समाजशास्त्र के वैज्ञानिक प्रक्रिया के मुख्य आधार - Mainstay of Scientific Processes of Sociology

 समाजशास्त्र के वैज्ञानिक प्रक्रिया के मुख्य आधार - Mainstay of Scientific Processes of Sociology


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समाजशास्त्र विषय के समाजशास्त्रीय गुणों से यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि समाजशास्त्र की प्रकृति और विज्ञान में अन्योन्याश्रय संबंध है। इसे निम्न आधार पर सिद्ध किया जा सकता है-


(1) वैज्ञानिक कार्य प्रणाली का उपयोग :


वैज्ञानिक कार्य प्रक्रिया का समाजशास्त्र में उपयोग किया जाता है। सामाजिक संबंधों, समाज, सामाजिक घटनाओं व व्यवस्थाओं इत्यादि का अध्ययन वैज्ञानिक कार्य प्रक्रिया के अंतर्गत किया जाता है। समाजशास्त्रीय अध्ययन में वैज्ञानिक प्रक्रिया के समस्त चरणों का उपयोग किया जाता है। कई विद्वानों जैसे लुंडबर्ग, पी.वी. यंग. गुडे व हॉट तथा कुक इत्यादि ने भी यह विचार प्रकट किया है कि समाजशास्त्र में न सिर्फ समस्या का व्यवस्थित व क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है अपितु समाजशास्त्रीय सिद्धांतों का गठन भी किया जाता है। समाजशास्त्री अध्ययनों में बहुत से वैज्ञानिक यंत्रों व प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।

समाजशास्त्रीय विचारकों द्वारा समाजशास्त्र में वैज्ञानिक कार्यप्रणाली का इस्तेमाल किए जाने के कारण इसकी प्रकृति वैज्ञानिक मानी जाती है। 


(2) सिद्धांतों का निर्माण :


समाजशास्त्री अध्ययनों में भी पहलुओं का एकत्रण, परिकल्पना का निर्माण, वर्गीकरण, सारणीयन, विश्लेषण, संगठन व व्याख्या की जाती है। अंततः इस आधार पर सिद्धांत का निर्माण किया जाता है। कोहन का कहना है कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिक सिद्धांतों का गठन किया जाता है। वैज्ञानिक सिद्धांत की तीन विशेषताएं होती हैं-


(A) आनुभविकता,


(B) कार्य-कारण संबंध व


(C) सार्वभौमिकता।


समाजशास्त्र में वैज्ञानिक सिद्धांत बनाने का प्रयत्न समय-समय पर किया जाता रहा है। कई विद्वानों जैसे कार्ल मार्क्स व सोरोकिन इत्यादि के सामाजिक बदलाव के सिद्धांत व्यवस्थित सिद्धांत हैं। प्रख्यात समाजशास्त्री विचारकों द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के सम्यक अवलोकन से यह ज्ञात होता है कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिक नियमों का निर्माण होता है। 


(3) पहलुओं का विश्लेषण :


इसके अवलोकन के माध्यम से तथ्य इकट्ठा करने के पश्चात उनको कार्यकारण के आधार पर भिन्न-भिन्न समूहों में विभाजन किया जाता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में विभाजन एवं सारणीयन कहा जाता है।

विभाजन के समय उनके परस्पर गुण संबंध का उल्लेख किया जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों की तरह समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भी पहलुओं का विश्लेषण, वर्गीकरण व सारणीयन किया जाता है। चूंकि समाजशास्त्रीय शोधों में वैज्ञानिक अध्ययन की ही भांति समस्त नियमों का प्रतिपादन किया जाता है. अतएव समाजशास्त्रीय शोध की संरचना वैज्ञानिक बन जाती है। 


(4) क्या है? का अध्ययन:


जिस प्रकार विज्ञान में क्या है की खोज की जाती है उसी प्रकार समाजशास्त्र में भी क्या है?

