प्रकट या गोचर तथा अप्रकट या अगोचर प्रकार्य - manifest or visible and manifest or imperceptible functions

प्रकट या गोचर तथा अप्रकट या अगोचर प्रकार्य - manifest or visible and manifest or imperceptible functions


संरचनात्मक प्रकार्यात्मक विश्लेषण में प्रकार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द है। गोचर एवं अगोचर प्रकार्य की अवधारणा को मर्टन ने फ्रायड से लिया है। प्रकार्य को मर्टन ने वैषयिक परिणाम कहा है जिसका संबंध प्रकार्य की अंतरंग स्थितियों से नहीं होता। मर्टन ने गोचर तथा मकार्य को परिभाषित करते हुए कहता है कि- “प्रगट प्रकार्य या गोचर प्रकार्य वे निरीक्षित परिणाम हैं जो व्यवस्था के अनुकूलन या सामंजस्य में अपना योगदान देते हैं और जो व्यवस्था के अंश ग्रहण करने वालों के द्वारा मान्य एवं इच्छित होते हैं।" अप्रगट या अगोचर प्रकार्य को परिभाषित करते हुए मर्टन कहता है- “अगोचर प्रकार्य वे सहमसंबंधी परिणाम होते हैं जो न तो मान्य होते हैं और न ही इच्छित ।" दूसरे शब्दों में अगोचर प्रकार्य ऐसी स्थिति तथा परिणाम को उत्पन्न करता है जिसके विषय में उसके करने वालों ने न कभी सोचा था और न ही उनकी इन्छा थी। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अगोचर प्रकार्य किसी न किसी गोचर प्रकार्य का परिणाम होता है।


गोचर एवं अगोचर प्रकार्य की परिभाषा से स्पष्ट है कि अगोचर प्रकार्य प्रकार्यों के सहगामी परिणाम हैं। गोचर प्रकार्यों के साथ कुछ ऐसे प्रकार्य भी स्पष्ट हो जाते हैं जो वैषयिक होते हैं किंतु उनका पहले से ध्यान नहीं होता। ऐसे परिणामों की पहले से अपेक्षा भी नहीं। यहाँ यह स्मरणीय है कि अगोचर प्रकार्य ही हैं, दुष्प्रकार्य नहीं। अतः उन्हें अस्वीकृत या अवांछनीय नहीं कहा जा सकता।


ज्ञातव्य है कि गोचर एवं अगोचर प्रकार्य की अवधारणा को मर्टन फ्रायड से लिया है। यद्यपि फ्रांसिस बेकन ने बहुत पहले ही परोक्ष प्रक्रिया की चर्चा की थी। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग उस प्रक्रिया को समझने के लिए किया था जो कि अवलोकन में नहीं आ सकती थी। समाजशास्त्रीयों ने प्रत्यक्ष उद्देश्य तथा क्रिया के प्रकार्यात्मक परिणाम में भेद करने का प्रयत्न किया है। मीड ने स्पष्ट किया कि कानून तोड़ने वाले व्यक्ति के प्रति समूह के सदस्यों का विरोधी भाव समूदाय में एकता उत्पन्न कर देता है। दुर्खीम ने भी दंड का प्रकार्य सामूहिक भावना के संदर्भ में समूह की एकता को बताया है। वास्तव में दोनों प्रकार्य ही हैं क्योंकि कानून तोड़ने वालों का विरोध तथा दंड का उद्देश्य सामूहिक एकता ही है। इसी प्रकार समनर, मैकाइवर तथा थामस नैनिकी ने भी इस अंतर की ओर संकेत किया है।

मर्टन गोचर तथा अगोचर प्रकार्य के अंतर के संबंध में कहा है कि “गोचर तथा अगोचर प्रकार्यों के मध्य अंतर का तार्किक आधार यह है कि पहले किसी विशेष इकाई (व्यक्ति, उपसमूह, सामाजिक या सांस्कृतिक व्यवस्था) के लिए उन वैषयिक परिणामों की ओर संकेत करते हैं जो सामंजस्य और अनुकूलन में योगदान करते हैं और जिनसे वैसी ही अपेक्षा थी, दूसरी उसी प्रकार के अनपेक्षित और अस्वीकृत परिणामों की ओर संकेत करते हैं।” मर्टन ने गोचर तथा अगोचर प्रकार्यों के मध्य अंतर में चार निम्नलिखित उद्देश्यों की चर्चा की है.


अतार्किक दिखाई देने वाले सामाजिक प्रतिमानों के विश्लेषण का स्पष्टीकरण ऐसे बहुत से व्यवहार प्रतिमान हैं जो बाह्य दृष्टि से व्यर्थ, अतार्किक तथा रूढ़िमात्र दिखालाई पड़ते हैं। मर्टन ने गोचर तथा अगोचर प्रकार्य के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए न्यू मैक्सिकों के होपी इण्डियन सूखे के समय वर्षा के लिए एक साथ एकत्रित होकर नृत्य करते हैं। इससे वर्षा हो न हो उन लोगों में सामाजिक एकता की भावना अवश्य ही बलवती होती है। यह अगोचर प्रकार्य है। मर्टन की दृष्टि में ऐसे प्रकार्य इच्छित समूह द्वारा मान्य होते हैं।


