तार्किक क्रिया: अर्थ एवं परिभाषा - Logical Verb: Meaning and Definition

तार्किक क्रिया: अर्थ एवं परिभाषा - Logical Verb: Meaning and Definition


पैरेटो के हिसाब से अर्थशास्त्र में जो सिद्धांत होते हैं. वे सभी तार्किक क्रिया की श्रेणी में आते हैं। होता यह है कि तथ्यों के अंदर कुछ ऐसे चर (Variables) और तत्व होते हैं, जिन्हें आर्थिक सिद्धांत मूर्त रूप से रखता है और यही उनके लिए तार्किक क्रिया है। लेकिन जब पैरेटो सामाजिक प्रघटनाओं की अध्ययन विधियों का उल्लेख करते हैं तो कहते हैं कि आर्थिक प्रघटनाओं की तरह सामाजिक प्रघटनाओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता। पैरेटो ने समाजशास्त्र को परिभाषित करते हुए दो अवधारणाओं को प्रस्तावित किया है- तार्किक क्रिया व अतार्किक क्रिया। इसके अलावा सामाजिक प्रघटनाओं को समझने के लिए पैरेटो कुछ अन्य दृष्टिकोणों का भी उल्लेख करते हैं जैसे- वस्तुनिष्ठ (Objective) व व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) वस्तुपरक दृष्टिकोण वह होता है जो सामाजिक प्रघटना को उसकी वास्तविकता या यथार्थता में देखता है जबकि व्यक्तिनिष्ठ वह दृष्टिकोण है जो यथार्थ में न होकर व्यक्ति के मस्तिष्क में होता है। अर्थात् व्यक्ति जिस तरह से किसी घटना को देखता और क्रिया करता है तो इन्हीं दोनों अवधारणाओं के अंतर्गत अपने निर्णय लेता है।

पैरेटो विस्तार से वस्तुपरक एवं व्यक्तिपरक सामाजिक प्रघटनाओं में अंतर देखते हैं। इनका कहना है कि वस्तुपरक सामाजिक प्रघटाएँ जब व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से जुड़ जाती है तो यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। दूसरे शब्दों में व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से सामाजिक प्रघटनाओं की यथार्थता यदि वस्तुपरक यथार्थता के अनुरूप हो जाती है तो वह वैज्ञानिक सिद्धांत है। तार्किक क्रिया किसे कहते है?


पैरेटो का कहना है कि "किसी भी विशुद्ध विज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति किसी प्रघटना के बारे में अपने मस्तिष्क में जो कुछ सोचता है वह सामान्य सोच के अनुरूप बैठ जाता है, तार्किक क्रिया कहलाता है।"


उदाहरण- यदि कोई व्यक्ति यानि कर्ता (Actor) यह सोचता है कि साइनाइड खाने से तुरंत मृत्यु हो जाती है और वस्तुपरकता भी यही है तो वह वैज्ञानिक अवलोकन है। इसको पैरेटो तार्किक क्रिया कहते इसे परिभाषित करते हुए ये लिखते हैं कि “तार्किक क्रियाएँ वे हैं जिनमें वस्तुपरकता व व्यक्तिपरकता एक साथ होती है।"


एक अन्य स्थान पर पैरेटो तार्किक क्रिया की परिभाषा देते हुए एक और बिंदु पर वस्तुपरकता व व्यक्तिपरकता के अंतर को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्ति अपने स्वयं के उद्देश्य की दृष्टि से लक्ष्य निश्चित करता है। यह लक्ष्य उसके लिए वस्तुपरक है। उसने तो सामाजिक घटना के विषय में पहले से ही अपने मस्तिष्क में एक निश्चित सोच या समझ बना रखी है। अब इस व्यक्तिपरक सोच के माध्यम से वह समझता है कि जो कुछ प्रयास उसके द्वारा किया जा रहा है वह वस्तुपरक है। अपने इस वस्तुपरक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए किन्हीं साधनों को काम में लाता है। उदाहरण- यदि व्यक्ति यानि कर्ता ऐसा सोचता है कि वह जीवन में डाक्टर बनने के लिए कोचिंग कक्षाओं मे जाता है. पुस्तकालय में बैठता है। यह सब क्रियाएँ साधन है जिनके माध्यम से वह वस्तुपरक लक्ष्यों यानि डॉक्टर बनने के उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। दूसरे शब्दों में व्यक्तिपरकता द्वारा निर्धारित वस्तुपरक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वह कदम उठाता है। इस तरह का उसका प्रयास तब सही निकलेगा जब लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास सही होंगे। इस परिभाषा में पैरेटो ने व्यक्तिपरक और वस्तुपरक दोनों को अनुरूप बनाने के लिए तार्किक संबंधों पर जोर दिया है। डॉक्टर बनने के लिए कर्ता जिन-जिन साधनों को उपयोग में लेता है, यदि वह तार्किक रूप से ये साधन डॉक्टर बनने के लक्ष्य के अनुरूप है, तो यह क्रिया तार्किक होगी।


इस दूसरी परिभाषा में पैरेटों ने तार्किक क्रिया के लिए एक और दिशा जोड़ दी है। पहले जब उन्होंने तार्किक क्रिया की परिभाषा दी तब कहा कि यह वह क्रिया है

