विवाह संबंधी नियम - marriage rules
विवाह संबंधी नियम - marriage rules
विवाह से संबंधित एक अन्य अवधारणा विवाह संबंधी नियम भी महत्वपूर्ण है। ये नियम निम्नलिखित इस प्रकार हैं -
1. अंतर्विवाह (Endogamy)- अंतर्विवाह से तात्पर्य है व्यक्ति अपने जीवन साथी का चुनाव अपने ही समूह से करे। यह समूह अलग-अलग समाजों में अलग-अलग हो सकता है जैसे जाति, प्रजाति, समुदाय इत्यादि। हिंदू धर्म में अपनी ही जाति के अंदर विवाह करना अंतर्विवाह का उदाहरण है।
2. बहिर्विवाह (Exogamy)- बहिर्विवाह से तात्पर्य है कि एक व्यक्ति जिस समूह का सदस्य है उस समूह से बाहर विवाह करे। यह समूह भी अलग-अलग समाजों में अलग-अलग हो सकता है।
हिंदुओं में बहिर्विवाह के निम्नांकित स्वरूप हैं -
1. गोत्र बहिर्विवाह (Clan Exogamy) हिंदू धर्म के अनुसार एक गोत्र के व्यक्ति आपस में विवाह नहीं कर सकते, एक गोत्र के स्त्री-पुरूष आपस में भाई बहिन माने जाते हैं। यद्यपि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 इससे प्रतिबंध समाप्त कर चुका है, फिर भी यह निषेध प्रचलन में है।
2. सप्रवर बहिर्विवाह (Sapravar Exogamy) समान पूर्वज एवं समान ऋषियों को मानने वाले व्यक्ति स्वयं को एक ही प्रवर का सदस्य मानते हैं एवं एक प्रवर के व्यक्ति आपस में विवाह नहीं कर सकते हैं। यद्यपि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 द्वारा इस पर से निषेध हटाया गया है।
3. सपिण्ड बहिर्विवाह ( Sapind Exogamy) सपिण्ड का तात्पर्य है एक ही मृत व्यक्ति को पिण्डदान देने वाले लोग या उसके रक्त कण से संबंधित लोग। मिताक्षरा के अनुसार वे सभी जो एक ही शरीर से पैदा हुए हैं सपिण्डी हैं। सपिण्ड बहिर्विवाह के अनुसार पिता की ओर से एवं माता की ओर से कई पीढ़ियों तक विवाह को निषिद्ध माना गया है। बशिष्ट ने पिता की ओर से आठ एवं माता की ओर से पांच पीढ़ियों तक तथा गौतम ने पिता की ओर से आठ तथा माता की ओर से छः पीढ़ियों तक आपस में विवाह को प्रतिबंधित माना है।
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ने सपिण्ड वहिर्विवाह को मान्यता प्रदान की है। इस अधिनियम ने भी माता एवं पिता दोनों ओर से तीन-तीन पीढ़ियों के सदस्यों के सपिण्डियों में परस्पर विवाह को प्रतिबंधित किया है, परंतु यह भी प्रावधान किया है कि किसी समुदाय विशेष की परंपरा अथवा प्रथा यदि इसे निषिद्व नही मानती है तो एंसा विवाह वैद्व माना जाएगा।
4. ग्राम बहिर्विवाह (Village Exogamy) हिंदू धर्म के कुछ समुदायों में ग्राम बहिर्विवाह भी प्रचलित रहा है। जैसे पंजाब, हरियाणा, एवं दिल्ली में उस गांव में भी विवाह वर्जित था, जिसकी सीमा स्वयं के गांव से लगी हो । यद्यपि वर्तमान में यह समाप्तप्राय है। कुछ जनजातीय समुदायों जैसे असम एवं नागालैण्ड के नागाओं में यह खैल बहिर्विवाह के नाम से प्रचलित है।
5. टोटम बहिर्विवाह (Totem Exogamy) भी जनजातियों में प्रचलित है। अर्थात एक ही टोटम को मानने वाले आपस में विवाह नहीं करते।
3. अनुलोम विवाह (Hypogamy)- जब किसी उच्च सामाजिक समूह के पुरुष का विवाह निम्न सामाजिक समूह की स्त्री से होता है, तो इसे अनुलोम विवाह कहा जाता है। जैसे किसी उच्च जाति, उपजाति, वर्ण, गोत्र एवं कुल के पुरुष का निम्न जाति, उपजाति, वर्ण, गोत्र एवं कुल की महिला से विवाह के.एम. कपाड़िया ने इस प्रकार के विवाह को प्रतिबंधित विवाह की संज्ञा दी है।
4. प्रतिलोम विवाह (Hypergamy) इस प्रकार के विवाह में स्त्री उच्च सामाजिक समूह की एवं पुरूष निम्न सामाजिक समूह का होता है। जब उच्च जाति, उपजाति, वर्ण, गोत्र अथवा कुल की स्त्री का विवाह निम्न जाति, उपजाति, वर्ण, गोत्र अथवा कुल के पुरुष से होता है तो इसे प्रतिलोम विवाह कहते हैं। हिंदू शास्त्रों ने इस प्रकार के विवाह को निषिद्ध माना हैं। वर्तमान में प्रतिलोम विवाह की संख्या काफी कम रही है।
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