मनुष्य सामाजिक संज्ञान में संगति का अन्वेषी - Investigator of Consistency in Human Social Cognition
मनुष्य सामाजिक संज्ञान में संगति का अन्वेषी - Investigator of Consistency in Human Social Cognition
संज्ञानों के मध्य असंगति स्वाभाविक रूप से अप्रिय होती है। इस तनाव से बचाने के लिए व्यक्ति अपने संज्ञानों में संगति की खोज करता है। व्यक्ति असंगत सामाजिक सूचनाओं को ज्यों का त्यों कूट संकेतित नहीं करता बल्कि अपने संज्ञान को संगत बनाये रखने के लिए तार्किकीकरण का सहारा लेता है।
इस संज्ञानात्मक संगति को हाइडर (1958) ने संज्ञानात्मक संतुलन, न्यूकाम्ब (1953) ने सममिति,आसगुड एवं टैननवाम (1955) ने संगति, फेस्टिंगर (1957) ने सन्नादिता का नाम दिया।
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