क्यों है? एवं क्या होगा? आदि को ध्यान में रखते हुए घटना का उल्लेख अध्ययन व व्याख्या की जाती है। दूसरे शब्दों में समाजशास्त्र में विज्ञान की तरह पहलुओं का पूरी तरह विश्लेषण किया जाता है। इस संदर्भ में समाजशास्त्रीय रामकृष्ण मुखर्जी ने 'sociology of Indian sociology' में लिखा है, समाजशास्त्र में सत्यता को जानने हेतु शोध में निम्नलिखित 5 मौलिक सवालों का घटना के अध्ययन में जवाब देना चाहिए- क्या है? कैसे हैं? क्यों है? क्या होगा? और क्या होना चाहिए? इस तरह यह पता चलता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययन भी वैज्ञानिक अध्ययन का ही प्रकार है। 


(5) सामान्यीकरण :


समाजशास्त्र में वैज्ञानिक अध्ययन का मुख्य व अंतिम चरण सामान्यीकरण होता है।

प्रथम चरण में जिस पर प्राकल्पना का निर्माण किया जाता है उसकी सत्यता की जांच अंतिम चरण में की जाती है। वैज्ञानिक अध्ययन की तरह समाजशास्त्रीय अध्ययन में भी आखिरी चरण सामान्यीकरण होता है। समाजशास्त्र में भी संकलन, पहलुओं का सारणीयन, विभाजन इत्यादि करने के पश्चात निष्कर्ष निकाला जाता है तथा प्राकल्पना से उसे मिलाया जाता है। यदि प्राकल्पना से निष्कर्ष मिल जाता है तो उसे समाजशास्त्रीय सिद्धांत का रूप दे दिया जाता है। प्राकल्पना से निष्कर्ष की प्राप्ति नहीं होने की स्थिति में प्राकल्पना को अमान्य करार दे कर समाप्त मान लिया जाता है और इसके स्थान पर नूतन सिद्धांत स्थापित कर दिया जाता है। अनुसंधान और अध्ययन की इस चरणबद्ध प्रक्रिया के फलस्वरुप ही समाजशास्त्र को एक विज्ञान का दर्जा प्राप्त होता है। 


(6) सिद्धांत की सार्वभौमिकता :


वैज्ञानिक सिद्धांतों की तरह समाजशास्त्रीय सिद्धांत सार्वभौमिक होते हैं।

समाजशास्त्रीय सिद्धांत निश्चित परिस्थिति में कारको की आपसी कार्य-कारण प्रभाव संबंधों का विश्लेषण करते हैं। यदि कारणों व परिस्थितियों के गुण नहीं बदलते हैं तो समाजशास्त्रीय सिद्धांत सच और प्रमाणित साबित होता है। वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनेक चरणों के अनुरूप समाजशास्त्र में भी पहलुओं का अध्ययन करके सिद्धांतों का गठन किया जाता है। इसकी जांच करना भी संभव होता है। मैकाइवर एवं पेज ने भी इसके संदर्भ में 'Society' में लिखा है, "समाज सहयोग है जो संघर्ष से गुजरता है।" मैकाईवर एवं पेज द्वारा प्रतिपादित से इस समाजशास्त्रीय सिद्धांत को सार्वभौमिक नियम का समाजशास्त्रीय रूप माना जा सकता है। 


(7) कार्य-कारण संबंधों की विवेचना:


समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भी वैज्ञानिक अध्ययनों की तरह ही कारको का अध्ययन किया जाता है।

कार्य-कारण संबंधों के संचय व अवलोकन की व्याख्या की जाती है। साथ ही कोई भी घटना किन कारणों से घटित होती है, इसका उल्लेख किया जाता है। घटना के परिणामों के कारणों की खोज की जाती है। प्रख्यात साम्यवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने की वकालत की। इनका सूत्र वाक्य था- दुनिया के मजदूरों एक हो, पूंजीपतियों का नाश हो। इस वर्ग संघर्ष में वर्णित आर्थिक शोषण, उत्पादन के संदर्भ और साधन आदि के विषय वस्तु की वैज्ञानिक व्याख्या करके सामाजिक परिवर्तन को समझने की कोशिश की गई है। 


