परिकल्पना की सीमाएं - Limitations of Hypothesis

 परिकल्पना की सीमाएं - Limitations of Hypothesis


परिकल्पना की अवधारणा अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक इससे लाभ प्राप्त होते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर इसकी सीमाओं का अतिक्रमण करने से कई तरह की हानियां भी हो जाती हैं। अतएव एक सजग शोधकर्ता को सदैव इसकी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए। यदि शोधकर्ता इसकी सीमाओं के प्रति जागरूक नहीं रहेंगे तो अध्ययनकर्ता इसके दोषों एवं कमियों से सतर्क नहीं रह पाएगा। परिकल्पना का सृजन इसलिए किया जाता है जिससे कि अध्ययन कार्य के बीच यह पता रहे कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। किन तथ्यों को संचित करना है तथा किन को छोड़ना है, इसका भी पता रहे। परंतु कभी-कभी अध्ययनकर्ता ऐसा करने में असमर्थ रहते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए विद्वानों ने परिकल्पनाओं की सीमाओं की विवेचना की है जो निम्नलिखित है: 


(1) सामाजिक घटनाएं जटिल तथा परिवर्तनशील


सामाजिक अनुसंधान में जितनी भी परिकल्पनाओं का सृजन किया जाता है वे सामाजिक घटनाओं से जुड़ी होती हैं। सामाजिक घटनाएं परिवर्तनशील तथा जटिल होती हैं। जब परिकल्पना का सृजन किया जाता है उस वक्त सामाजिक घटनाओं की प्रकृति कुछ और रहती है। तथ्य संकलन करने तथा निष्कर्ष निकालते वक्त तक इसकी प्रकृति कुछ और हो जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि सामाजिक घटनाओं की प्रकृति परिवर्तनशील होने के कारण इसमें बदलाव आ जाता है। इस तरह बनाई गई परिकल्पना के आधार पर किया गया अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है। इस तरह यह अध्ययन उपयोगी तथा व्यवहारिक नहीं रह पाते हैं।

सामाजिक विज्ञानों की अपेक्षा प्राकृतिक विज्ञानों में परिकल्पना अधिक उपयोगी रहती है। उपरोक्त वर्णन से यह ज्ञात होता है कि अनुसंधान कार्य के लिए परिकल्पना का काफी महत्व है। छोटी सी असावधानी होने पर भी यह काफी नुकसानदायक साबित होती है। यह असावधानी कई कारणों की सामूहिक उपज होती है। पी.वी. यंग मत है कि अध्ययनकर्ता को साबित करने की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। उसे तो परिस्थितियों को सीखने तथा समझने की ओर ध्यान देना चाहिए। परिकल्पना के प्रति अनुसंधानकर्ता को निष्पक्ष रहना चाहिए। परिकल्पना सामाजिक शोध में महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ दोषपूर्ण भी है। परिकल्पना की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि इसका प्रयोग करने वाला कितना वस्तुनिष्ठ तथा अनुभवी है। साथ ही यदि तटस्थ रूप से वास्तविक तथ्यों के आधार पर उस परिकल्पना की प्रामाणिकता की परीक्षा नहीं की जाती है

तो ऐसी परिकल्पना से विज्ञान के किसी हित के होने की संभावना नहीं के बराबर रहती है। संभवत: इसलिए वेस्टावे ने चेतावनी देते हुए कहा है कि "परिकल्पनाएं वे लोरियां हैं जो असावधान को गाना गाकर सुला देती हैं।" इसलिए सजग होकर वास्तविक तथ्यों को कई रूप में देख कर परिकल्पना की परीक्षा करनी चाहिए। अतः परिकल्पना का सृजन भी ध्यानपूर्वक किया जाना चाहिए एवं उसका प्रयोग भी ध्यान पूर्वक किया जाना चाहिए जिससे इसकी सीमाओं अथवा दोष से बचा जा सके।


(2) परिकल्पना के अनुसार तथ्य संकलन:


इसकी एक प्रमुख सीमा अथवा दोष परिकल्पना के अनुरूप तथ्य संकलन करना कहा जा सकता है। अध्ययनकर्ता परिकल्पना के अनुरूप तथ्य संकलित करता है।

परंतु वास्तव में ऐसा नहीं होना चाहिए। अध्ययन क्षेत्र में अध्ययन करते वक्त जो वास्तविक तथ्य सामने आते हैं उनके परस्पर गुण संबंधों के आधार पर, परिकल्पना में परिवर्तन कर लेना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो अध्ययन के अंत में अप्रमाणित निष्कर्ष, असत्य तथा भ्रमपूर्ण निकलते हैं। इस संदर्भ में फ्राई ने अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा है, "केवल विशिष्ट सवालों के संदर्भ में ही तथ्यों का संचय नहीं करना चाहिए बल्कि एक संस्था अथवा स्थिति की खोज में प्रश्नों को हमेशा सुझाव के रूप में समझना चाहिए। अध्ययनकर्ता परिकल्पना को ही सब कुछ मान लेता है एवं इससे फायदे के स्थान पर हानियां ज्यादा हो जाती हैं।" इस तरह यह ज्ञात होता है कि परिकल्पना के अनुसार तथ्य संचय करना इसकी एक सीमा अथवा दोष है। 


