प्रयोगशाला प्रयोग विधि , गुण ,अवगुण - Laboratory experiment methods , advantages ,disadvantages
प्रयोगशाला प्रयोग विधि , गुण ,अवगुण - Laboratory experiment methods , advantages ,disadvantages
प्रयोगशाला प्रयोग विधि वह है जिसमें समाजविज्ञानी किसी सामाजिक व्यवहार का अध्ययन प्रयोगशाला में प्रयोग करके करते हैं। इस विधि में प्रायः प्रयोज्य की एक सीमित संख्या का यादृच्छिक रूप से चयन करके उसे आवश्यकतानुसार भिन्न भिन्न समूह जैसे प्रयोगात्मक समूह तथा नियंत्रित समूह में बांटकर करते हैं। स्वतंत्र चर में जोड़ तोड़ या हेरफेर कर उसका प्रभाव आश्रित चर पर देखा जाता है। अन्य चरो को जिसका प्रभाव आश्रित चर पर पड़ सकता है परंतु उसके प्रभाव के अध्ययन में प्रयोगकर्ता की कोई रुचि नहीं होती है, नियंत्रित करके रखा जाता है इसे वहिरंग चर कहा जाता है। यदि स्वतंत्र चर में जोड़ तोड़ करने से आश्रित चर में भी कुछ परिवर्तन आ जाता है, तो समाज मनोविज्ञान इन दोनों चरो में कारण परिणाम संबंध के बारे में एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं। इस तरह से समाज मनोवैज्ञानिक जब प्रयोगशाला विधि द्वारा किसी सामाजिक व्यवहार का अध्ययन करते हैं, तो वे एक सीमित प्रयोज्यो का यादृच्छिक रूप से चयन करके प्रयोगशाला में एक कृतिम परिस्थिति सृजन करते हैं
और फिर स्वतंत्र चर तथा आश्रित चर मेक कारण परिणाम संबंध स्थापित करते हैं | समाज मनोविज्ञान में इस विधि द्वारा किए गए शोध को उद्दीपन अनुक्रिया शोध भी कहा जाता है। यहां उद्दीपन से मतलब स्वतंत्र चर तथा अनुक्रिया से मतलब आश्रित चर से होता है। प्रयोगशाला विधि के कुछ गुण दोष है। इस विधि के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं
प्रयोगशाला विधि के गुण
(i) प्रयोगशाला प्रयोग विधि में प्रयोग एक काफी नियंत्रित अवस्था में किया जाता है, अतः इसके परिणाम की आंतरिक वैधता काफी अधिक होती है।
(ii) इस में प्रयोग की अवस्था काफी नियंत्रित होती है, अतः चाहकर भी प्रयोगकरता किसी प्रकार का पक्षपात तथा पूर्वाग्रह आदि नहीं दिखला पाता है।
(iii) प्रयोगशाला प्रयोग विधि में चरों में जोड़ तोड़ संभव है, अतः प्रयोग करता हर तरह से अपने आप को संतुष्ट कर प्रयोग को अधिक विश्वसनीय बना लेता है।
(iv) क्योंकि इसमें शाला प्रयोग के परिणाम का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है, अतः इसका परिणाम अधिक वस्तुनिष्ठ होता है।
प्रयोगशाला प्रयोग विधि के अवगुण
(i) इस विधि में सामाजिक व्यवहार का अध्ययन एक कृत्रिम अवस्था में किया जाता है क्योंकि इसमें प्रयोगशाला की परिस्थिति कृतिम होती है जिसका संबंध कभी-कभी जीवन की वास्तविक परिस्थिति से ना के बराबर होता है, अतः इससे प्राप्त परिणाम इन वास्तविक हालातों के लिए प्राय: सही नहीं होता है।
(ii) प्रयोगशाला प्रयोग विधि में बाहरी वैधता के कमी का एक दूसरा कारण प्रयोज्य की एक सीमित संख्या होती है।
(iii) प्रयोगशाला प्रयोग विधि द्वारा सभी तरह के सामाजिक व्यवहारो का अध्ययन करना संभव नहीं है। जैसे यदि कोई समाज मनोवैज्ञानिक भीड़, क्रांति युद्ध आदि का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार पर कैसे पड़ता है, का अध्ययन इस विधि द्वारा करना चाहता है तो शायद वह ऐसा करने में समर्थ नहीं हो पाएगा क्योंकि प्रयोगशाला में भीड़. क्रांति तथा युद्ध की स्थिति पैदा नहीं की जा सकती है।
इन अवगुणों के बावजूद भी समाज मनोविज्ञान में प्रयोगशाला प्रयोग विधि का उपयोग आधुनिक समाज मनोवैज्ञानिकों द्वारा काफी किया जा रहा है।
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