जहाँ व्यक्तिपरक साधन और वस्तुपरक साधन एक होते हैं। पैरेटो के दृष्टिकोण को सूत्र के रूप में इस प्रकार रखा जा सकता है


तार्किक क्रिया व्यक्तिपरकता + वस्तुपरकता


Logical Action - Subjectivity + Objectivity


तार्किक क्रिया की दूसरी परिभाषा में पैरेटो ने वस्तुपरकता और व्यक्तिपरकता में तार्किक आधार को महत्वपूर्ण बताया है। इसके लिए वे कहते हैं कि लय को प्राप्त करने के लिए साधन जितने अधिक उचित व सही होंगे, उसी अनुपात में लक्ष्य प्राप्ति होंगी। इस परिभाषा में महत्वपूर्ण दशा तर्क संगति है। इस सूत्र के रूप में निम्न प्रकार रख सकते हैं।


तार्किक क्रिया = व्यक्तिपरकता + वस्तुपरकता + तर्क संगति 


Logical Action = Subjectivity Objectivity + Logicality


लेविस कोजर के अनुसार, (तार्किक क्रियाएँ वे हैं जो साधन प्राप्त करने के लिए उपयुक्त साधनों को काम में लाती है। ये क्रियाएँ साधन व साध्य को तार्किक रूप से जोड़ती है।)


कोजर ने तार्किक क्रिया की जो व्याख्या की है उसके अनुसार यह बहुत स्पष्ट है कि व्यक्ति किसी भी क्रिया के करने से पहले अपने उद्देश्य निश्चित करता है। यह उसका साध्य है। साध्य निश्चित होने के बाद वह तार्किक रूप से यह देखता है कि इसे प्राप्त करने का उचित साधन क्या है? लेकिन जब वह साधन के बारे में सोचता है तब दुविधा में पड़ जाता है।


उदाहरण-विश्वविद्यालय का छात्र अपनी परीक्षा को उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण करना चाहता है। वह उसका साध्य है। यहाँ तक तो सब सही है। अब दुविधा आती है कि यह उच्च श्रेणी कैसे प्राप्त किया जाय? उसका मन कहता है कि वह परीक्षा में नकल कर ले, परीक्षकों तक अपनी पहुँच करे और उच्च श्रेणी प्राप्त कर ले। उसका यह विकल्प साधन है। इसे व्यक्तिनिष्ठ क्रिया (Subjective Action) कहेंगे लेकिन वह समाज की ओर देखता है। समाज तो कहता है कि उच्च श्रेणी पाने के लिए अधिकतम मेहनत करनी चाहिए। समाज का यह कहना वस्तुनिष्ठ (Objective) है। अब छात्र क्या करे? यदि इस दुविधा को पार करने के लिए वह अपने मन को यानि स्वयं के विकल्प को छोड़ दे और वस्तुनिष्ठ विकल्प को अपना ले तो यह उसकी तार्किक क्रिया होगी।


टॉलकट पारसन्स के अनुसार कोई भी क्रिया तार्किक क्रिया तब होगी जब वह समाज द्वारा निर्धारित मानकों ने एक प्रकार को स्वीकार करती है। यहाँ पारसन्स स्पष्ट रूप से साध्य साधन की बात नहीं करते। लेकिन जब वे निश्चित प्रकार के मानकों को स्वीकार करने की चर्चा करते हैं तो इससे स्पष्ट है कि वे समाज द्वारा स्वीकृत मानकों को महत्व देते हैं। देखा जाय तो पारसन्स और मर्टन के क्रिया सिद्धांत के बजाय साधन-साध्य की बात अधिक आग्रहपूर्वक उठाई गई है। मर्टन ने एनोमी (Anomie ) की अवधारणा को रखा है। उनका कहना है कि समाज में नियमहीनता तब आती है जब एक व्यक्ति अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समाज के नियमों को नहीं मानता है।


यदि मर्टन को पैरेटो की साध्य साधन की अवधारणा पर ढ़ाला जाये तब कहना होगा कि मर्टन एनोमी से युक्ति की बात मानते हैं जब व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत लक्ष्यों और साधनों दोनों को अपनाता है। साधन-साध्य की बात हमारे देश में गाँधी जी ने भी उठायी है। उनका कहना है कि व्यक्ति को अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में जुट जाना चाहिए लेकिन वह जिन साधनों को काम में लाता है वह पवित्र होने चाहिए। करोड़पति बनने के लिए यदि कोई व्यक्ति ड्रग की तस्करी करता है और रातो-रात अपने अमीर बनने के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है तब गाँधी ही कहते हैं कि उसके लक्ष्य पवित्र नहीं है। वह करोड़पति बन गया तो क्या हुआ. उसने जो तरीके अपनाये है वह गंदे हैं।


संक्षेप में तार्किक क्रिया को उस क्रिया के रूप में माना जा सकता है जिसमे साध्य-साधन तार्किक आधार पर जुड़े हों यानि साधन ऐसे हों जो साध्य तक पहुँचा दे इसके अलावा साधन ऐसे होने चाहिए जो उपयुक्तत हों। यहाँ उपयुक्त का तात्पर्य जो समाज द्वारा स्वीकृत हो ।