इस मापनी की सीमाएं - Limitations of this scale
इस मापनी की सीमाएं - Limitations of this scale
(i) चूंकि संपूर्ण योग के आधार पर अभिवृत्ति क्षमता को निर्धारित किया जाता है। अतः इस बिंदु पर दी
गई अनुक्रियाएं कुछ हद तक अभिवृत्ति के पक्ष को व्यक्त करती हैं।
(ii) थस्टर्न विधि को छोड़कर, इस विधि में काफी समय लगता है।
इस विधि की विश्वसनीयता एवं वैधता उच्च पाई गई है। मर्फी एवं लिकर्ट ने अंतरराष्ट्रीयतावाद पर इसकी विश्वसनीयता .81 से 90 तक पाई। सिक्स 1938 ने टैनेनघाटी प्राधिकरण अभिवृत्ति मापनी के साथ संतोषजनक वैधता प्राप्त की है।
(ख)- थर्स्टन मापनी थर्स्टन व चेव (1929) ने समान दिखने वाले अंतरालों विधि" का निर्माण विशेष रूप से चर्च के प्रति अभिवृत्ति मापने के लिए किया। बाद में इसका उपयोग विभिन्न मुद्दों के प्रति अभिवृत्ति मापन हेतु किया गया।
विभिन्न स्रोतों से बहुत से कथन जो अभिवृत्ति के पक्ष विपक्ष की अवस्थाओं को दर्शाने वाले थे, एकत्र किया गया। तत्पश्चात बहुत से निर्णयाकों को चुना गया जिन्हें ।। पर्चियां दी गई। इन पर्चियों पर A 11 से K तक अक्षर लिखे गए थे। निर्णायकों के सामने इन पर्चियों को A.B.C.D.E.F.G.H.I.J एवं K के क्रम में रखा गया। उन्हें पर्ची 'A' पर उन कथनों को लिखना था जो चर्च के प्रति अत्यधिक सम्मानजनक थे। इसी प्रकार पर्ची 'K' पर उन कथनों को लिखना था जो चर्च के प्रति अत्यधिक असम्मानजनक मूल्यांकन करते हों।
निर्णायक कथनों को इन ।। पर्चियों पर जिस पर उपयुक्त समझते थे लिख देते थे। निर्णयों का आवृत्ति वितरण तैयार करके मध्यांक निकाला गया। यह मध्यांक बिंदु इस कथन का मापनी मूल्य हुआ। कथनों की द्विअर्थता की मात्रा निर्धारित करने के लिए अंत: चतुर्थांक विचलन (Q) की गणना की गई। वे कथन जिन पर निर्णयाकोन के मतों में संगति थी उनका चतुर्थांक मूल्य कम था।
ऐसे कथनों को मापनी में रख लिया गया परंतु उच्च चतुर्थांक वाले कथनों को निकाल दिया गया क्योंकि यह कथन द्विअर्थक थे। अतः अभिवृत्ति मापन के लिए अनुप्रयुक्त थे। प्रयोज्यों की प्रतिक्रियाओं में आंतरिक संगति ज्ञात करने के लिए यह 130 कथन 300 प्रयोज्यों को दिए गए एवं उन कथनों पर निशान लगाने को कहा गया जिनसे वे सहमत हों। जब प्रयोज्यों ने ऐसे कथनों पर जिनका मापनी मूल्य एक दूसरे से बहुत अधिक भिन्न था सहमति व्यक्त की तो उसे अभिवृत्ति के लिए और असम्बध्द समझ कर निकाल दिया गया।
इस मापनी की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें निर्णयाकों की अपनी अभिवृत्तियां प्रभाव डाल सकती हैं (फर्गुसन 1935, हावलैंड एवं शेरीफ 1952)। इसकी दूसरी कठिनाई यह है कि यदि दो कथन सामान मापने मूल्य वाले हो तो यह निर्धारित करना कठिन हो जाता है कि कौन सा कथन अच्छा विभेधन कर रहा है। परंतु इन कमियों के बावजूद भी अभिवृत्ति मापन की यह महत्वपूर्ण मापनी है। इसकी विश्वसनीयता .75 एवं वैधता उच्च पाई गई है।
(ग) अर्थ विभेदक प्रविधि आसगुड, सूसि एवं टैटेनबास 1975 ने अर्थ विभेदक प्रविधि का निर्माण किसी संप्रत्यय के सामान्य अर्थ का मापन करने के लिए किया जिसका उपयोग अभिवृत्तियों के मापन के लिए भी किया जाता है।
