और भी अधिक मजबूत हो जाती है. जैसे यदि किसी समूह के सदस्य में भारत के विदेश नीति के प्रति एक विशेष और सर झुकाओं नकारात्मक है, तो समूह परिचर्या के बाद दिया झुकाओं और भी अधिक नकारात्मक हो सकता है, उसी तरह से समूह के सदस्यों का औषध झुकाओ सकारात्मक है, तो समूह परिचर्या के बाद या झुकाओ और भी अधिक सकारात्मक हो सकता है. स्पष्टत: तब समूह ध्रुवीकरण प्राप्त कल्पना इस बात की ओर इशारा करता है कि समूह के सदस्यों की मनोवृत्ति झुकाओ समूह परिचर्चा से और भी अधिक मजबूत हो जाती है. ध्रुवीकरण को दिखाने के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा कई तरह के प्रयोग किए गए हैं एक प्रमुख प्रयोग मोस्कोवीसी तथा जावालोवी (Zavallovi. 1969) द्वारा किया गया. यह अध्ययन फ्रेंच छात्रों के एक समूह पर किया गया. परिचर्या के प्रारंभ के पहले इन छात्रों की मनोवृत्ति फ्रांस के प्रधानमंत्री के प्रति अनुकूल तथा अमेरिकन के प्रति नकारात्मक थी. समूह परिचर्या के समाप्त होने के बाद यह देखा गया कि फ्रांस के प्रधानमंत्री के प्रति इन छात्रों की मनोवृत्ति पहले से और अधिक अनुकूल तथा अमेरिकन के प्रति पहले से और अधिक प्रतिकूल हो गई.
मायर्स तथा बिशप (Myres and Bishop. 1970) ने एक दूसरा अध्ययन किया जिसमें यह पाया गया कि हाईस्कूल के पूर्वाग्रह छात्रों की मनोवृत्ति समूह परिचर्चा के बाद और अधिक पूर्वाग्रहित हो गई तथा कम पूर्वाग्रह छात्रों की मनोवृत्ति समूह परिचर्चा के बाद और कम हो गई. इन अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि समूह परिचर्चा के बाद समूह की मनोवृत्ति का अंत की ओर ध्रुवीकरण हो जाता है. ध्रुवीकरण निम्नांकित दो तरह के प्रभाव के कारण होता है.
i: सूचना संबंधी प्रभाव- जब व्यक्ति समूह में किसी समस्या के बारे में परिचर्चा करता है, तो इससे सदस्यों का एक दूसरे का तर्क सुनने का मौका मिलता है तथा साथ ही समस्या के प्रति व्यक्ति की अपनी स्थिति का पता भी चलता है,
ii: मानक संबंधी प्रभाव ध्रुवीकरण की दूसरी व्याख्या अन्य लोगों के साथ सामाजिक तुलना के रूप में की गई है, इस व्याख्या का आधार फेस्टिंगर (festinger, 1954) द्वारा प्रतिपादित सामाजिक तुलना सिद्धांत में व्यक्त किया गया वह विचार है जिसमें यह कहा गया है कि व्यक्ति अपने विचारों का मूल्यांकन अन्य लोगों के विचारों के साथ तुलना करके करता है. प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा यह होती है
कि उनका प्रत्यक्ष और तथा मूल्यांकन अन्य व्यक्तियों द्वारा अनुकूल ढंग से किया जाए, जब समूह में वे यह पाते हैं कि अन्य सदस्यों द्वारा उनके विचारों का अनुकूल मूल्यांकन उतना किया जा रहा है जितना कि वे उम्मीद भी नहीं किए थे, तो साधारण वे अपने विचार या मत को और भी अधिक ढंग से व्यक्त करने लगते हैं. परिचर्चा में जब सदस्य अपने विचारों की तुलना अन्य व्यक्ति की विचारों से करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अधिकतर लोग उनके विचार के आरंभिक स्थिति का समर्थन करने वाले हैं तो इससे उनकी आरंभिक विचार और भी मजबूत हो जाता है. जिसके कारण ध्रुवीकरण की घटना होते देखी गई है.
कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि सामाजिक तुलना तथा अर्थात मानक संबंधी प्रभाव तथा सूचना संबंधी प्रभाव दोनों ही एक दूसरे के विरोधी ना होकर साथ साथ होते हैं और समूह ध्रुवीकरण उत्पन्न करते हैं.
जब समूह परिचर्या में व्यक्ति को यह पता चलता है कि अन्य लोग भी उनके विचारों से सहमत हैं उनका तर्क या सूचना में विश्वास अधिक बढ़ जाता है और तब इससे उस व्यक्ति की आरंभिक मनोवृति और भी अधिक मजबूत हो जाती है।
6. समूह सोच- व्यक्ति का व्यवहार समूह सोच द्वारा काफी प्रभावित होता पाया गया है. समूह सोच एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें समूह के लोग अपने वास्तविक विचार को इस कारण अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं क्योंकि समूह की असहमति की समग्रता बनाए रखने के ख्याल से इसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है. जैनिस 1971 1972 ने निम्नांकित रूप से परिभाषित किया है-" समूह सोच से तात्पर्य समूह के भीतर के दबावों के परिणाम स्वरूप नैतिक निर्णय, वास्तविकता की जांच तथा मानसिक क्षमता में उत्पन्न कमी से होता है," इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि समूह सोच की अवस्था उत्पन्न होने पर व्यक्ति की अपनी आलोचनात्मक चिंतन क्षमता समूह के भीतर के दबावों को सामने समाप्त हो जाती है और समूह समग्रता के दिखावे के नाम पर गलत निर्णय ले लिया जाता है.
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