मानवाधिकार सम्बन्धी घोषणा पत्र के मुख्य तत्व और विशेषता - Main elements and features of the Declaration on Human Rights
मानवाधिकार सम्बन्धी घोषणा पत्र के मुख्य तत्व और विशेषता - Main elements and features of the Declaration on Human Rights
50 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए, जिनमें भारत के प्रतिनिधि भी थे। 26 जून 1945 को सम्मलेन में शरीक सभी देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस अधिकार पत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन की व्यवस्था की गयी है। यह अधिकार पत्र 24 अक्टूबर 1945 को लागू हो गया। इसमें फासीवादी बर्बरता के विरुद्ध युद्धरत देशों की जनता की आकांक्षाएं प्रतिबिंबित हुई और “मूल मानवाधिकारों" तथा "व्यक्ति की गरिमा और महत्त्व" में आस्था का इजहार किया गया।
मुख्य तत्व
1. मानव अधिकार कानून में भी पद सोपान क्रम है।
2. ऐसे कोई भी मानव अधिकार नहीं है जो व्यक्ति की उसके मानव अधिकारों से अलग करते हो। 3. संस्कृतियों और सभ्यताओं की भिन्नता, विश्वासों तथा परम्पराओं का अंतर तथा ऐतिहासिक और आकांक्षाओं से जनित भिन्नताओं के कारण मानव अधिकारों के अर्थ तथा परिभाषाओं में अत्यधिक देखने को मिलता है।
विशेषता -
1. सभी मूल अधिकार सभी को उपलब्ध नहीं - भारतीय मूल अधिकारों की विशेषता यह है कि जहाँ कुछ अधिकार सभी व्यक्तियों को अर्थात नागरिकों और विदेशियों दोनों को उपलब्ध है वहाँ कुछ केवल भारतीयों को उपलब्ध है।
2. आर्थिक स्वतंत्रता का आभाव मूल - अधिकार भारत में राजनितिक लोकतंत्र की गारण्टी है आर्थिक लोकतंत्र की नहीं। ये नागरिकों को भाषण, अभिव्यक्ति, संघ, संगठन, भ्रमण आदि की स्वतंत्रताएँ प्रदान करते है, परन्तु सोवियत संघ के संविधान की भांति कार्य विश्वास, आर्थिक, और सामाजिक सुरक्षा आदि को प्रदान नहीं करते है।
3. निरपेक्षता का आभाव मूल - अधिकार निरपेक्ष अनुल्लंघनीय या अहरणीय नहीं। राज्य इन्हें नैतिकता, स्वास्थ्य, व्यवस्था शांति, सुरक्षा य हितराष्ट्री आदि के नाम पर मर्यादितप्रतिबंधित या स्थगित कर सकता है। भारत में मूल अधिकार और मर्यादायें दोनों बाद योग्य है।
संकटकाल में राष्ट्रपति प्राण और दैहिक स्वतंत्रता को छोड़कर उदघोषणा द्वारा नागरिकों को न्यायालय के संरक्षण से वंचित कर सकता है।
4. परिवर्तनीय मूल - अधिकार स्थायी नहीं। इन्हें परिवर्तित या समाप्त किया जा सकता है। ये वाद योग्य हैं परन्तु स्थायी नहीं। जब कभी न्यायालय के निर्णय कार्यपालिका की सामजिक और आर्थिक नीतियों के विरुद्ध गये हैं तब ही संवैधानिक संशोधनों का सहारा लेकर उन्हें प्रभावहीन बना दिया गया।
5. अधिकारों का दोहरा स्वरुप- मूल अधिकारों में जहाँ कुछ मूल अधिकारों निषेधज्ञायें हैं जो राज्य को कुछ कार्य करने से मना नहीं करती है
वहाँ कुछ मूल अधिकार सकारात्मक आदेश हैं जो राज्य को कुछ कार्य करने के लिए कहते हैं। उदाहरणतः जहाँ राज्य का कोई कार्य नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं कर सकता यहाँ वह कानून द्वारा पिछड़े हुए वर्गों अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं कर सकता है।
6. वाद योग्य - राज्य यदि किसी व्यक्ति को मूल अधिकारों से वंचित करता है तो वह न्यायालयों का संरक्षण प्राप्त कर सकता है तथा न्यायालय द्वारा उन्हें लागू कर सकता है। न्यायालय इस का निर्धारण करता है की मूल अधिकारों पर लगायी गयी मर्यादाएं उचित है या नहीं। यही मर्यादाएं उचित नहीं या वे संवैधानिक धाराओं का उल्लंघन करते है या वे अधिकार शक्ति का अतिक्रमण करते है तो न्यायालय मर्यादाओं को अवैध घोषित कर सकता है। परन्तु न्याय की यह शक्ति विकास के क्रम बाधा प्रस्तुत नहीं कर सकती।
7. अस्पष्टता और अतिव्यापता - मूल अधिकार विस्तृत होते हुए भी अस्पष्ट है। इनमे अतिव्यापता पायी जाती है जो अंततः भ्रांतियों और संसद तथा न्यायालय में संघर्ष को जन्म देती है। उदाहरतः संविधान में सार्वजानिक उद्देश्यों बेगार कठोर व्यवसाय मानव शरीर के व्यापर - अल्पसंख्यक आदि शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया। मूल अधिकारों को बार यों में लिखा गया है। ये तत्व भ्रांतियों को भिन्न अध्या-बार लिखा गया है और कुछ को भिन्न उत्पन्न करते हैं। व्यापार को स्वतंत्रता पूंजी के केन्द्रीकरण को रोकने की व्यवस्था से मेल नही खाती।
8. सिद्धान्त और व्यवहार में भिन्नता - सिद्धांत रूप में नागरिकों के मूल अधिकार अत्यधिक प्रभावपूर्ण प्रतीत होते हैं परन्तु व्यवहार में उनपर लगाई गई मर्यादाओं ने उन्हें अवास्तविक बना दिया है। उदाहरणतः समानता के अधिकार में संरक्षित भेदभाव की व्यवस्था है, स्वतंत्रता के अधिकार में पी.डी.ए. भारत सुरक्षा अधिनियम और राष्ट्रीय सुरक्षा विद्यमान है, और निर्धनता शिक्षा के अधिकार को अवास्तविक बना देती है।
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