मार्क्स की समाजशास्त्र को देन - Marx's contribution to sociology
मार्क्स की समाजशास्त्र को देन - Marx's contribution to sociology
कार्ल मार्क्स निःसंदेह एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री थे तथा उन्होंने समाजशास्त्र के अनेक महत्वपूर्ण तत्त्व प्रदान किए। मार्क्स ने सामाजिक यथार्थता (Social Reality) को देखने का एक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य चुना और इसी के आधार पर सामाजिक प्रघटनाओं का निरूपण किया।
मार्क्स ने मानवीय इतिहास के विकास के नियमों का प्रतिपादन कर स्वयं को चार्ल्स डार्विन के समकक्ष ला दिया जिन्होंने प्रकृति के जैविकीय विकास के नियमों की खोज की। उत्पादन के विधि में परिवर्तन, वर्गों का निर्माण एवं वर्ग संघर्ष के परिणामस्वरूप ऐतिहासिक विकास, पूँजीवाद की उत्पत्ति एवं उसके विकास की व्याख्याओं ने कार्ल मार्क्स को एक प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक बना दिया।
हेनरी लैफेबर (H. Lefebure) ने लिखा है- "मार्क्स एक समाजशास्त्री नहीं है, लेकिन मार्क्स में समाजशास्त्र । इस प्रकार हम देखते हैं कि एक समाजशास्त्री के रूप में मार्क्स का सबसे महत्वपूर्ण योगदान मानवीय संबंधों पर किया गया विवेचन एवं विश्लेषण है।
सामाजिक जगत के मार्क्स ने मानवीय संबंधों को निरूपित किया है। समस्त अंतर्विरोधों के होते हुए भी मानव समाज वर्ग के सृष्टा के रूप में एक अंग के रूप में अनवरत संघर्ष करता रहता है। वर्ग संघर्ष के विवेचन के पीछे मार्क्स की विचारधारा का संबंध हीगल के द्वंद्वात्मकता के विचार से हैं। हींगल ने द्वंद्वात्मकता को दार्शनिक रूप दिया मार्क्स ने उस विचार को वास्तविक जगगत के विवेचन में कार्यान्वित किया। मार्क्स के प्रत्येक सिद्धांत का समाज की वास्तविकता से संबंध है, अतः उनमें सामाजिक, राजनीतिक एवं बौद्धिक विकास की अंतर्विरोधमय प्रकृति देखी जा सकती है। इसी कारण मार्क्स के सिद्धांतों की आलोचना की जा सकती है। मजदूर वर्ग को महत्व प्रदान करते ही मार्क्स की विचारधारा का क्रांतिकारी रूप हमारे सामने आता है। अलगाव के विचार का विवेचन करें तो यह अर्थ निकाला जा सकता है कि अलगावित व्यक्ति के लिए समाज वही है जो शासक विचारधारा की शब्दावली में वह होने का दावा करता है। मार्क्स के सिद्धांत न तो भाग्यवादी हैं और न ही नियतिवादी, वे उस भूमि का वर्णन करते हैं जो समाज के विचार में वर्ग चेतना' द्वारा निभाई जाती हैं।
