मार्क्सवादी स्त्रीवाद की सीमाएं - Limitations of Marxist Feminism
मार्क्सवादी स्त्रीवाद की सीमाएं - Limitations of Marxist Feminism
1. मार्क्सवादी स्त्रीवाद का यह मानना है कि स्त्रियों का उत्पीड़न एक वर्गीय समाज की उपज है तथा पूंजीवाद की समाप्ति और वर्गविहीन समाज की स्थापना से यह उत्पीड़न भी समाप्त हो जाएगा। विद्रोही स्त्रीवादी मार्क्सवाद की इस मान्यता को नहीं मानते। उनका कहना है कि इसमें पुरूषों की सत्ता के पहलू की पूरी तरह अवहेलना की गई है। मात्र आर्थिक परिवर्तन से समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के ढांचे को बदला नहीं जा सकता तथा समाजवादी क्रांति कोई क्रांति नहीं, बल्कि पुरूषों द्वारा सत्ता को हड़पने का एक और विद्रोह मात्र होगा। (आर.मोर्गन द्वारा संपादित 'सिस्टरहुड इज पावरफुल, एन एंथोलोजी ऑफ राइटिंग्स फ्रॉम द वुमेन्स लिवरेशन मूवमेंट 1927 पृष्ठ xxxvi )
2. मार्क्सवादी स्त्रीवाद स्त्री की पुरुष से जैविक भिन्नता के तथ्य की उपेक्षा करता है।
एंगेल्स यह नहीं स्पष्ट करते कि व्यक्तिगत संपत्ति की संस्था क्यों अनिवार्यतः स्त्री की गुलामी का कारण बनती है। संपत्ति की अवधारणा स्त्री की दोयम स्थिति के व्यक्तिगत आधारों को स्पष्ट नहीं करती। एंगेल्स ने स्त्री की कमजोरी को केवल ताम्र और लौह औजारों के विनियोग के संबंध से उपजी परिघटना माना।
3. सीमोन ने यह प्रश्न उठाया कि श्रम के विभाजन से दो लिगों में मैत्रीपूर्ण संबंध क्यों विकसित नहीं हुआ? एंगेल्स स्त्री-पुरुष के संघर्ष को भी वर्ग भेद के रूप की तरह देखते हैं, जबकि स्त्री-पुरुष से जैविक रूप से भिन्न है और वर्गभेद का कोई जैविक आधार नहीं होता है।
4. एंगेल्स ने यह स्पष्ट नहीं किया कि घरेलू कार्य स्त्रियों को क्यों सौंपा जाएं? जबकि पुरुष उत्पादन कार्यों में लिप्त हैं। एंगेल्स और मार्क्स की दृष्टि में श्रमिकों के लैंगिक विभाजन की उत्पत्ति यौन क्रिया में श्रमिक के विभाजन से हुई है' यद्यपि समाजवादी स्त्रीवादी जैसे एलिसन जैगर का यह मानना है कि श्रमिकों का लैंगिक विभाजन समाप्त होने की कोई आशा तब तक नहीं है, जब तक कि यौनक्रिया में श्रमिक का विभाजन यथावत है।
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