(3) परिकल्पना को अंतिम मार्गदर्शक मानना :


परिकल्पना का एक मुख्य दोष यह है कि शोधकर्ता परिकल्पना को अंतिम मार्गदर्शक मान बैठता है। सही मायने में यह होना चाहिए कि अनुसंधानकर्ता परिकल्पना का अंधानुकरण न करें।

वह परिकल्पना के अनुरूप ही अध्ययन क्षेत्र में तथ्यों को संचय करता है। अपने मस्तिष्क का वह बिल्कुल प्रयोग नहीं करता है। इससे अध्ययन वैज्ञानिक तथा सही नहीं हो पाते है। उसके द्वारा संचित ज्ञान का उपयोग वह पक्षपातपूर्ण रूप से करता है। परिकल्पना अध्ययनकर्ता को गुमराह भी कर सकते हैं इसलिए इसको अंतिम मार्गदर्शक नहीं मानना चाहिए। इस तरह मालूम होता है कि परिकल्पना को अंतिम मार्गदर्शक मानना इसकी एक सीमा या दोष है। 


(4) अध्ययन में पक्षपात :


परिकल्पना की अन्य सीमा अथवा दोष अध्ययन में पक्षपात का होना कहा जा सकता है। क्योंकि अध्ययनकर्ता का अपने परिकल्पना में अटूट भरोसा होता है

इसलिए अध्ययन में अनेक तरह के पक्षपातों का प्रवेश हो जाता है। परिकल्पना का सृजन करते वक्त शोधकर्ता की पसंद, संवेगों तथा संस्कृतियों आदि का प्रभाव उस पर पड़ता है। वह एक विशेष रूचि के विषय का चयन कर लेता है। यही से अध्ययन में पक्षपात होना आरंभ हो जाता है। शोधकर्ता अपने आरंभिक धारणा के अनुसार तथ्यों का एकत्रण, वर्गीकरण, सारणीयन तथा निष्कर्ष आदि निकालने का प्रयत्न करता है। इस तरह परिकल्पना संपूर्ण अध्ययन को अध्ययनकर्ता की आत्मनिष्ठा के प्रभाव के कारण अवैज्ञानिक बना देती हैं। वह परिकल्पना के पक्ष में अध्ययन करता चला जाता है। इससे अध्ययन पक्षपातपूर्ण तथा गलत हो जाता है। पी.वी. यंग के विचारों में, "एक शोधकर्ता को अपनी परिकल्पना की प्रमाणिकता साबित करने के लक्ष्य से अध्ययन शुरू नहीं करना चाहिए।" शोधकर्ता को परिकल्पना को प्रतिष्ठा का बिंदु नहीं बनाकर एक मार्गदर्शक के रूप में लेकर चलना चाहिए। ऐसा करने से अध्ययन में पक्षपात की संभावना कम हो जाती है। इस तरह यह मालूम होता है कि अध्ययन में पक्षपात का होना परिकल्पना की एक सीमा अथवा दोषपूर्ण है।

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(5) अनुसंधानकर्ता की असावधानियां :


परिकल्पना सही मायने में दोषपूर्ण नहीं होती अपितु इसके प्रति शोधकर्ता तथा अविश्वास की और असावधानियां इसमें दोष पैदा कर देती हैं। इसका कारण यह है कि शोधकर्ता परिकल्पना का सृजन करते वक्त स्वयं को पूर्वाग्रहों, भावनाओं तथा इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। इससे परिकल्पना में पक्षपात आ जाता है। अनुसंधानकर्ता परिकल्पना में तथ्यों का कारण प्रभाव संबंध पक्षपातपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है। इसका परिणाम यह होता है कि आखरी परिणाम दोषपूर्ण निकलते हैं। साथ ही शोधकर्ता तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करता है जिससे अध्ययन में भी दोष आ जाता है। इस तरह यह ज्ञात होता है कि अनुसंधानकर्ता का परिकल्पना सृजन में असावधानी तथा अपने दोषपूर्ण परिकल्पना में गहरे विश्वास के कारण संपूर्ण अध्ययन दोषपूर्ण हो जाता है। अतः अनुसंधानकर्ता की सावधानियां परिकल्पना की एक सीमा या दोष कहीं जा सकती हैं।


कार्यकारी परिकल्पना के उपर्युक्त संपूर्ण विवेचन से स्पष्ट होता है कि सामाजिक अनुसंधान में परिकल्पना के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यह सच है कि एक दोषपूर्ण परिकल्पना संपूर्ण अध्ययन को अवैज्ञानिक बना सकती है लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सामाजिक अनुसंधान में परिकल्पना के निर्माण से ही बचने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। परिकल्पना की सीमाएं केवल इस तथ्य को स्पष्ट करती है कि परिकल्पना का निर्माण अत्यधिक सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। बास्तविकता तो यह है कि सामाजिक अनुसंधान में परिकल्पना वह महत्वपूर्ण आधार है जो अध्ययनकर्ता पर नियंत्रण रखकर उसे अध्ययन की सही दिशा दे सकता है।