न्यायिक तलाक - Judicial Divorce
न्यायिक तलाक - Judicial Divorce
शरीयत अधिनियम (Judicial Divorce) 1937 के पहले पत्नी दो आधारों पर विवाह विच्छेद कर सकती थी। वे आधार ये है
1. पति का नपुंसक होना।
2. पति द्वारा पत्नी पर लगाया व्यभिचार का आरोप गलत सिद्ध होना।
शरीयत अधिनियम, 1937 के अनुसार, इला (IIla) और जिहर (Zihar) के आधार पर भी विवाह विच्छेद किया जा सकता है।
मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939 (Dissolution of Muslim Marriage Act, 1939) द्वारा मुस्लिम स्त्रियों की विवाह-विच्छेद संबंधी सभी निर्योग्यताएँ एवं असमानताएँ दूर कर दी गई है और उन्हें विवाह-विच्छेद संबंधी अनेक अधिकार प्रदान किए गए हैं। इन अधिकारों के प्राप्त होने से मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उपर्युक्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि मुसलमानों में तलाक एक सामान्य घटना है और
विशेष रूप से पुरुषों के लिए तलाक सरल है, परंतु वास्तव में मुसलमानों में तलाक बहुत ज्यादा नहीं होते। मुहम्मद साहब तलाक के अधिकार के कम-से-क प्रयोग के पक्ष में थे। वे विवाह और परिवार को स्थायित्व प्रदान करना चाहते थे तथा तलाक के अधिकार और प्रयोग को सीमित। उन्होंने तलाक की आज्ञा उसी स्थिति में दी है जब दोनों पक्षों को यह भय हो कि कि वे ईश्वरीय सीमा के भीतर नहीं रह सकते। एक मुस्लिम जनश्रुति के अनुसार विवाह-विच्छेद-कानून-सम्मत तो है. परंतु ईश्वर इसे पसन्द नहीं करता। तलाक संबंधी अपने निर्णय पर पुनः विचार करने और तलाक को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ही ‘इद्देश्य से ही ‘इद्दत' की अवधि पर इतना जोर दिया गया है। डॉ. कापड़िया ने बतलाया है कि अपने जीवन के अन्त में पैगम्बर इतने आगे बढ़ गए कि उन्होंने पंचों अथवा न्यायाधीशों के हस्तक्षेप के बिना इसका उपयोग पुरुषों के लिए करीब-करीब निषिद्ध-सा ही कर दिया। आपने आगे बतलाया है कि बाद के न्यायशास्त्रियों ने विवाह-विच्छेद की आवृत्ति को सीमित करने का प्रयत्न किया। उनके अनुसार, पति द्वारा चाहा गया तलाक वास्तव में पत्नी की सहमति के बिना निषिद्ध था। अतः हनाफी मलिकी. शफी और अधिकांश शिया विवाह-विच्छेद की अज्ञा तो देते हैं,
परंतु बिना कारण इसका उपयोग न्याय सम्मत नहीं मानते।'' स्पष्ट है कि, चाहे मुहम्मद साहब के पूर्व अरब समाज में विवाह-विच्छेद का काफी प्रचलन रहा तो तथापि वे इसके पक्ष में नहीं थे। उन्होंने तलाक को सीमित कर परिवारों में स्थिरता लाने का काफी प्रयास किया। कानून की दृष्टि से तलाक के संबंध में स्त्री की स्थिति निराशाजनक अवश्य प्रतीत होती है, परंतु व्यवहार में वास्तव में ऐसा नहीं है। इम्तियाज अहमद ने अपनी पुस्तक में वर्णित विभिन्न मुस्लिम समुदायों के अध्ययन से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर बताया है कि तलाक अधिकतर समूहों में सामाजिक दृष्टि से अस्वीकृत है और इससे न केवल तलाक करने वाले दोनों पक्षों की बल्कि उनके परिवारों की भी सामाजिक प्रतिष्ठा गिरती है। यही कारण है कि मुसलमानों में तलाक बहुत कम होते हैं। साथ ही, सामाजिक प्रथा के अन्तर्गत कुछ संगठनात्मक साधनों को स्वीकार किया गया है जिनके माध्यम से स्त्री अपने पति को तलाक के लिए बाध्य कर सकती। यद्यपि इस्लामी काननू के अनुसार बहु-विवाह तथा तलाक की दृष्टि से स्त्री की स्थिति कमजोर है, लेकिन व्यवहार रूप में इन दोनों ही मामलों में सामाजिक प्रथा कानून के प्रावधानों से काफी भिन्न है।
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