खासी जनजाति - Khasi Tribe

 खासी जनजाति - Khasi Tribe


खासी शब्द आस्ट्रो-एशियाट्रिक भाषा बोलने वाले मॉन-खामेर निकोबार समूह को इंगित करता है। जो दक्षिण पूर्व एशिया से उत्तर पूर्व भारत की पहाड़ीयों में आकर रहने लगे। खासी प्राय: मेघालय की खासी हिल एवं जयन्तिया हिल में रहने वाले सभी जनजातियां एवं उप-जनजातियों के लिए प्रयुक्त होता है। खासी वर्तमान में मेघालय के खासी हिल, जयन्तिया हिल एवं बह्मपुत्र के उत्तरी ढलान तथा सूरमा बेली के आस पास निवासरत है। अपने व्यापक अर्थ में खासी, जयन्तिया, पनार, लिंगयाम, भोई, बार तथा खेनराम आदि सभी समुदायों के लिए भी प्रयुक्त होता है। ये समुदाय खासी बोली बोलते एवं रोमन लिपि का प्रयोग करते हैं। कुछ खासी हिंदी, असमी एवं बंगाली बोलते है तथा देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं, यद्यपि खासी जनजाति का अपना परंपरागत धर्म है एवं ज्यादातर लोग इसी धर्म का अनुसरण करते है, परंतु कुछ लोग हिंदू धर्म, क्रिष्चियन, इस्लाम एवं जैन तथा बौद्ध धर्म के भी अनुयायी है। ये खासी विवाह समारोह, बाजार एवं त्यौहारों के माध्यम से दूसरे समुदायों से भी घनिष्ठता एवं जुड़ाव रखते हैं।


स्वतंत्रता के पश्चात् राष्ट्रवाद की धारा के परिणामस्वरूप इनके बीच जनजातीय धर्म एवं जनजातीय पहचान के लिए बहुत से आंदोलन भी हुए त्रिपुरा में रहने वाले खासी आपस में खासी बोली तथा दूसरो से बंगाली भाषा में बात करते हैं। परंपरागत रूप से ये लोग स्थानांतरित कृषि करते रहे हैं, परंतु वर्तमान में ये स्थाई कृषि एवं सरकारी नौकरी आदि करते हैं। इस समुदाय के लोग स्थानीय मदिरा बनाते हैं एवं बड़ी मात्रा में इसका उपयोग भी करते हैं, इनके भोजन में चावल, मांस मछली, जड़ एवं कंद-मूल शामिल है। खासी जनजाति के प्रमुख उप-समुदाय भोई, खेनराम, लिंगयाम एवं बार इत्यादि है। इनमें भी सर्वाधिक जनसंख्या वाले दो उपसमुदाय हैं- खेनरियाम एवं लिंगयाम। यह जनजाति भी मातृवंशीय एवं मातृसत्तात्मक जनजाति है। यह बहुत से मातृवंशीय गोत्र समूहों में विभक्त हैं, प्रजातिय दृष्टिकोण से ये लोग आस्ट्रो एशियाट्रिक प्रजाति के अंतर्गत आते हैं इनके मुख्य भोजन में प्रायः सभी प्रकार के मांसाहार एवं चावल का प्रमुख स्थान है। यह गोत्र बहिर्विवाही समुदाय है, अर्थात एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है, क्योंकि ये समुदाय मातृसत्तात्मक भी है इसलिए परिवार की मुखिया महिला होती है, बच्चें माता एवं पिता दोनों के गोत्र का अनुसरण करते हैं।


खासी जनजाति विश्व की शेष बची हुई मातृवंशीय जातियों में से एक है। यह भारत के सर्वाधिक प्रगतिशील जनजाति सम्प्रदायों में से एक है, जिनकी अर्थव्यवस्था ठोस व्यवसाय, उद्योग तथा नगरीयकरण में परिवर्तित हो गयी है। शैक्षिक रूप में ये भारत के बहुत से अजनजातीय समुदायों से अधिक उच्च स्तरीय हैं तथा देश की उच्च सेवाओं में इनका विशेष प्रतिनिधित्व है। असम के संयुक्त खासी तथा जैन्तिका पहाड़ी जिले जो खासी जनों के पारंपरिक आवास है, अब नवजात मेघालय प्रदेश के अंतर्गत है जिसे सन् 1972 में पूर्ण प्रदेश घोषित कर दिया गया है। अब मेघालय में बहुसंख्या खासी, गारो तथा अन्य अल्पसंख्यक जनजातियों की है, जिसमें खासीजनों की संख्या अधिक है तथा प्रदेश के राजनीतिक अधिकार भी इनके पास सर्वाधिक है। सामाजिक रूप में खासी चार समूहों में विभक्त हैं यथा- खाईनरियन खासी, जो खासी पहाड़ के शिलांग पठारी प्रदेश में है, जैन्तिया पहाड़ के पठार, जिले की पश्चिमी तथा दक्षिणी ढलानों पर स्थित वारजन तथा नीचे सतह पर स्थित भोई जन इन चार समूहों के अतिरिक्त दो अन्य समूह जिन्हें हाल में ही खासीजनों ने मान्यता प्रदान की है वह है जैन्तिया पर्वत के हदेम तथा खासी पर्वत के लंगम।

