प्रमुख शिक्षा आयोग - major education commission

 प्रमुख शिक्षा आयोग - major education commission


स्वतंत्रता के पश्चात देश की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा देने शिक्षा व्यवस्था को पुर्नगठित करने के लिए देश के नेताओं ने शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन पर बल दिया। जिससे शिक्षा व्यवस्था स्वतंत्र राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुकूल बन सकें। इसलिए, भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार करने की दृष्टि से भारत सरकार ने समय समय पर कई शिक्षा आयोगों का गठन किया। इन आयोगो को शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर विद्यमान समस्याओं का अध्ययन करके भारत सरकार को अपने सुझाव देने का निर्देश दिया। यहाँ हम इन आयोगों की चर्चा करेगें।


1 विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग 1948-49 इसे राधाकृष्ण आयोग भी कहते है।

सन 1948 में डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन किया गया इस आयोग ने उच्च शिक्षा के उद्देश्यों, अध्यापक कल्याण, शिक्षा के स्तर, स्नातकोत्तर शिक्षा अनुसंधान, शिक्षा के माध्यम, परीक्षा प्रणाली, धार्मिक शिक्षा, छात्र कल्याण, ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना, स्त्री शिक्षा तथा अर्थ व्यवस्था की सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिये।


2 मुदालियर आयोग- सन् 1952 में डॉ. लक्ष्मण स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया इसे माध्यमिक शिक्षा आयोग भी कहते है। इसने माध्यमिक शिक्षा में सुधार के लिए अनेक सुझाव दिये। इस आयोग में माध्यमिक शिक्षा उद्देश्यों माध्यमिक शिक्षा के पुर्नगठन बहुउद्देशीय विद्यालयों, त्रिभाषा पढ़ाने का पाठ्यक्रम पाठ्यपुस्तकों, परीक्षा प्रणाली अध्यापकों की सेवा शर्ते, निरीक्षण, न्यूनतम कार्य दिवस आदि से सम्बन्धित अनेक सिफारिशें की थी।


3 कोठारी आयोग सन 1964 में डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने सभी स्तरों की शिक्षा के सम्बन्ध में विचार विमर्श किया। इस आयोग ने पूरे देश में एक समान शिक्षा संरचना लागू करने की सिफारिश की। आयोग ने अध्यापक प्रशिक्षण, शैक्षिक समानता, स्कूल शिक्षा के विस्तार, पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति व निरीक्षण, उच्च शिक्षा के उद्देश्यों व कार्यक्रम, विश्वविद्यालयों की व्यवस्था, कृषि तकनीकी, व्यवसायिक व इंजीनियरिंग शिक्षा, अनुसन्धान, प्रौढ़ शिक्षा नियोजन व प्रशासन तथा शैक्षिक वित्त प्रबन्ध जैसे विषयों पर विस्तार से अध्ययन करने के सुझाव प्रस्तुत किये।


4 संस्कृत आयोग सन् 1956 में संस्कृत भाषा व शिक्षा की विभिन्न समस्याओं पर विचार करने के लिए डॉ. सुनील कुमार चटर्जी की अध्यक्षता में संस्कृत आयोग का गठन किया गया।

इस आयोग ने संस्कृत शिक्षा, संस्कृत शिक्षण संस्कृत अनुसंधान, पाण्डुलिपियाँ, संस्कृत विश्वविद्यालय तथा सामान्य नामक छह विषयों पर अत्यन्त महत्वपूर्ण सुझाव दिये। आयोग ने संस्कृत की शिक्षा तथा शिक्षण पर जोर देते हुए संस्कृत विश्वविद्यालय खोलने व संस्कृत अनुसन्धान पर बल दिया। उसने संस्कृत को कार्यालयी भाषा बनाने का सुझाव दिया।


5 राष्ट्रीय अध्यापक आयोग प्रथम विद्यालय स्तर के अध्यापकों से सम्बन्धित समस्याओं पर विचार करने के लिए सन 1983-85 में प्रो. डी वी चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन किया गया था।

इस आयोग ने अध्यापन वृति के उद्देश्य, अध्यापक सम्मान अध्यापक प्रशिक्षण, आचार संहिता, अध्यापक कल्याण तथा प्रतिभाशाली व्यक्तियों को अध्यापन में आकृर्षित करने जैसे विभिन्न मुद्दों पर सरकार को सुझाव दिये। परन्तु केन्द्र सरकार निष्क्रियता से इस आयोग की सिफारिशो पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।


6 राष्ट्रीय अध्यापक आयोग द्वितीय तकनीकी शिक्षा सहित उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अध्यापकों के लिए स् 1983 में प्रो. रईस अहमद की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था। जिसमें विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापकों की सेवा शर्तों प्रोन्नति प्रावधानों तथा प्रशिक्षण से सम्बन्धित समस्याओं का विश्लेषण करके अनेक महत्वपूर्ण सुझाव अपने प्रतिवेदन में प्रस्तुत किये। विद्यालय स्तर की तरह इस आयोग के सुझावों पर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया।