लेवीस्ट्रास - Levistras
लेवीस्ट्रास - Levistras
आपने गोत्र के बनने के बारे में ऊपर पढ़ा है। गोत्र के तहत वे लोग आते थे जिनके बीच विवाह निषिद्ध था। अब तक ज्ञात सभी समाजों में कुछ निकट लोगों का एक सीमांकित दायरा ज़रूर पाया गया है जिनके बीच विवाह निषिद्ध होता है। इसे निषिद्ध निकटाभिगमन (Incest Taboo ) कहा जाता है। मॉर्गन ने इसे प्राकृतिक वरण के तहत होने वाली परिघटना माना। मानव के विकास की राह पर बने रहने के लिए यह ज़रूरी था। मॉर्गन के मुताबिक, इस निषेध को अपनाने वाले कबीले की संतानें अपेक्षाकृत ज्यादा उन्नत मस्तिष्क शरीर वाली होती थीं।
संरचनावादी मानवविज्ञानी लेवीस्ट्रास का मत है कि निषिद्ध निकटाभिगमन की सभी समाजों में पाई जाने वाली रीति का ताल्लुक माँ, बहन, बेटी या निकट के अन्य संबंधियों के साथ विवाह पर निषेध लगाने से उतना नहीं है जितना कि उन्हें अन्य पुरुषों को देने और बदले में उनसे स्त्रियाँ लेने से है।
स्त्रियों के विनिमय को वे विनिमय का पहला रूप मानते हैं। उनके साथ मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि पण्य (Commodity) की तरह व्यवहार किया जाता है। स्त्रियों के विनिमय की प्रक्रिया में ही लेवीस्ट्रास को स्त्री अधीनता की शुरुआत दिखाई देती है।
मानव संस्कृति के निर्माण के लिहाज से लेवीस्ट्रास ने भी निषिद्ध निकटाभिगमन को सकारात्मक माना है। इसे अपनाने के उपरांत ही कबीलों या गोत्रों के बीच स्त्रियों के विनिमय की संभावना उत्पन्न हो सकती थी। इस विनिमय के माध्यम से कबीलों के बीच का संबंध प्रगाढ़ होता था। इससे किसी क्षेत्र विशेष के कबीलों के बीच लगातार लड़ाई-झगड़े की जगह मिलजुल कर रहने का माहौल तैयार होता था।
यहाँ सवाल यह उठता है कि आखिर स्त्रियाँ ही विनिमय की वस्तु क्यों बनी, पुरुष क्यों नहीं? इसकी विद्वानों ने अलग-अलग व्याख्या की है। यहाँ उनमें से कुछ महत्वपूर्ण व्याख्याएँ निम्न हैं -
1. सी. डी. डार्लिंगटन का मत है कि विकास के पथ पर अग्रसर मनुष्य में अपने निवास स्थल की सीमित भौतिक परिस्थितियों के अनुकूल जीवित रहने के तौर-तरीके विकसित करने की अंतर्जात प्रवृत्ति थी। एक खास सीमा के बाद जनसंख्या को न बढ़ने देने के उपाय करना उसकी इसी प्रवृत्ति का हिस्सा था। स्त्रियों की यौनिकता पर नियंत्रण इसी के लिए किया गया उपाय था।
2. संरचनावादी मानवविज्ञानी क्लाउड मेलेसा ने भी स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण को उसके विनिमय की शुरुआत का कारण माना है, लेकिन वे इसे जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से किया गया उपाय नहीं मानते। क्लाउड मेलेसा के मुताबिक, शिकार-संग्रह अवस्था में स्त्री, पुरुष और बच्चे सभी आहार जुटाने और उसके उपभोग में शरीक होते हैं। उनके बीच का सामाजिक संबंध अस्थायी और अनिश्चित होता है। नातेदारी संरचना की कोई आवश्यकता नहीं होती। बागवानी-स्तर वाली खेती की अवस्था में इतनी उपज नहीं होती कि मनुष्य शिकार, मछली पकड़ना और खाद्य संग्रह करना छोड़ दे। इस अवधि में, समाज-व्यवस्था मुख्य तौर पर मातृवंशीय और मातृस्थानिक स्वरूप लिए हुई थी,
