राजनीति विज्ञान एवं शिक्षा से संबंधित प्रमुख संप्रत्यय - Major Concepts related to Political Science and Education
राजनीति विज्ञान एवं शिक्षा से संबंधित प्रमुख संप्रत्यय - Major Concepts related to Political Science and Education
शिक्षा की आधारभूत अनुशासनों में राजनीती विज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान है। अविकसित. विकासशील एवं विकसित देशों में राजनीती विज्ञान की शिक्षा पर रुचि बढ़ी है। इस विषय में शिक्षा एवं राजनीती विज्ञान का परस्पर प्रभाव देखा जाता है। राजनितिक संस्थाओं का शिक्षा पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। शिक्षा से संबंधित विभिन्न घटनाक्रम, व्यवस्था, नीति आदि को समझने के लिए राजनीती विज्ञान की सहायता मिलती है। राजनैतिक समाजीकरण (Political Socilization). पृथकत्व (Allenation), प्रभावी समूह ( Reference Group). संघर्ष (Conflict). शक्ति का केंद्रीकरण- विकेंद्रीकरण (Decentralization of Power). समानता (Equality) आदि राजनीती विज्ञान एवं शिक्षा से संबंधित प्रमुख संप्रत्यय है।
राज्य, राजनैतिक दल, राजनितिक नेतृत्व, सामाजिक संगठन आदि शिक्षा के लक्ष्य एवं उद्देश्य, पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति, पाठ्यसहगामी गतिविधियाँ आदि का आधार है। सोवियत रशिया, चीन ने साम्यवादी विचारधारा के अनुसार शिक्षा का नीति निर्धारण किया। मुसोलिनी और हिटलर ने अपने फॅसिस्ट एवं नाझी विचारधारा के अनुसार शिक्षा का नीति निर्धारण किया। अमेरिका, फ्रांस, भारत आदि लोकतांत्रिक देशोने लोकतांत्रिक विचारधारा के अनुसार शिक्षा का नीति निर्धारण किया। उदारता, लोकतंत्र, वैज्ञानिकता, लोक कल्याण आदि पर लोकतंत्र में बल दिया जाता है।
• नौकरशाही:
निष्पक्षता एवं कुशलतापूर्वक कार्य संपन्न किया जाए तो व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र अधिक हित हो सकता है। किन्तु बेईमानी, भ्रष्ट्राचार, अकुशलता विलंबता आदि अवगुणों के कारण उचित फल प्राप्त नहीं होता है। प्रभावपूर्ण राजनेताओं के प्रभाव में नौकरशाही कार्य करता दिखाई देता है। यह बहुजन हिताय नहीं है। शिक्षा की सहायता से कर्तव्यशील, नैतिक, चारित्रिक, राष्ट्रभक्त, कुशल नेतृत्वक्षम नागरिकों का निर्माण करना आवश्यक है।
• वर्ग:
भारत में विभिन्न सामाजिक प्रवर्ग पाए जाते है। नैतिकता मनोवृत्ती, संस्कृति, व्यवहार आदि में विभिन्न वर्गों में भिन्नता पायी जाती है। धनिक, उच्च नौकरशाह, राजनितिक आदि उच्च वर्ग में आते हैं। निर्धन, निम्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक पार्श्वभूमी वाले व्यक्ति निम्न वर्ग में आते है। कुछ लोग माध्यम वर्ग में आते है। शिक्षा का प्रयोजन सभी वर्गों के लिए होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय, मानव कल्याणकारी होना आवश्यक है। शिक्षा संस्थानों में भ्रष्ट राजनीती को पनपने नहीं देना चाहिए।
• गतिशीलता :
गतिशीलता परिवर्तन का दूसरा नाम है। सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता व्यक्ति एवं समाज में बदलाव लाता है। क्षैतिज एवं उर्ध्वाकार गतिशीलता के लिए उत्तम शिक्षा की आवश्यकता होती है। समाज के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विकास के लिए विकासात्मक राजनितिक विचारधारा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। विकास को गतिशीलता प्रदान करने कार्य शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए। शिक्षा एवं राजनीती के गठबंधन से संभव है।
• परानुभव:
स्वयं को अन्य स्थिति में रखकर उक्त स्थिति को समझना परानुभव कहा जाता है। राजनीतिक व्यक्ति को यह शिक्षा प्राप्त होगी तो वह उत्तम राजनीतिज्ञ बन सकता है। राजनीती की सहायता से समाज को कौनसी सुविधा प्राप्त होनी चाहिए वह स्वयं समझ जायेंगे। शिक्षकों में भी परानुभाव के गुणों की आवश्यकता है। इस आधार पर विद्यार्थियों की मानसिकता, अवधान, बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमता आदि को समझकर शिक्षा विधि-पद्धति का प्रभावशाली उपयोग किया जा सकता है। शिक्षक का यह कर्तव्य है की वह स्वय एवं अपने विद्यार्थियों को परानुभवी बनाये।
• स्वतंत्रता
स्वतंत्रता यह राजनीती विज्ञान का का विशेष संप्रत्यय है, जो शिक्षा के द्वारा क्रियान्वयन किया जाता है। कहा जाता है कि लोकतंत्र यह केवल राजनितिक प्रणाली नहीं है यह एक आदर्श जीवनप्रनाली. शिक्षाप्रणाली है। देश में कार्यरत सरकार अपनी विचारधारा के अनुसार शिक्षा नीति का निर्धारण करते हैं। व्यक्ति के सर्वागिक विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता आदि मूल्यों का समावेश शिक्षा में होना चाहिए।
प्राय: यह कहा जाता है की शिक्षा एवं शिक्षक को राजनीती से दूर रखना चाहिए। शिक्षा एवं शिक्षक की स्थितियों में सुधार के लिए राजनीती एवं राजनितिक नेताओं का महत्वपूर्ण स्थान होता है।
शिक्षक द्वारा प्रजातंत्रीय रूपसे अपनी समस्याओं का समाधान करना अपेक्षित है। शिक्षा समाज के लिए एवं समाज द्वारा निर्माण विकसित एवं क्रियान्वित की जाती है। शिक्षा राज्य की कक्षा में सम्मिलित होने के कारण स्थानिक राजनेता का संपर्क आता है। शिक्षक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राजनीती से संबंधित रहता ही है। असंतुष्ट शिक्षक एवं विद्यार्थियों की सहायता से अपना राजनितिक प्रभाव समाज में बढ़ाने का प्रयास सभी राजनितिक करते रहते हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र, संप्रदाय, धर्म, लिंग, जन्मस्थान आदि का राष्ट्रीयत्व में विलीनीकरण होना चाहिए एवं राष्ट्रियता का अंतरराष्ट्रीयता में विलीनीकरण होना चाहिए। जिससे समाज में सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय, मानवकल्यान, विश्वकल्यान की भावना का विकास होगा। यह उचित शिक्षा द्वारा ही संभव होगा। राजनीती का उचित एवं पर्याप्त उपयोग मानव जीवन सफल, विकासशिल बनाता है किन्तु राजनीती का दुरुपयोग मानव का वर्तमान एवं भविष्य नष्ट भी कर सकता है। जैसे- नाझिवाद, फॅसिस्टवाद, परमाणु युद्ध आदि
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