दूर शिक्षा के प्रमुख सैद्धांतिक आधार ,अनुदेशन का सिद्धांत - The main theoretical basis of distance education, the principle of instruction

दूर शिक्षा के प्रमुख सैद्धांतिक आधार ,अनुदेशन का सिद्धांत - The main theoretical basis of distance education, the principle of instruction 


अनुदेशन अथवा शिक्षण का अभी तक कोई अंतिम सिद्धांत विकसित नहीं हुआ है किन्तु अनेक शिक्षाविद ने शिक्षण के प्रतिमान विकसित किए हैं। इन्हीं प्रतिमानों को प्रायः शिक्षण के सिद्धांत भी कहा जाता है। इन सिद्धांतों के दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक आधार है। किन्तु शिक्षण का स्वरूप दार्शनिक सिद्धांतों पर अधिक आधारित है। शिक्षण सिद्धांतों के प्रतिपादन में


• शिक्षण तथा अधिगम प्रक्रिया में व्यावहारिक संबंध स्थापित किए जाते हैं। 


• पूर्वानुमान के रूप में परिकल्पनाओं का निर्माण किया जता है तथा


• ऐसे प्रदत्तों एवं साक्ष्यों को एकत्रित किया जाता है जिनके आधार पर परिकल्पनाओं की पुष्टि होती है अथवा उन्हें निरस्त कर दिया जाता है। 


उपर्युक्त तत्वों का विशिष्टीकरण ही अनुदेशन सिद्धांतों के प्रतिपादन में सहायक होता हसी तथा ये अनुदेशन – सिद्धांत दूर शिक्षा को भी सैद्धांतिक आधार प्रदान करते हैं। 


शिक्षण विधियाँ एवं सम्प्रेषण माध्यम


शिक्षण विधियों एवं सम्प्रेषण माध्यम की सहायता से छात्रों से संपर्क स्थापित किया जाता है जिससे भावात्मक सम्बन्धों का विकास संभव होता है। इसके साथ ही सहायक प्रणाली के द्वारा छात्रों को अभिप्रेरणा एवं पुनर्बलन प्रदान किया जा सकता है। दूर शिक्षा के अंतर्गत पाठ्य वस्तु के प्रस्तुतीकरण हेतु के विभिन्न माध्यमों का प्रयोग किया जा सकता है। इन माध्यमों से सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्रित माध्यम है। शिक्षक मनोवैज्ञानिक एवं तार्किक ढंग से पाठ्य वस्तु की व्यवस्था कर सकता है। इस पाठ्य वस्तु को मुद्रित रूप में छात्रों को उपलब्ध कराकर उन्हें अपने ढंग एवं गति से सीखने का अवसर प्रदान किया जा सकता है। यह एक मार्गीय सम्प्रेषण माध्यम होता है। इसी प्रकार के दूसरे श्रव्य-दृश्य माध्यमों से छात्र पाठ्य-वस्तु को सुन सकता है तथा देख सकता है। 


संरचनात्मक व्यवस्था

दूर शिक्षा प्रणाली के सफल संचालन हेतु एक सुव्यवस्थित शैक्षणिक एवं प्रशासनिक ढांचे की विशेष आवश्यकता होती है। इस ढांचे को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए जिससे यह अध्ययन सामाग्री को ठीक ढंग से तैयार कर सके, उनका सही मुद्रण एवं वितरण सुनिश्चित हो सके अन्तः क्रिया हेतु उपयुक्त संप्रेषण माध्यमों की व्यवस्था की जा सके तथा छात्रों को सुनिश्चित निर्देशन एवं परामर्श की सुविधा प्रदान की जा सके। इसके साथ ही परीक्षाओं की व्यवस्था तथा अन्य सामाजिक एवं शैक्षइक कार्यक्रमों का आयोजन भी इसके द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दूर शिक्षा संचालित करने वाली संस्थाएं एवं विश्वविद्यालय इन सभी के बारे में विचार नीति निर्धारित करते हैं। इसके लिए सहायक व्यवस्था प्रणाली भी प्रयुक्त की जाती है।


दूर शिक्षा के इन उपर्युक्त सैद्धांतिक आधारों को ध्यान में रखते हुए अनेक शिक्षा विदो ने दूर शिक्षा के सिद्धांत का प्रतिपादन भी किया है।