(8) सिद्धांतों की जांच :


समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के अध्ययन उपरांत जांच किया जाता है। समाजशास्त्रीय इतिहास का दृश्यावलोकन करने पर इस प्रकार के कई उदाहरण प्राप्त होते हैं।

दुर्खीम ने आत्महत्या के भौगोलिक सिद्धांत और प्रजातीय सिद्धांत इत्यादि का परीक्षण करके निष्कर्ष निकाला कि वे गलत थे चूंकि पहलुओं के आधार पर वे प्रमाणित साबित नहीं हुए। बहुत सी प्रचलित आत्महत्या के सिद्धांतों का परीक्षण करने के पश्चात दुर्खीम ने आत्महत्या का समाजशास्त्रीय सिद्धांत निरूपित किया। इसी तरह कार्ल मार्क्स ने अपने कई नियमों का परीक्षण किया अतएव सिद्धांतों की परीक्षण के आधार पर वैज्ञानिक अध्ययन प्रक्रिया व समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रक्रिया एक समान है। 


(9) भविष्यवाणी की क्षमता :


समाजशास्त्र में समाज की वर्तमान दशा और दिशा का अध्ययन किया जाता है और इसी के आधार पर आने वाले समय में इसमें क्या होगा? की परिकल्पना की जाती है।

अतएव समाजशास्त्र की संरचना वैज्ञानिक बन जाती है, चूंकि विज्ञान का भी यही मानना है। समाजशास्त्र में सामाजिक बदलाव के संदर्भ में कई भविष्यवाणियां की गई हैं। उनमें से ज्यादातर सच भी हुई हैं। समाज, ग्राम नगर में विकसित हुए तथा संयुक्त परिवार एकांकी परिवार में बदलते गए। इसी प्रकार और भी कई सामाजिक परिवर्तन समाज में हुए हैं जिनके संदर्भ में समाजशास्त्रियों ने भविष्यवाणियां की थीं। इस प्रकार यह पता चलता है कि समाजशास्त्र में भी विज्ञान की तरह भविष्यवाणी करने की योग्यता पाई जाती है। मैक्स वेबर के अनुसार समाजशास्त्र में घटना का अध्ययन करके आगे आने वाली परिस्थितियों के संबंध में भविष्यवाणी की जा सकती है। इस बात की पुष्टि करते हुए कोहेन ने भी 'Modern Social Theory' में स्पष्ट किया है कि समाजशास्त्र भी कुछ सीमा तक भविष्यवाणी करने की योग्यता रखता है। उपर्युक्त तथ्यों से ज्ञात होता है कि समाजशास्त्र की प्रकृति भी वैज्ञानिक होती है। जबकि इसमें वैज्ञानिक अध्ययन प्रक्रिया की ही तरह पहलुओं का एकत्रण, विवेचन, विभाजन व सामान्यीकरण किया जाता है अतः समाजशास्त्र की प्रकृति को वैज्ञानिक माना जा सकता है।


(10) अवलोकन :


तथ्य एकत्रण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन प्रक्रिया में अवलोकन प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। ना केवल सामाजिक विज्ञानों में अवलोकन प्रक्रिया की सहायता से तथ्य इकट्ठे किए जाते हैं अपितु प्राकृतिक विज्ञानों में भी तथ्य एकत्रण हेतु इस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। प्राकृतिक विज्ञानों में सिर्फ असहभागी अवलोकन का उपयोग किया जाता है। समाजशास्त्रीय अध्ययन में किस प्रकार की अवलोकन प्रक्रिया का उपयोग किया जाए यह इस बात पर निर्भर है कि अध्ययन समस्या कैसी है।


समाजशास्त्रीय संरचना की वैज्ञानिकता ज्ञात करने के लिए अवलोकन पद्धति के माध्यम से चरणबद्ध एवं व्यवस्थित तौर पर संग्रहित पहलुओं का विभक्तिकरण किया जाता है।