मार्क्स की यह विचारधारा पूँजीवाद के विनाश तथा समाजवाद की प्राप्ति की तरफ की संक्रमण प्रक्रिया को प्रस्तुत करती है। मार्क्स का यह विवेचन समाजशास्त्र को प्रभावित करता है, साथ ही एक ऐसी पद्धति की तरफ संकेत करता है जो समाज के विकास के इतिहास का विवेचन करने में सक्षम है। मार्क्स का सबसे प्रबल विरोध विचारधाराओं के संदर्भ में समाजशास्त्र के पिता एवं संस्थापक अगस्त काम्टे से माना जाता है। अगस्त काम्टे ने समाजशास्त्र में समाज के सहयोग एवं व्यवस्था के संरचनात्मक आधारों को प्रस्तुत किया। सामूहिक हित में कार्यरत सामाजिक वर्गों को इस आधार की सर्वप्रथम इकाई बताया। कार्ल मार्क्स, काम्टे को अधकचरा वैज्ञानिक' कहकर संबोधित करते हैं। कार्ल मार्क्स की काम्टे के तीन स्तरों के नियम से पूर्ण असहमति की संभावना का उल्लेख 'टाम बोटोमोर' ने किया है। काम्टे के इस नियम का रूप हीगल के इतिहास दर्शन से मिलता है क्योंकि मानव मस्तिष्क के विकास को ऐतिहासिक परिवर्तन से संबद्ध करने का इन दोनों ही विचारकों ने प्रयास किया है। मार्क्स ने काम्टे की हींगल से तुलना करते समय भी यह कहा कि 'हीगल की तुलना में काम्टे के सिद्धांतों की स्थिति दयनीय है।"
आगे चलकर अनेक समाजशास्त्री भी ऐसे हुए जो मार्क्स की विचारधाराओं से बहुत अधिक प्रभावित हुए।
इन समाजशास्त्रियों में मैक्स वैबर, जॉर्ज सिमेल, टॉनिज, विलफ्रेडो पैरेटो, सोबर्ट, मोस्का एवं कार्ल मैनहीम के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। हाल ही में समाजशास्त्रीय जगत में जो विरोध प्रबल रूप से उभर कर सामने आया उसने रेडीकल सोशियोलॉजी', 'रिफ्लेसिव सोशियोलॉजी' आदि को जन्म दिया, जिसमें मार्क्स की विचारधाराओं का स्थान अधिक मात्रा में है। साथ ही अमेरिका एवं पश्चिमी देशों का वह समाजशास्त्र जिसमें मार्क्स के सिद्धांतों को संरचनात्मक प्रकार्यवादी सिद्धांत के माध्यम से असत्य सिद्ध करने का प्रयास किया था, नवीन घटनाक्रमों के कारण अपनी लोकप्रियता खो चुका है। वर्तमान में समाजशास्त्री मार्क्स की विचारधारा के आधार पर अध्ययन कर रहे हैं। वे घटनाओं का तथ्यपरक विवेचन कर रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप अनुभववादी एवं प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण पिछड़ता जा रहा है तथा क्रांतिकारी विचार एवं रेडीकल सोशियोलॉजी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। 1883 में मार्क्स की मृत्यु से लेकर प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ तक की अवधि में मार्क्स के विचारों की विवेचना मार्क्सवाद के रूप में विभिन्न सामाजिक विज्ञानों में की गई। मार्क्स के सिद्धांतों को औद्योगिक श्रमिकों के संदर्भ में विशिष्ट महत्त्व दिया जाता है। वर्ग संघर्ष एवं वर्ग-विरोध पर आधारित यह सिद्धांत अपनी विशिष्ट पहचान औद्योगिक श्रमिकों की विवेचना के कारण बनाता है। वर्ग संघर्ष में समझौते को किसी प्रकार का स्थान न देकर कार्ल मार्क्स पूँजीवादी व्यवस्था के मुखर विरोधी के रूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत होते हैं। काल मार्क्स को ठीक उसी प्रकार एक प्रमुख दार्शनिक एवं समाजशास्त्री माना जाता है जिस प्रकार समाजशास्त्र के संस्थापक 'अगस्त काम्टे' को एक दार्शनिक और समाजशास्त्री माना जाता है। ऐसा इसलिए नहीं है.