यह अभिव्यक्ति संप्रत्यय प्रयोग के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तथा इस संप्रत्यय के मापन के लिए द्विध्रुवी विशेषणों का उपयोग किया जाता है। प्रयोज्य से दिए गए अभिवृत्ति संप्रत्यय के प्रति द्विध्रुवीय विशेषणों पर अनुक्रिया व्यक्त करने को कहा जाता है। प्रयोज्य अनुक्रिया 7 बिंदु मापनी जैसे- (पसंद)- अत्यधिक अधिक, कम, तटस्थ, कम, अधिक, अत्यधिक (नापसंद) पर जिस बिंदु से सहमत हो उस पर व्यक्त करता है। मापनी का चौथा बिंदु तटस्थ अभिवृत्ति को प्रकट करने के लिए होता है। तीन बिंदु इसके बायीं ओर और तीन बिंदु इसके दाहिनीं ओर होते हैं जिनसे अभिवृत्ति का सुझाव एवं तीव्रता ज्ञात किया जाता है। आधुनिकीकरण के प्रति अभिवृत्ति का मापन भी इस विधि से होता है। व्यक्ति आधुनिकीकरण के प्रति अनुक्रिया 7 बिंदु मापनी पर देता है। यदि वह धनात्मक विशेषणों से सहमत होता है तो उसे अधिक अंक प्राप्त होते हैं, परंतु यदि ऋणात्मक विशेषणों पर अनुप्रिया देता है तो कम अंक प्राप्त होते हैं। सभी अनुक्रियाओं को जोड़कर संपूर्ण प्राप्तांक ज्ञात कर लिया जाता है। इससे अभिवृत्ति की दिशा एवं तीव्रता का निर्धारण किया जाता है। इस प्रविधि की विश्वसनीयता (.83 से 91, 97) एवं वैधता (.74 से 82 ) उच्च पाई गई है।
ये तीनों ही विधियां यद्यपि सरल है. परंतु प्रत्यक्ष विधि होने के कारण इसकी प्रमुख कमियां, प्राप्तांको की विश्वसनीयता को प्रभावित करती है। सामाजिक वांछनीयता, अनुक्रिया तत्परता एवं असावधानी के कारण प्राप्ताकों का स्वरूप प्रभावित होता है, परंतु शोधकर्ता इन्हें सावधानीपूर्वक दूर कर सकता है।
1- मापनी में ऐसे प्रश्नों को नहीं शामिल करना चाहिए जो सामाजिक वांछनीयता से जुड़े हो
2 मापन दबावपूर्ण परिस्थिति में न किया जाए एवं
3 - प्रयोज्य को स्पष्ट निर्देश दिया जाए कि कथनों का कोई उत्तर सही या गलत नहीं है। संभव हो सके तो संक्षिप्त प्रश्नावली का निर्माण किया जाए, इससे उत्तर दाता लापरवाही नहीं दिखाएगा। संतुलित मापनी का निर्माण करके अनुक्रिया तत्परता को दूर किया जा सकता है। पहले धनात्मक भाव वाले कथनों पर दिए गए प्राप्ताकों की गणना कर ली जाए फिर ऋणात्मक भाव वाले कथनों पर दी गई अनुक्रियाओं की। जैसा लिकर्ट मापनी में किया जाता है। इससे अनुक्रिया तत्परता से समाप्त हो जाती हैं। इन कमियों को ध्यान में रखते हुए एक वैकल्पिक प्रविधि का निर्माण किया गया जिसका वर्णन किया जा रहा है।
(घ) बोगस पाइप लाइन प्रविधि-यदि प्रयोज्य को यह जानकारी हो कि प्रयोगकर्ता किसी अन्य माध्यम से उसकी सही अभिवृत्ति' की जानकारी प्राप्त कर लेगा, तो ऐसी दशा में वह मापने के कथनों का सही सही उत्तर देगा। इस परिकल्पना के आधार पर जॉन्स एवं सिगल 1971 ने बोगस पाइप लाइन प्रविधि का विकास किया। प्रयोज्यों को बोगस यंत्र दिखाकर यह निर्देश दिया गया " यहां यंत्र पाली ग्राफ लाई डिटेक्टर की भांति दैनिक अनुक्रियाओं का सही-सही मापन करता है"। निर्देश देने के पश्चात एलेक्ट्रोड को प्रयोग के शरीर से लगा दिया जाता है।
प्रयोज्यों को प्रत्येक कथन का उत्तर डायल घुमा कर देना था। वे प्रयोज्य जिन्होंने बोगस मशीन द्वारा अनुक्रिया व्यक्त की थी उन प्रयोज्यों की तुलना में जिन्होंने बिना मशीन के अनुक्रिया व्यक्त की थी, नीग्रो के प्रति अधिक निषेधात्मक अनुक्रिया व्यक्त की।
इस प्रविधि की उपयोगिता विशेष परिस्थितियों में अभिवृत्ति निर्धारण हेतु अधिक पाई गई है (आस्ट्राम, 1973)। उल्लेख यहां पर किया गया है।
