मात्रात्मक से गुणात्मक परिवर्तनों में परिवर्तन का नियम - law of change from quantitative to qualitative changes

मात्रात्मक से गुणात्मक परिवर्तनों में परिवर्तन का नियम - law of change from quantitative to qualitative changes


प्रकृति में प्रत्येक वस्तु निरंतर परिवर्तन की स्थिति में हैं। किसी भी नियत समय पर कुछ वस्तुएँ अस्तित्व में रहती हैं, कुछ वस्तुएँ विकसित होती रहती हैं तथा कुछ वस्तुएँ नष्ट होती रहती हैं। मार्क्स की •मान्यता थी कि यथार्थ का नियम परिवर्तन का नियम है। परिवर्तन की प्रकृति सरल अथवा क्रमिक नहीं होती, अपितु यह मात्रात्मक परिवर्तनों के रूप में होती रहती है और परिपक्व दशाओं की उपलब्धि होने पर किसी भी निश्चित समय पर अमूर्त गुणात्मक परिवर्तनों में परिवर्तित हो जाती हैं। घटनाओं की पुनरावृत्ति कभी नहीं होती। यह परिवर्तन सदैव निम्न से उच्च की ओर तथा सरल से जटिल की ओर होती है। गुणात्मक परिवर्तन को किसी भी नई अवस्था के उद्भव तथा किसी भी प्राचीन अवस्था की समाप्ति का तार्किक एवं दार्शनिक रूप कहा जा सकता है. जबकि मात्रात्मक परिवर्तनों के अंतर्गत अन्य सभी परिवर्तन जिनमें किसी भी वस्तु के विभिन्न अंग पुनर्व्यवस्थित हो जाते हैं, के रूप में समझा जा सकता है। गुणात्मक परिवर्तनों के दो स्वरूप होते हैं- 


1. कोई वस्तु जिसका अस्तित्व नहीं था, किंतु अब वह अस्तित्व में आ गया है तथा 


2. कोई वस्तु जो पहले अस्तित्व में थी, लेकिन अब उसका अस्तित्व समाप्त हो गया है। दूसरी ओर मात्रात्मक परिवर्तन असीमित रूप से व्यापक होते हैं। उदाहरणार्थ छोटा-बड़ा. समृद्ध-निर्धन आदि। वस्तुतः प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में मात्रात्मक परिवर्तन निरंतर घटित होते रहते हैं। जब निरंतर परिवर्तन एक विशिष्ट सीमा तक पहुँच जाता है, जिसके बाद और अधिक मात्रात्मक परिवर्तन संभव नहीं है। तब इस बड़े परिवर्तन को गुणात्मक परिवर्तन की संज्ञा दी जाती है।