दूर शिक्षा के विभिन्न सिद्धांत


'सिद्धांत' शब्द को कई अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है।

किसी तथ्य तथा वस्तु के संबंध में व्यवस्थित विचारों का सिद्धांत कहते हैं, परंतु यह अर्थ अधिक भ्रामक है। अनुभवों से सिद्धांत का प्रतिपादित करते हैं। आज सिद्धांत शब्द अधिक वैज्ञानिक तथा सुनिश्चित अरथा में प्रयुक्त किया जाता है।


किसी भी सिद्धांत का आधार परिकल्पना होती है। इसमें चारों के सम्बन्धों का अर्थापन किया जाता है और चारों के पूर्वानुमानित सम्बन्धों को भी प्रगत करता है। चारों के व्यावहारिक सम्बन्धों की व्याख्या सिद्धांत करता है। इस प्रकार सिद्धांत का वैज्ञानिक एवं सुनिश्चित अर्थ यह है कि यह चरों के व्यावहारिक सम्बन्धों की व्याख्या करता है। दूर शिक्षा के विभिन्न सिद्धांत का आशय भी इसकी प्रकृति का विवेचन करना ही है। प्रमुख शिक्षाविदों एवं विचारकों द्वारा दूर शिक्षा के निम्नांकित छह सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है -


1 स्वतंत्र अध्ययन का सिद्धांत - चार्ल्स वेडेमियर


2 स्वतंत्र अध्ययन का पुनरावलोकित सिद्धांत - माइकेल मूरे 


3 शिक्षण अधिगम के औद्योगीकृत रूप का सिद्धांत - आटो पीटर्स


4 निर्देशित शैक्षणिक वार्तालाप का सिद्धांत- बोर्जी होमबर्ग


5 द्विमार्गी डाक सम्प्रेषण का सिद्धांत- जॉन बाथ


6 शिक्षण अधिगम के औद्योगिक रूप में मानवीय तत्व का सिद्धांत - डेविड स्वार्ट


इन सिद्धांतों में दूर शिक्षा प्रणाली के विभिन्न पक्षों को महत्व दिया गया है। दूर शिक्षा के प्रकृति एवं व्यावहारिकता को ठीक ढंग से समझने के लिए हम इन सिद्धांतों का सूक्ष्म परिचय अलग- अलग कर रहें हैं


चार्ल्स वेडेमियर का स्वतंत्र अध्ययन का सिद्धांत - 


चार्ल्स वेडेमियर संयुक्त राज्य अमेरिका के विसकनसीन विश्वविद्यालय में शिक्षा के प्रोफेसर थे तथा 1960 ई. से 1970 ई. के बाद वहाँ की दूर शिक्षा से जुड़े रहे। उनका दृष्टिकोण उदरवादी है जिसकी झलक उनके दूर शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों में भी देखने को मिलती है। दूर शिक्षा के सिद्धांतिक आधारों के प्रतिपादन के प्रति उनका प्रमुख योगदान दूर शिक्षा एवं परंपरागत आमने-सामने की शिक्षा के बीच अंतर का विश्लेषण करना है। वेडेनियर में इन दोनों प्रणालियों के बीच अंतर का विश्लेषण करते हुए तीन प्रमुख विचार बिन्दुओं को प्रस्तुत किया है जो अब दूर शिक्षा के संप्रत्यय के आधार बन गए हैं -