चूँकि उपर्युक्त खासियों के सभी समूहों ने भूतकाल में अन्तः विवाह की क्षेत्रीय सीमाओं का अनुकरण किया है, अतः इन्हें खासी उप जनजातियों माना जा सकता है।


संयुक्त खासी तथा जैन्तिया पहाड़ी जिला जो खासीजनों का अपना आवास क्षेत्र है, इसका क्षेत्रफल 5,541 वर्ग मील है। उत्तर में यह ब्रह्मपुत्र घाटी से (असम के कामरूप तथा नौगांग जिले) पूर्व में संयुक्त मिकिर व उत्तरी कद्दार पहाड़ जिले से, दक्षिण में सिलहट (अब बांग्लादेश का एक भाग) व कद्दार से तथा पश्चिम में गारो पहाड़ से यह घिरा हुआ है। खासी भूमि चार पठारों से निर्मित है जो सिलहट के निचले मैदानों से 4,000 फीट ऊँची है तथा जहाँ विश्व की सबसे भारी वर्षा होती है। उत्तरी भाग में इससे अधिक ऊँची पठार माओफलांग है, जो समुद्री स्तर से 6,000 फीट की ऊँचाई पर है जहाँ कुछ गांव शेष बचे हुए हैं। यह जिले का उच्चतम क्षेत्र है तथा प्रदेश की राजधानी शिलांग भी इसी भाग में है।


इस क्षेत्र की विशिष्टता इसका मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्य है। असम के कुछ सर्वश्रेष्ठ फलोद्यान जहाँ संतरा, अनान्नास तथा केले की सर्वोत्तम खेती की जाती है, इसी क्षेत्र की देन है। प्रकृति का सर्वाधिक आकर्षक रूप इसकी अनगिनत नदियों, छोटी-छोटी पहाड़ी धाराओं, कल-कल निनाद करते हुए झरनों तथा चित्रात्मक परिवेश में है।

समस्त क्षेत्र अत्यंत मनोरम है तथा शिलांग एक अत्याधुनिक प्रचलित स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित हो गया है। यह पहाड़ी क्षेत्र साल, ओक, चीड़ तथा अन्य वनस्पतियों से आच्छादित है। उत्तरी तथा पश्चिमी पहाड़ियों के निचले स्थानों पर बाँस उत्पन्न होता हैं। पशुओं में विशाल रूप से शूकर, हाथी, बन्दर, चीते, हिरन, जंगली कुत्ते आदि पाए जाते हैं।


प्रजातिगत तौर पर खासी चारों ओर बिखरी हिन्द मंगोली जनजातियों से सर्वथा भिन्न है। अधिकांश मतों के अनुसार ये भारतीय मोन जाति की शाखा से ही संबंधित है “मलय” जनों से निकट सान्निध्य को प्रकट करते हैं। भाषागत रूप में ये "मोनखमेर" परिवार के अंतर्गत आते हैं क्योंकि जिस भाषा का ये प्रयोग करते हैं वह आस्ट्रिक परिवार के मोनखमेर शाखा में बोली जाती है। सामान्यतया खासी गाँव पर्वत शिखरों के नीचे बसे हुए हैं, अधिकांशतः सतह से निचले स्तर पर जो पहाड़ी नागा तथा कुकी जनजातियों से सर्वाथा भिन्न है। क्योंकि वे पर्वतों के उच्चतम क्षेत्रों में ही रहना पसंद करते हैं। उत्पादन हेतु ये अपने खेतो से आर्थिक जीवन के लिए जुड़े रहते हैं। किसी खासी को उपजाति में ही विवाह करना पड़ता है। किंतु इस विषय में यह अत्यधिक अंधविश्वासी नहीं होते हैं। खासी जनजाति की समस्याएं देश के अन्य पहाड़ी लोगो से भिन्न नहीं है इनकी अपनी आर्थिक समस्याओं के अतिरिक्त कोई अन्य समस्या नहीं है।