कि मार्क्स ने जिन समस्याओं का अध्ययन किया व जिन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया वे दर्शनशास्त्र एवं समाजशास्त्र की विषय-वस्तु है, बल्कि यह तर्क सामान्यतया इस आधार पर दिया जाता है कि ये दोनों ही विषय दर्शनशास्त्र एवं समाजशास्त्र अन्वेषण के आधार पर समान है। मार्क्स के विचारों से इस विश्वास की पुष्टि हो जाती है। मार्क्स ने अपने अध्ययनों में समाजशास्त्र को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। इकोनॉमिक एवं फिलॉसॉफिकल मैनुस्क्रिप्ट' जो मार्क्स ने 1844 में प्रकाशित की थी उसमें उसने सेंट साइमन' की युक्ति ‘मानव के विज्ञान (Science of Man) का उल्लेख किया है और अपनी इसी पुस्तक में मार्क्स ने मानव, समाज, धर्म आदि का विस्तार से विवेचन किया है, जो कि मूलतः समाजशास्त्रीय विषय है। इस प्रकार मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद एवं द्वंद्वात्मक भौतिकवाद तथा सामाजिक परिवर्तन, अलगाव, अतिरिक्त मूल्य एवं अतिरिक्त श्रम, समाजवाद आदि सिद्धांतों की विवेचना की जो निःसंदेह मार्क्स के उत्कृष्ट समाजशास्त्रीय योगदान कहे जा सकते हैं। मार्क्स के दास कैपिटल के ग्रंथ भी निःसंदेह समाजशास्त्रीय ही हैं। दास कैपिटल के प्रथम संस्करण की भूमिका से ही स्पष्ट होता है कि मार्क्स ने समाज विज्ञान की अत्यंत विस्तार से विवेचना की है। मार्क्स के पूर्व के लगभग सभी समाजशास्त्रियों ने समाज की सामान्य रूप में विवेचना की थी। इसके विपरीत मार्क्स ने एक ही समाज को अध्ययन का आधार बनाया जिसे वह आधुनिक पूँजीवाद समाज कहते हैं।
मार्क्स ने इसी समाज के विकास के नियमों को स्पष्ट किया है। इसका अर्थ यह है कि मार्क्स रचित 'कैपिटल' समाज का नहीं, केवल एक विशेष समाज का अध्ययन है। समाज विज्ञानों की वैज्ञानिकता भी विशिष्टता पर आधारित होती है न कि सामान्यता पर। कम से कम समाजशास्त्र को तो इसी रूप में देखने का प्रयास कुछ समाजशास्त्री करते हैं। हालांकि अधिकांश समाजशास्त्री समाजशास्त्र का सामान्य रूप में समाज के अध्ययन से संबंध मानते हैं। हरबर्ट स्पेंसर का प्रयास इसी प्रकार का है परंतु लेनिन ने सामान्य रूप में समाज के अध्ययन को पूँजीवादी समाजशास्त्र से संबद्ध माना है क्योंकि इस प्रकार का अध्ययन समाज की वास्तविकता को नकार कर वैचारिक आदर्शों इत्यादि को आधार बनाकर समाज को अमूर्त रूप में प्रस्तुत कर देता है। विश्लेषण का आधार वास्तविक वस्तु न होकर आदर्श वैषयिकता हो जाती है। लेनिन इस प्रकार के समस्त सिद्धांतों को अस्वीकार करते हैं तथा अनुपयोगी बताते हैं। मार्क्स के द्वारा रचित इस पुस्तक की द्वितीय विशेषता भौतिक कारकों एवं उत्पादन शक्ति का विश्लेषण है। कैपिटल के समस्त खंड केवल पूँजीवादी समाज की आर्थिक संरचना उत्पादन के कारकों का इतिहास एवं उनकी गत्यात्मकता का ही विश्लेषण नहीं करते अपितु पूँजीवादी अर्थ राजनीति का भी विश्लेषण करते हैं, जो कि अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत के रूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। वास्तव में पूँजी ग्रंथ को हम आर्थिक विचारों का इतिहास कह सकते हैं, जिसने आर्थिक विकास के समाजशास्त्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। वर्ग के प्रत्यय में अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र विषयों की घनिष्ठता का परिचय मिलता है। 'वर्ग' प्रत्यय को भी दो विशेषताओं के संदर्भ में देखा जा सकता है -
(1) उत्पादन की वैषयिक स्थितियों में कारक के रूप में जिसमें श्रम के विभाजन का ऐतिहासिक विश्लेषण भी सम्मिलित है, एवं
( 2 ) संपूर्ण समाज व समाज की सामाजिक प्रक्रियाओं में राजनीतिक तत्त्वों के रूप में। मार्क्स के समाजशास्त्रीय योगदान कुछ बिंदुओं में बाँटकर समझ सकते हैं, वे हैं -
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