I. शिक्षार्थी की स्वतन्त्रता


Il. शिक्षक एवं शिक्षार्थी के बीच की दूरी तथा


III. संरचनात्मक प्रणाली अर्थात व्यवस्था का स्वरूप


2 स्वतंत्र अध्ययन का पुनरावलोकित सिद्धांत - माइकेल मूरे मूरे के अनुसार स्वतंत्र अध्ययन' एक ऐसा सामान्य पद अथवा प्रत्यय है जो उन सभी शैक्षिक व्यवहारों का वर्णन करता है जो ‘दूरी' एवं ‘स्वतंत्रता के चरों के आधार पर इसे परंपरागत औपचारिक शिक्षा से अलग करते हैं। परंपरागत औपचारिक प्रणाली के अंतर्गत मूरे विद्यालय वातावरण' को महत्वपूर्ण मानते हैं क्योकि कक्षा-कक्ष में दिया जाने वाला व्याख्या तथा विद्यालय की अन्य व्यवस्थाएँ, दोनों ही शिक्षण अधिगम को प्रभावित करती है। कक्षगत शिक्षण के अतिरिक्त अन्य सभी शैक्षिक व्यवहार या क्रियाएँ जिनमें 'दूरी' एवं ‘स्वतन्त्रता' दोनों का समाविष्ट किया जाता है स्वतंत्र अध्ययन के ही रूप होते हैं। ये विभिन्न रूप मुक्त विश्वविद्यालय कार्यक्रम, पत्राचार पाठ्यक्रम, बाह्य डिग्री कार्यक्रम या स्वयं शिक्षण कार्यक्रम कहलाते हैं। इन सभी कार्यक्रमों को दो चरों - दूरी एवं स्वतंत्रता को स्वतंत्र अध्ययन प्रणाली' की दो विशिष्टताओं के आधार पर एक सतत के रूप में अभिव्यक्ति / प्रदर्शित किया जा सकता है। ये दो विशिष्टताएँ निम्नलिखित हैं -


1 संवाद


2 वैयक्तिकरण या संरचना विहीनता


इन दो विशिष्टताओं की गहनता की मात्रा ही दूर शिक्षा (शिक्षक, शिक्षार्थी एवं शिक्षण अधिगम) को परंपरागत औपचारिक शिक्षा से अलग करती है।


3 शिक्षण अधिगम के औद्योगिकृत रूप का सिद्धांत 


ऑटो पीटर्स पीटर्स के विचार 1960 ई. के दशक के मध्य दूरवर्ती शिक्षा के व्यापक सर्वेक्षण से विकसित हुए हैं। 1973 ई. में अपनी एक महत्वपूर्ण पुस्तक “The Didactical Structure of Distance Teaching : Investigations towards an industrialized form of teaching and learning" के माध्यम से पीटर्स ने दर शिक्षा दूर के सिधान्त के प्रतिपादन मेन व्यापक योगदान दिया। इसमें इस कार्य में औपचारिक शिक्षा के सिद्धांतिक पक्ष को भी ध्यान में रखा था।

जिससे उसके इस विचार को कि "दूर शिक्षा, शिक्षा का एक औद्योगिकृत रूप है" बहुत बल मिला। उदाहरण स्वरूप जर्मन शिक्षाविदों द्वारा परंपरागत शिक्षा के लिए विकसित वर्गों (विभिन्न पक्षों या आयामों) जैसे- 'आशय या उद्देश्य' विषय वस्तु विधियाँ माध्यम का चयन, 'व्यक्तिगत विशेषताएँ' तथा सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों को दूर शिक्षा कि प्रक्रिया पर जब लागू करने का प्रयास किया गया तब पता चला कि दूर शिक्षा की प्रकृति एवं स्वरूप परंपरागत शिक्षा से बिलकुल अलग है। इस भिन्नता को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है - 


I. दूर शिक्षक का शैक्षणिक उद्देश्य भावात्मक एवं क्रियात्मक पक्षों की अपेक्षा ज्ञानात्मक पक्ष से अधिक जुड़ा होता है, क्योकि यह उसकी अनिवार्य आवश्यकता है।

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II. दूर शिक्षा में परंपरागत शिक्षा के समान विस्तृत एवं विधिक प्रकार से प्रस्तुत विषय वस्तु' का अभाव होता है किन्तु इसकी विषय वस्तु' संक्षिप्त स्पष्ट एवं बोधगम्य होती है। 


III. दूर शिक्षा की शिक्षण विधियाँ एवं सम्प्रेषण माध्यम परंपरागत शिक्षा से बहुत अधिक भिन्न होती है।


IV. दूर शिक्षा के शिक्षार्थी की व्यक्तिगत विशेषताएँ एवं सामाजिक पृष्ठ भूमि भी परंपरागत शिक्षार्थियों से भिन्न होती है। इसके शिक्षार्थि अधिक परिपक्व एवं स्वतः अभिप्रेरित होते हैं। इससे पीटर्स ने यह निष्कर्ष निकाला है कि परंपरागत शिक्षा को विश्लेषित करने वाले वर्ग या आयाम दूर शिक्षा के विश्लेषण हेतु पर्याप्त नहीं है। उसके मतानुसार दूर शिकाह की प्रक्रिया एवं स्वरूप को औद्योगिक सिद्धान्त एवं व्यवहारों के आयामों की सहायता से विश्लेषित किया जा सकता है।