मार्क्सवादी स्त्रीवाद - Marxist feminism

मार्क्सवादी स्त्रीवाद - Marxist feminism


मार्क्सवादी स्त्रीवाद का यह मानना है कि 'स्त्री का शोषण वहाँ से शुरू हुआ जहाँ से वैयक्तिक संपत्ति का प्रावधान। एंगेल्स की पुस्तक 'परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति' का मार्क्सवादी स्त्रीवादी चिंतन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस पुस्तक में उन्होंने मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत का प्रयोग किया है। इसमें एंगेल्स इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि “विवाह में पुरुष की श्रेष्ठता उसकी आर्थिक श्रेष्ठता का सीधा परिणाम है। आर्थिक श्रेष्ठता समाप्त हो जाने पर वैवाहिक जीवन में पुरुष की श्रेष्ठता भी समाप्त हो जाएगी। पति पर महिलाओं की आर्थिक निर्भरता का अर्थ यह है कि परिवार के दायरे में पति बुर्जुआ होता है और पत्नी सर्वहारा। नारी की मुक्ति की पहली शर्त यह है कि सभी नारियों को सार्वजनिक उद्यम में ले आना होगा।"


इस प्रकार मार्क्सवाद ने स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को सामाजिक उत्पादन संबंधों तथा स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न के साथ जोड़ा। मार्क्सवाद ने जिस प्रकार सामाजिक व्यवस्थाओं को इतिहास के विकास के साथ जोड़कर समझने की एक पूर्ण विकसित अवधारणा दी,

उसी प्रकार परिवार के भी वर्तमान रूप को अनिवार्य रूप से सामाजिक विकास के इतिहास के साथ जुड़ा हुआ बताया।


एंगेल्स ने प्रागैतिहासिक काल के मातृसत्तात्मक कबीलाई समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों से लेकर सामंती युग के विभिन्न स्तरों तथा पूंजीवादी समाज की परिस्थितियों में परिवार और सूत्री-पुरुष संबंधों के वास्तविक रूप का विस्तृत विवेचन अपनी पुस्तक ( परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति ) में किया है।


उन्होंने एक पूंजीवादी परिवार में स्त्री की स्थिति की तुलना सर्वहारा से तथा पुरुष की तुलना पूंजीपति से की। ठीक इसके विपरीत एक सर्वहारा परिवार में, जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों काम करते हैं, एंगेल्स के शब्दों में पुरुष श्रेष्ठता के अंतिम अवशेषों की नींव भी खिसक जाती है।"


इसी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे सर्वहारा समाज का विस्तार होगा, स्त्री-मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा तथा सामाजिक क्रांति के माध्यम से जब पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था समाप्त होगी,

तो उसके साथ ही पुरुष श्रेष्ठता की दीर्घकालीन परंपरा की जड़ें भी पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। मार्क्स और एंगेल्स ने स्त्री मुक्ति के प्रश्न के वर्गीय आधारों की चर्चा करते हुए यह स्पष्ट किया है कि निजी संपत्ति और वर्गीय समाज के संघठन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरूआत हुई। पूँजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की गुलाम हैं, संपत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुई या तो घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुई हैं। एंगेल्स के अनुसार स्त्री मुक्ति की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्गचेतना को उन्नत किया जाए। सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए। उन्हें मज़दूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में सम्मिलित किया जाए।


उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों ने विशेषकर 1871 के युगांतकारी पेरिस कम्यून में स्त्रियों ने राजनीतिक सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भाग लिया और संगठन बनाए।

फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड यूनियनें संगठित कीं। जर्मन कामगार स्त्रियाँ 'इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी', 'इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राप्ट वर्कर्स' में सम्मिलित हुई। इसकी स्थापना 1869 में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी। स्त्री मुक्ति के प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा स्त्री आंदोलनों को विकसित करने में अगस्त बेबेल की सुप्रसिद्ध कृति नारी और समाजवाद' ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई।


मार्क्स - एंगेल्स के बाद लेनिन ने स्त्री-मुक्ति के प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढ़ाया। स्त्री मुक्ति प्रश्न पर उनके कई महत्वपूर्ण सैद्धान्तिक योगदान थे। उन्होंने बुर्जुआ स्त्रीवाद की स्त्री - मुक्ति विषयक वर्गेत्तर सोच और 'यौन मुक्ति' की बुर्जुआ अवधारणा के साथ ही मार्क्सवाद से प्रेरित स्त्री-मुक्ति आंदोलन की धारा में मौजूद कई अवैधानिक धारणाओं और विजातीय रूझानों का विरोध किया।

स्वतंत्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छन्दता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ यौन मुक्ति नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरूद्ध है, इसे लेनिन ने स्पष्ट किया।


मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन और माओ अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पांचों विचारकों ने कामगार स्त्रियों की उत्पीड़ित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति के रूप में देखा। सर्वहारा क्रांति और स्त्री मुक्ति प्रश्न के समाधान के द्वंद्वात्मक अंतर्संबधों को निरूपित करते हुए लेनिन ने लिखा था- "स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतंत्रता हासिल किए बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतंत्रता नहीं हासिल कर सकता।"


उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोन्ताई और अनेसां आरमां आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी स्त्री मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई।

इन विचारकों के साथ लेनिन के वाद विवाद और विचार-विमर्श के दौरान स्त्री-मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी दृष्टि महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई।


एंगेल्स, अगस्त बेबेल, क्लारा जेटकिन, रोजा लुक्सेमवर्ग, क्रुप्सकाया और लेनिन के स्त्री प्रश्न पर विचारों की एक समृद्ध परंपरा रही। एंगेल्स की पुस्तक परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, अगस्त की बेबेल पुस्तक नारी और समाजवाद तथा नारी: अतीत, वर्तमान और भविष्य, क्लारा जेटकिन द्वारा संपादित जर्मनी की सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी की महिला पत्रिका Die Gleichheit (समानता), लेनिन के साथ क्लारा जेटकिन की वार्ता, जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की एक और महिला नेत्री लिली ब्राउन के साथ क्लारा जेटकिन की बहस आदि ने स्त्री आंदोलन के प्रति मूलभूत मार्क्सवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट किया है।


बीसवीं शताब्दी में मार्क्स, एंगेल्स और बेबेल की विचारधाराओं को आधार बनाकर स्त्रीवाद से संबंधित महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखी गई, जो इस प्रकार जूलियेट मिशेल ने 'वूमन द लॉन्गेस्ट रीवॉल्यूशन' नामक पुस्तक लिखी। शीला रोबॉथम ने वूमन कॉन्शियसनेस' और 'मैन्स वर्ल्ड' लिखी। हेल्डी हार्टमैन ने ‘कैपिटिलिज्म, ‘पैट्रियार्ची एण्ड जॉब सेग्रीगेशन बाय सेक्स', 'अनहैप्पी मैरिज ऑफ मार्क्सिज्म एण्ड फमिनिज्म... टुवर्ड्स ए मोर प्रोग्रेसिव यूनियन' लिखी । माइकल बैरेट ने 'वूमन्स ऑप्रेशन टुडे’, ‘प्रॉब्लम्स इन मार्क्सिस्ट फेमिनिस्ट एनालाइसिस नामक पुस्तकें लिखीं। कैथरिन मिस किनन के व्दारा लिखी गई पुस्तकों के नाम हैं – फेमिनिज्म, मार्क्सिज्म, मेथड एण्ड द स्टेट एण्ड एजेंडा फॉर थ्योरी ।