परंतु जटिल अभिवृत्तियों के मापन का एकमात्र हल इस विधि को मान लेना उपयुक्त नहीं होगा। 2- दैहिक मापन विधि- जटिल एवं अधिक संवेदनशील अभिवृत्तियों का सही मापन प्रत्यक्ष विधि से संभव नहीं हो पाता है। इनके शुद्ध मापन हेतु दैहिक मापकों के निर्माण पर बल दिया गया जिनसे अत्यंत व्यक्तिगत एवं संवेदनशील अभिवृत्तियों का सही मापन संभव हो सका कुछ प्रमुख दैहिक मापकों का
(क) ये मापक है:
(1) त्वचा आकुंचन: रैनकिन एवं कैंपबेल 1955 ने इस मापक का उपयोग अभिवृत्ति मापन हेतु किया।
(2) हृदय गति (कॉटेज एवं अन्य 1965)
(3) हृदय की धड़कन एवं हृदय चक्र (वेस्ट्री एवं डिफ्लेअर 1959) एवं
(4) पुतली का आकार या फैलाव (हेस 1965) इन मापकों द्वारा अभिवृत्ति वस्तु के प्रति प्राप्त दैहिक आंकड़ों एवं तटस्थ वस्तु के प्रति प्राप्त आंकड़ों के बीच प्राप्त अंतर अभिवृत्ति प्रबलता को प्रदर्शित करता है। जितना ही अधिक अंतर प्राप्त होगा, उस वस्तु के प्रति उतनी ही तीव्र अभिवृत्ति होगी।
इस विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रयोज्य को यह पता नहीं चल पाता है कि उसकी अभिवृत्तियों का मापन किया जा रहा है। यदि वह जान भी लेता है तो भी वह अपने अनुक्रियाओं को नहीं बदल सकता।
परंतु इन मापकों की कुछ सीमाएं भी हैं :
(1) दैहिक मापक अभिवृत्ति वस्तु के अतिरिक्त अन्य वस्तुएं या घटनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
अतः यह निर्धारित करना कठिन हो जाता है कि यह परिवर्तन अभिवृत्ति वस्तु के कारण है या किसी अन्य कारण से। जैसे समस्या समाधान जैसे कार्यों को देख कर हृदय की धड़कन में परिवर्तन या किसी नयी या कसमरूप वस्तु के कारण त्वचा में आंकुचन।
(2) दैहिक मापन से अभिवृत्ति के संदर्भ में प्राप्त सूचनाएं सीमित होती हैं। इनसे अभिवृत्ति की तीव्रता का अनुमान तो किया जा सकता है. परंतु दिशा का निर्धारण नहीं हो पाता।
(ख) मुखाभिव्यक्ति- दैहिक मापको में सर्वाधिक लोकप्रिय विधि है। "मुखाभिव्यक्ति"। इनके द्वारा विभिन्न संवेगों एवं अभिवृत्तियों का मापन किया जाता है। जो लोग किसी बात या कथन से सहमत होते हैं एक तरह की मुखाभिव्यक्ति प्रदर्शित करते हैं एवं जो लोग असहमत होते हैं. विभिन्न प्रकार की मुखाअभिव्यक्ति प्रदर्शित करते हैं।
कैसिआपो एवं पेट्टी (1979) ने उपयुक्त परिकल्पना के मापन हेतु प्रयोग क्यों के तीन समूहों के चेहरे की मांसपेशियों के गति का मापन किया यह मापन दो अवस्थाओं में किया गया। कथन से पूर्व गठन के समय इन प्रयोज्यों के चेहरे की मांसपेशियों के गति का मापन किया गया। यह पाया गया कि प्रयोज्यों की मांसपेशियों की गति में कथन से पूर्व एवं कथन के मध्य भिन्नता थी। वे प्रयोज्य जो कथन से सहमत थे एवं जो असहमत थे भिन्न अभिव्यक्ति प्रदर्शित की। इस विधि से अभिवृत्ति की दिशा का पता तो चलता है, परंतु तीव्रता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता।
(3) प्रकट व्यवहारों के मापक किसी परिस्थिति में व्यक्ति क्या व्यवहार कर रहा है ? इसका प्रेक्षण करके, अभिवृत्ति के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। व्यक्ति के प्रकट व्यवहार उस दशा में अधिक विश्वसनीय सूचना देते हैं जब व्यक्ति को यह आभास नहीं हो पाता है कि उसके व्यवहार का प्रेक्षण किया जा रहा है।
इस उद्देश्य से विभिन्न प्रच्छन्न विधियों का विकास किया गया ताकि व्यक्ति के व्यवहार का स्वाभाविक रूप से मापन किया जा सके (वेब एवं अन्य 1969 ) ।
