जैन सामाजिक व्यवस्था - Jain social system
जैन सामाजिक व्यवस्था - Jain social system
जैन मतावलंबियों ने सबसे महान उपदेशकर्ता के रूप में वर्धमान महावीर को माना है, जो कि उनके 24वें तीर्थंकर माने जाते हैं। इनके पूर्व 23 आचार्य इस धर्म से जुड़े हुए हैं और उन्हें भी तीर्थंकर के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। महावीर को जैन धर्म का अंतिम तीर्थंकर माना जाता है तथा इस आधार पर जैन धर्म का उद्भव काल ईसा पूर्व नौवीं सदी माना जा सकता है। परंतु कुछ विद्वानों के अनुसार जैन धर्म के आरंभिक तीर्थंकर, अर्थात् प्रारंभिक पंद्रह तीर्थंकरों तक. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से संबंधित हैं: यदि इस अनुमान को माना जाए तो उनकी एतिहासिकता को जान पाना दुष्कर है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मध्य तटीय गंगा का कोई भी भाग ईसा पूर्व छठवीं सदी के पूर्व तक ठीक से स्थापित नहीं हो पाया था। कुछ विद्वानों का मत है कि जैन धर्म की एतिहासिकता सिद्ध करने हेतु इन मिथक-कथाओं को तैयार कर लिया गया कि इन तीर्थंकरों ने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया।
जैन धर्म के सैद्धांतिक उपदेष्टा पार्श्वनाथ माने जाते हैं, जो 23वें जैन तीर्थंकर हैं। इनका निवास स्थान वाराणसी, उत्तर प्रदेश माना जाता है।
उन्होंने सुखों का त्याग कर सन्यासी जीवन को अपना लिया तथा इस दौरान उन्होंने कई उपदेश और कल्याण वचन दिए। हालांकि जैन धर्म की स्थापना का श्रेय उनके आध्यात्मिक शिष्य वर्धमान महावीर को दिया जाता है। महावीर और बुद्ध के जीवन काल में सटीक अंतर प्रस्तुत कर पाना मुश्किल है। महावीर का जन्म वैशाली के पास किसी गाँव में 540 ईसा पूर्व माना जाता है। यह स्थान उत्तर बिहार में माना जाता है। महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ था तथा वे क्षत्रिय कुल के प्रधान थे। महावीर की माता का नाम त्रिशला था और वह बिंबिसार के स्वसुर लिच्छवि नरेश चेटक की बहन थीं। अतः यह कहा जा सकता है कि उनका संबंध मगध के राजपरिवार से है। इस कारण उन्हें धर्म प्रसार में अधिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा। राजाओं तथा राजसचिवों के साथ संपर्क होने के कारण वे अपनी बातों और उपदेशों को सरलता से प्रसारित कर सकते थे।
गौतम बुद्ध की तरह ही महावीर भी अपने आरंभिक जीवन में गृहस्थ जीवन में थे।
30 वर्ष की आयु में महावीर ने गृहस्थ जीवन का परित्याग किया तथा सन्यास जीवन को अंगीकृत कर वे सांसारिक जीवन से विरक्त हुए। 12 वर्षों तक वे यहाँ से वहाँ भ्रमण करते रहे। महावीर किसी भी गाँव में एक दिन से ज्यादा नहीं रुकते थे तथा किसी भी शहर में पाँच दिन से ज्यादा नहीं रहते थे। इन 12 वर्षों की यात्रा के दौरान महावीर ने कभी भी बस्त्र नहीं बदले। किंतु 42 वर्ष की आयु में कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने वस्त्रों का त्याग कर दिया। कैवल्य द्वारा महावीर ने सुख-दुख पर विजय प्राप्त कर ली। इसी कारण वे महावीर की संज्ञा पाए तथा उनके अनुयाई जैन कहलाए। महावीर ने कोशल, मगध, चंपा, मिथिला आदि स्थानो पर 30 वर्षों तक प्रचार-प्रसार किया। उनका निर्वाण 72 वर्ष की आयु में हुआ। कुछ विद्वान इसका समय 468 ईसा पूर्व मानते हैं, तो कुछ इसका समय 527 ईसा पूर्व।
वार्तालाप में शामिल हों