उदारवादी स्त्रीवाद के प्रमुख मुद्दे - Major Issues of Liberal Feminism

उदारवादी स्त्रीवाद के प्रमुख मुद्दे - Major Issues of Liberal Feminism


सदियों से चली आ रही सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक मान्यताओं में स्त्रियों की दोयम स्थिति जेंडर आधारित भिन्नताओं, निजी एवं सार्वजनिक जीवन की जटिलताओं को सरल और समतावादी बनाने के लिए उदारवादी स्त्रीवादी विचार धारा के कुछ प्रमुख बुनियादी उद्देश्य अथवा मुद्दे रहे हैं। इन्हीं कुछ मुद्दों के साथ स्त्रीवाद की यह धारा स्त्रियों के मूलभूत अधिकारों की वकालत करती है। उदारवादी स्त्रीवादी चिंतन परंपरा के अनुसार सामाजिक समरसता की बहाली के लिए आर्थिक अवसरों, क़ानूनी समानता एवं नागरिक अधिकारों तक सबकी पहुँच आवश्यक है। उदारवादी स्त्रीवाद के कुछ प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित हैं-


1. समान शिक्षा


उदारवादी स्त्रीवादी विचारधारा विवेक और प्रबोधन युग की उपज है। वैज्ञानिकता को मान्यता मिलने के साथ-साथ तर्क विधान को महत्त्व दिया जाने लगा था। तर्कवाद एवं प्रकृतिवाद उदारवादी स्त्रीवादी चिंतन की प्रमुख कड़ी रहे हैं।

उदारवादी चिंतन ने पूर्व में प्रतिपादित आदर्श शिक्षण प्रणाली की केंद्रीयता पर प्रश्न उठाया। उनका मानना था कि स्त्रियों एवं पुरुषों के शैक्षिक विषयों के चयन में लैंगिक आधार पर कोई भेद-भाव न किया जाए। उदारवादी स्त्रीवादियों के अनुसार स्त्रियों की दासता का प्रमुख कारण भ्रष्ट सामाजीकरण और स्त्रियों को ज्ञान एवं ज्ञान के स्रोतों से दूर रखा जाना रहा है। पुरुषों ने उन्हें ज्ञान और तर्क से दूर रखकर सदियों से दासता की बेड़ियों में जकड़े रखा है। इन्हीं कारणों को देखते हुए उदारवादी स्त्रीवादी विदुषियों ने स्त्रियों के लिए समान शिक्षा के मसौदे को अपने मुद्दों में शामिल किया। 


2. समान आजादी / स्वतंत्रता


उदारवादी स्त्रीवादी चिंतकों का मानना था कि शिक्षा के साथ-साथ स्त्रियों को हर क्षेत्र और मामलों में बराबर की आजादी हो, क्योंकि उनका मानना था कि स्त्रियाँ वह सब कुछ कर सकने में सक्षम हैं जो पुरुष कर सकता है। बशर्ते उन्हें भी पुरुषों के समान शिक्षा, विवाह, रोजगार आदि मुद्दों पर स्वयं के निर्णय लेने की आजादी और अवसरों की समान उपलब्धता हो।

स्त्रियों को घर या घर से बाहर काम की आजादी, बोलने की आजादी आदि के क्रम में ही स्त्रीवाद की यह धारा स्त्री-पुरुष के लिए निर्धारित परंपरागत काम के बंटवारे की सीमा रेखा को समाप्त किए जाने की भी सिफारिश करती है।


3. समान मताधिकार


अमरीकी स्वाधीनता की घोषणा, नागरिक अधिकारों की फ्रांसीसी घोषणा आदि ने पूर्व की राजनीतिक अधिसत्ता के मनमाने अतिक्रमण से व्यक्तिगत आजादी का मार्ग प्रसस्त किया। मताधिकार एवं क़ानूनी समानता इसकी पूरक शर्त थी। इसे यूरोपीय देशों में 19वीं सदी से लेकर 20वीं सदी तक तमाम संघर्षों के साथ विस्तारित किया गया। वर्ष 1870 में फ्रांस में संवैधानिक रूप से सार्वभौमिक मताधिकार की घोषणा की गई, लेकिन स्त्रियाँ इससे वंचित रखी गई।

मैडम बारबराज ने कहा कि जब संविधान द्वारा सभी फ्रांसीसियों को मताधिकार प्राप्त है, तो इसके मुताबिक स्त्रियाँ भी क़ानूनी रूप से वोट देने की हकदार हैं लेकिन कोर्ट ने इसका खंडन करते हुए कहा कि सभी फ्रांसीसियों में स्त्रियाँ शामिल नहीं। इसकी पुष्टि में कई मनगढ़ंत तर्क भी दिए गए।


उदारवादी स्त्रीवादी बुद्धिजीवियों के अनुसार पुरुषों की बराबरी के लिए स्त्रियों को मताधिकार मिलना आवश्यक है। क्योंकि वोट का अधिकार न सिर्फ व्यक्ति के अपने राजनीतिक अभिव्यक्ति अथवा दृष्टिकोण को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है, बल्कि इससे उन संरचनात्मक व्यवस्थाओं और क्रिया कलापों को भी चुनौती मिलती है, जो उसके निजी अथवा अन्य किसी के शोषण का निमित्त होती हैं। नागरिक जीवन की लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करने के लिए उदारवादी स्त्रीवादी विचारधारा का एक अहम मुद्दा स्त्री मताधिकार की माँग भी रहा है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में स्त्री मताधिकार संगठनों के माध्यम से मताधिकार की माँग जारी रही। साफ्रिज आंदोलन द्वारा स्त्री मताधिकार को एक राजनीतिक अधिकार के रूप में देखा जा रहा था, क्योंकि मताधिकार नागरिकता के बोध के साथ-साथ व्यक्ति को देश और समाज के लिए उत्तरदायी भी बनाता है।


उदारवाद के बुनियादी तत्व समानता, शिक्षा, स्वतंत्रता, नागरिकता जैसे तमाम अधिकार जो एक व्यक्ति को मिलने चाहिए। उन सभी तक स्त्रियों की पहुँच सुनिश्चित कराने के लिए जो भी आवश्यक पहलू होने चाहिए उन सभी मुद्दों को उदारवादी स्त्रीवादी एजेंडे में शामिल किया गया।