प्रच्छन्न विधियां- जटिल एवं विवादास्पद अभिवृत्ति वस्तुओं के प्रति अभिवृत्तियों के मापन के लिए परोक्ष प्रविधियों का विकास, अभिवृत्ति के अध्ययन में महत्वपूर्ण उपलब्धि है तीन प्रकार की प्रच्छन्न विधियों का उल्लेख किया गया है (वेब एवं अन्य 1969
(I) "भौतिक चिन्हों" के आधार पर किसी वस्तु की लोकप्रियता या अलोकप्रियता के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी म्यूजियम में एकत्र दर्शकों से ढंग से यह प्रश्न किया जाए कि वह इन सभी चीजों में से किसे अधिक पसंद करते हैं तो संभवत व्यक्ति उत्तर अपने ऐतिहासिक ज्ञान के आधार पर दे, परंतु यदि शोधकर्ता यह देखता है कि चीजों की और अधिक भीड़ है। अतः इन नासिका चिन्हों के आधार पर वह अनुमान लगा लेता है कि अमुक व्यक्ति अधिक पसंद की जा रही है। अतः उसके प्रति लोगों की धनात्मक अभिवृत्ति है।
(2) “पुरालेखीय संग्रहों से अभिवृत्तियों बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। यदि यह ज्ञात करना हो कि "क्या पिछले 20 वर्ष में स्त्री पुरुष की भूमिका संबंधी रूढ़ियों में कोई परिवर्तन हुआ या नहीं ? इसका मूल्यांकन पुरालेखीय संग्रहों द्वारा संभव है। यदि 20 वर्ष पूर्व माता पिता द्वारा लड़के लड़कियों के पालन पोषण का ढंग एवं वर्तमान समय के तरीके में भिन्नता है तो यह कहा जा सकता है कि इस अभिवृत्ति में परिवर्तन आया है एवं यह बात भी स्पष्ट होती है कि समय के साथ अभिवृत्तियों में परिवर्तन होता है। (3) अशाब्दिक व्यवहार सशक्तसमप्रेरक का कार्य करते हैं। इनका वस्तुनिष्ठ तरीके से अध्ययन करके व्यक्ति की अभिवृत्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि हम जिसे पसंद करते हैं उसके पास बैठना चाहते हैं। इस आधार पर विभिन्न समूह के लोगों का वर्गीकरण किया जा सकता है।
भय की स्थिति में मापन अंतः पारस्परिक दूरी के आधार पर किया जाता है। वेब एवं अन्य 1969 ने छोटे बच्चों को आत्माओं की कहानी सुनाते समय यह पाया कि प्रयोज्य क्रमश: एक दूसरे के निकट होते गए। परंतु इस विधि की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसके द्वारा यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि व्यक्ति का कौन सा व्यवहार अभिवृत्ति को इंगित कर रहा है। एक विद्यार्थी अपनी कक्षा में प्रवेश करता है एवं अपने एक सहपाठी के पास खाली सीट पर बैठ जाता है।
उसका यह व्यवहार इस बात को व्यक्त करता है कि वह छात्र उस व्यक्ति के प्रति धनात्मक अभिवृत्ति रखता है। परंतु उस छात्र के व्यवहार के अन्य कारण भी हो सकते हैं। जैसे-
(1) उस छात्र ने उस सीट को इसलिए चुना, क्योंकि वह पंखे के नीचे थी. या अध्यापक के ध्यान के केंद्र में बने रहने के लिए वह सीट उपयुक्त थी। अतः यह तय करना कठिन हो जाता है कि प्रकट व्यवहार किस प्रकार की अभिवृत्ति को व्यक्त कर रहा है।
(2) व्यक्ति बहुत से व्यवहार बिना सोचे समझे करता है ( ट्राएण्डिस, 1980 )। अतः ऐसे व्यवहारों को किसी अभिवृत्ति का परिणाम नहीं कहा जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों का सुझाव है कि अभिवृत्ति मापन के लिए प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही विधियों का उपयोग करें तो शुद्ध एवं वस्तुनिष्ठ परिणाम प्राप्त होगा (वेब एवं अन्य 1969) ।
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