विवाहः अर्थ एवं परिभाषा - Marriage: Meaning and Definition
विवाहः अर्थ एवं परिभाषा - Marriage: Meaning and Definition
विवाह का शाब्दिक अर्थ है. "उद्वह" अर्थात् “वधू को वर के घर ले जाना।"
(“उद्वाहतत्व, तेन भार्यात्व सम्पादकं ग्रहणं विवाहः" मनुस्मृति, 3/2.)
मानव समाज में विवाह संस्था के प्रादुर्भाव के बारे में 19वीं शताब्दी में वेखोफन (1815-188, ई.), मॉर्गन (1818-1881 ई.) तथा मैकलीनान (1827-8159) ने विभिन्न प्रमाणों के आधार पर इस मत का प्रतिपादन किया था कि मानव समाज की आदिम अवस्था में विवाह का कोई बंधन नहीं था. नर नारियों को यथेच्छित कामसुख का अधिकार था। ऐसा माना जाता है भारत में श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह की मर्यादा स्थापित की। चीन, मिश्र, युनान के प्राचीन साहित्य में भी कुछ ऐसे उल्लेख मिलते हैं। इनके आधार पर लार्ड एवबरी, फिसोन, हाविट, टेलर, स्पेंसर, जिलन कोव लेवस्की, लियर्ट आदि पश्चिमी विद्वानों ने भी विवाह की आदिम दशा कामचार" की अवस्था मानी। क्रोपारकिन ब्लाख और व्रफाल्ड ने प्रतिपादित किया कि प्रारंभिक. कामचार की दशा के बाद बहुपत्नी अर्थात् अनेक पत्नियाँ रखने की प्रथा विकसित हुई और इसके बाद सभ्यता विकास के चरण में एक पत्नी विवाह का प्रचलन हुआ।
इन सभी विवेचनाओं का खण्डन करते हुए बेस्टरमार्क, लौंग, ग्रास, काले जैसे समाजशास्त्रियों ने लिखा है कि इस कल्पना का हमारे पास कोई पुष्ट प्रमाण नहीं हैं कि भूतकाल में कभी कमाचार की सामान्य दशा प्रचलित थी। इनका मानना था कि विवाह की संख्या मानव समाज में जीवशास्त्रीय आवश्यकताओं से उत्पन्न हुई है। इसका मूल कारण अपनी जाति को सुरक्षित बनाए रखने की चिंता है। इनका तर्क था कि यदि पुरूष यौन संबंधों के बाद पृथक हो जाए, संतान उत्पन्न होने पर उसके समर्थ एवं बड़ा होने तक उसका पोषण न किया जाए तो मानव जाति का अवश्यमेव उन्मूलन हो जाएगा। अतः आत्म संरक्षण की दृष्टि से विवाह संस्था की उत्पत्ति हुई है। यह केवल मानव समाज में ही नहीं, अपितु मनुष्य के पूर्वज समझे जाने वाले गोरिल्ला, चिंपाजी आदि में भी पाई जाती है।
परिभाषाएं
विभिन्न विद्वानों ने हिंदू विवाह को इस प्रकार परिभाषित किया है -
लूसी मेयर के अनुसार "विवाह की परिभाषा यह है कि वह स्त्री पुरुष का ऐसा योग है जिसमें स्त्री से जन्या बच्चा माता-पिता की वैध संतान माना जाय इस परिभाषा में विवाह को स्त्री व पुरुष के ऐसे संबंधों के रूप में स्वीकार किया गया है
जो संतानों को जन्म देते हैं, उन्हें वैध घोषित करते हैं तथा इसके फलस्वरूप माता-पिता एवं बच्चों को समाज में कुछ अधिकार एवं परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं।"
(लूसी मेयर, सामाजिक, नृ-विज्ञान की भूमिका, हिंदू अनुवाद, पृ. 9.)
डब्ल्यू एच. आर. रिवर्स, के अनुसार "जिन साधनों द्वारा मानव समाज यौन संबंधों का नियमन करता है, उन्हें विवाह की संज्ञा दी जाती है।"
(डब्ल्यू एच. आर. रिवर्स, सामाजिक संगठन, हिंदू अनुवाद, पृ. 29)
बेस्टरमार्क, के अनुसार “विवाह एक या एक से अधिक पुरूषों का एक या एक से अधिक स्त्रियों के साथ होने वाला वह संबंध है, जिसे प्रभा या कानून स्वीकार करता है और जिसमें इस संगठन में आने वाले दोनों पक्षों एवं उनसे उत्पन्न बच्चों के अधिकार एवं कर्तव्यों का समावेश होता है।”
(बेस्टरमार्क, द हिस्ट्री ऑफ ह्यूमन मैरिज, वाल्यूम, पृ. 26)
बोगार्ड्स, के अनुसार "विवाह स्त्री और पुरूष के पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की संस्था है।"
(ई. एस बोगार्डस, सोशियोलॉजी, 1957, पृ. 75)
मजूमदार एवं मदान, के अनुसार विवाह में कानूनी या धार्मिक आयोजन के रूप में उन सामाजिक स्वीकृतियों का समावेश होता है जो विषमलिंगियों को यौन क्रिया और उससे संबंधित सामाजिक आर्थिक संबंधों में सम्मिलित होने का अधिकार प्रदान करती है।"
(मजमूदार एवं मदान, एन इन्ट्रोडक्शन इ सोशल एन्थ्रोपॉलजी, पृ. 76)
एच. एम. जानसन के अनुसार विवाह के संबंध में अनिवार्य बात यह है कि यह एक स्थायी संबंध है, जिसमें एक पुरूष और एक स्त्री, समुदाय में अपनी प्रतिष्ठा को खोए बिना संतान उत्पन्न करने की सामाजिक स्वीकृति प्रदान करते हैं।"
(जॉनसन, सोशियोलॉजी ए सिस्टमैटिक इन्ट्रोडक्शन, पू. 146)
हॉबल, के अनुसार “विवाह सामाजिक आदर्श मानदण्डों की वह समग्रता है जो विवाहित व्यक्तियों के आपसी संबंधों को उनके रक्त संबंधियों, संतानों तथा समाज के साथ संबंधों को परिभाषित और नियंत्रित करती है।”
(हॉबल, मैन इन द प्रिमिटिव वर्ल्ड, पृ. 1.5)
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि विवाह दो विषमलिंगियों को पारिवारिक जीवन में प्रवेश करने की सामाजिक-धार्मिक अथवा कानूनी स्वीकृति है। स्त्री पुरूषों एवं बच्चों को विभिन्न सामाजिक व आर्थिक क्रियाओं में सहगामी बनाना, संतानोत्पत्ति करना तथा उनका लालन-पालन एवं समाजीकरण करना विवाह के प्रमुख कार्य हैं।
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