कबीले की सुरक्षा और निरंतरता स्त्री और पुरुष की संख्या में संतुलन बने रहने पर निर्भर करता था। लेकिन, प्रसव के दौरान स्त्रियों की जान को खतरा बना रहता था और कई स्त्रियों की मौत भी हो जाया करती थीं। ऐसे में कबीलों के बीच स्त्रियों की चोरी और इस क्रम में उनके बीच लड़ाई-झगड़े होने लगे। चोरी करके लाई गई स्त्री की सुरक्षा या तो वह करता था जो उसे चुरा कर लाया या फिर समूचा कबीला। उसकी रक्षा करने की प्रक्रिया की स्वाभाविक परिणति उस पर हक जमाने के रूप में हुई। हक ज़माने का नतीजा यह हुआ कि उसे सामान समझा जाने लगा। उसकी प्रजनन क्षमता पहले तो कबीले की संपदा मानी गई, लेकिन जैसे ही शासक वर्ग का उदय हुआ वैसे ही उस पर खास कुलों का आधिपत्य होता गया। • मेलेसा ने स्त्री की प्रजनक क्षमता के निजी संपदा में तब्दील होने की प्रक्रिया का ऊपर जो खाका खींचा
है, वह हल आधारित कृषि के विकास के साथ-साथ चलती है। बागवानी वाली खेती में ज़मीन खोदने का काम नुकीले छोटे हस्त- औजार से संभव था, इसलिए उसे मुख्यतः स्त्रियाँ ही करती आ रही थीं।
उसमें गर्भवती अथवा नवजात शिशु को दूध पिलाती स्त्रियाँ भाग ले सकती थीं, लेकिन ऐसी स्त्रियाँ हल खींचने का काम नहीं कर सकती थीं। वैसे भी, हल खींचकर ज़मीन खोदने में किसी छोटे हस्त-औजार से ज़मीन खोदने की तुलना में ज्यादा ताकत की ज़रूरत थी। इसलिए पुरुष का दबदबा बढ़ता गया। इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्रियों की भूमिका कम हो गई, बल्कि अब तो और भी ज्यादा श्रम करने वाले हाथ चाहिए थे। उत्पादन की इस प्रणाली में श्रम के ऐसे कई स्तर थे जहाँ संतानें और स्त्रियाँ दोनों लगाए जा सकते थे। संतानें अब आर्थिक दृष्टि से संपदा थे। इसलिए कबीले स्त्री की प्रजनक क्षमता को अपने वश में करने की ओर अग्रसर हुए।
मेलेसा का मत है कि चूँकि गर्भधारण और संतान को जन्म देने की क्षमता स्त्रियों में ही होती है न कि पुरुषों में, इसलिए स्त्रियों का ही विनिमय होना शुरू हुआ न कि पुरुषों का। यहाँ ध्यान देने की ज़रूरत है कि मेलेसा ने स्त्री की प्रजनक क्षमता पर नियंत्रण को पहले और निजी संपत्ति की उत्पत्ति को उसके बाद घटने वाली घटना माना, जबकि एंगेल्स के सूत्रीकरण के बाद यह धारणा आम हो चली थी कि पहले निजी संपत्ति का प्रादुर्भाव होता है और फिर स्त्री अधीनता की स्थिति में आती है।
3. मानवविज्ञानी पीटर आबी ने भी एंगेल्स की आलोचना करते हुए यही प्रतिपादित किया है कि स्त्रियों की प्रजनक क्षमता के नियंत्रण की बुनियाद पर ही निजी संपत्ति और राज्य के ढाँचे खड़े हुए। स्त्रियों की यौनिकता ही सबसे पहली निजी संपदा बनी। उनके मुताबिक, किसी समूह विशेष के ऊपर प्रतिकूल पारिस्थितिकी और अनियमित प्रजनन रूपी मँडराते विनाश के बादल ने स्त्रियों की प्रजनक क्षमता को बहुमूल्य निधि बना डाला और इसलिए उक्त समूह को उसे नियंत्रित करने की ओर अग्रसर किया।
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