सैद्धांतिक दृष्टि से अध्ययन के लिए उपयोगी क्षेत्रों की ओर आकर्षक गोचर तथा अगोचर प्रकार्य के बीच पाए जाने वाले अंतर के प्रति जागरूकता अनुसंधान विषय के ऊपरी सतह तक ही सीमित नहीं रहती अपितु एक सामाजिक तथ्य के अंतर्निहित प्रकार्यों से उत्पन्न उन विभिन्न क्षेत्रों में भी प्रवेश कर सकती है जिन्हें हम प्रायः छोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए यदि उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से वेतन वृद्धि की गई है तो उसके अनुरूप उत्पादन बढ़ा है या नहीं। इस प्रकार समाजशास्त्रीय सिद्धांत के विकास की दृष्टि से उपयोगी विषयों का अध्ययन करने में यह अंतर सहायक है।


समाजशास्त्रीय ज्ञान में महत्वपूर्ण वृद्धि अगोचर प्रकार्यों का विश्लेषण यह प्रकट करता है कि सामाजिक जीवन इतना सरल नहीं है जितना कि वह बाहर से दिखलाई देता है। गोचर प्रकार्यों के आधार पर हमारा नैतिक मूल्यांकन हमाने किसी व्यवहार को अच्छा कह देता है या बुरा किंतु जब हम अगोचर प्रकार्यों का विश्लेषण करते हैं तो वह मूल्यांकन थोढा प्रतीत होता है और जीवन की जटिलता स्पष्ट होने लगती है।


• नैतिक मूल्यांकन का निषेध


• समाजशास्त्रीय विश्लेषण में नैतिक मूल्यांकन से बचना आवश्यक है। समाज में प्रायः नैतिक मूल्यांकन गोचर परिणामों के आधार पर किया जाता है। किसी व्यवहार का मूल्यांकन उसके प्रत्यक्ष परिणामों से निश्चित होता है। अतः अगोचर या अप्रकट प्रकार्यों के आधार पर यदि मूल्यांकन किया जाए तो नैतिक मूल्यांकन को स्थान नहीं मिलता। इस प्रकार शुद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण की दृष्टि से अगोचर प्रकार्यों की अवधारणा बहुत सहायक है। इस संबंध में मर्टन ने अमेरिकी राजनीतिक संस्था का उदाहरण दिया है, जिसकी अत्यधिक आलोचना की जाती हैं। इन संस्थाओं पर गोचर परिणामों के आधार पर उल्लंघन, पक्षपातपूर्ण नियुक्तियाँ तथा नियमों का उल्लंघन संबन्धि आरोप लगाये जाते हैं। किंतु यदि अगोचर प्रकार्यों पर विचार किया जाए तो ज्ञात होता है कि राजनीतिक संस्था, सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था की दृष्टि से क्या भूमिका अदा करती है। मर्टन की दृष्टि में राजनैतिक तंत्र के अगोचर प्रकार्यों को निम्नलिखित दो समाजशास्त्रीय आधारों पर समझा जा सकता है।


(अ) असंरचनात्मक संदर्भ


किसी भी सामाजिक इकाई या संगठन के गोचर एवं अगोचर प्रकार्यों को जान लेने से उसकी संरचना की प्रकृति भी हमारे लिए उसी तरह स्पष्ट हो जाती है

जिस तरह की संरचना की प्रकृति जान लेने से प्रकार्यों को प्रभावशालिता को जानना सरल हो जाता है। इसे स्पष्ट करने के लिए मर्टन ने राजनैतिक संरचना का उदाहरण लिया है। यदि इस संरचना की विभिन्न इकाइयों के गोचर तथा अगोचर प्रकार्यों को हम ठीक से विश्लेषण कर ले तो उस राजनैतिक संरचना की प्रकृति स्पतः ही उभरकर सामने आ जाएगी।


(ब) विभिन्न उप-समूहों के लिए राजनीतिक संस्था के प्रकार्य


राजनीतिक संस्था की शक्ति समुदाय और पड़ोस पर निर्भर करती है। सामान्य जनता से संबंधित समस्याएं अमूर्त होती हैं लेकिन लोगों की व्यक्तिगत समस्याएँ मूर्त और तात्कालिक होती है। राजनैतिक संस्था जनता से वोट के लिए अपील नहीं करती बल्कि समूदाय में रहने वाले लोगों के माध्यम से, व्यक्तिगत संबंधों से वोट प्राप्त किए जाते हैं। मर्टन के शब्दों में “राजनीति व्यक्तिगत बन्धनों में परिवर्तित हो जाती है।” मर्टन ने कुछ ऐसे उपसमूहों की चर्चा की है जिनके लिए राजरीतिक संस्था प्रकार्यों की पूर्ति करती है जितनी पूर्ति स्वीकृत सामाजिक संरचना नहीं कर पाती। ऐसे वर्गों को मर्टन ने उपेक्षित वर्ग का नाम दिया है।


उपर्युक्त आधार पर गोचर एवं अगोचर प्रकार्यों के अंतर को निम्नलिखित आधार पर समझा जा सकता है -


● गोचर प्रकार्य वे परिणाम हैं जो बाहरी तौर पर दिखाई पड़ते हैं इसके विपरीत अगोचर प्रकार्य वे परिणाम हैं जो अंदर ही अंदर क्रियाशील रहते हैं। 


● गोचर प्रकार्य में कर्ता उस कार्य के संभावित परिणाम के संबंध में सचेत रहता है जबकि अगोचर प्रकार्य में कर्ता कार्य सचेत नहीं रहता।


● गोचर या प्रकट प्रकार्य कर्ता द्वारा इच्छित होता है जबकि अगोचर या अप्रकट प्रकार्य इच्छित नहीं होता।


● गोचर प्रकार्य में प्रेरणा परिस्थिति तथा परिणाम कर्ता का जाना पहचाना होता है जबकि अगोचर प्रकार्य में प्रेरणा, परिस्थिति तथा परिणाम के संबंध में कर्ता को कोई पूर्वज्ञान नहीं होता।