मातृवंशीयता और मातृसत्ता - matrilinealism and matriarchy
मातृवंशीयता और मातृसत्ता - matrilinealism and matriarchy
किसी तर्क या स्थापना को गलत प्रमाणित करने के क्रम में कई बार हम एकदम से दूसरे छोर पर चले जाते हैं और उसे उलटकर ही चैन लेते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्त्रियों की स्थिति के लिहाज से वैदिक युग को स्वर्ण युग प्रमाणित करना रहा है। अंग्रेज़ों ने भारत पर अपनी औपनिवेशिक सत्ता के औचित्य के लिए भारतीय समाज को असभ्य और पिछड़ा हुआ जाहिर करने की कोशिश की थी। इसके लिए बतौर पैमाना उन्होंने स्त्रियों की दयनीय स्थिति को प्रस्तुत किया था। उन्हें गलत सिद्ध करने के लिए जो वैचारिक प्रयास किए गए उनमें से एक की परिणति प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति किसी भी अन्य समाज की तुलना में श्रेष्ठ घोषित करने के रूप में हुई।
इसी तर्ज पर स्त्री- पराधीनता के सर्वकालिक और सार्वदेशिक होने की मान्यता को गलत ठहराने के लिए की गई कवायदों में से एक की परिणति मानव-सभ्यता की शैशवावस्था में मातृसत्ता के विद्यमान होने की धारणा के रूप में हुई।
मातृसत्ता के पहले सिद्धांतकार जे. बखोफेन थे। उनकी किताब 'मदर राईट्स' का हम पहले ही उल्लेख कर चुके हैं। मातृ अधिकार से उनका आशय यह था कि पुरुषों का आधिपत्य स्थापित होने से पहले स्त्रियों का राज था। आरंभ में यौन-स्वच्छंदता की स्थिति थी। ऐसे में केवल बच्चे की माता ही सुनिश्चित की जा सकती थी, पिता कौन है - यह तय कर पाना मुश्किल था। नाम और संपत्ति के पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण का जरिया भी वही थी। धार्मिक परिक्षेत्र में भी देवी और पुरोहित के रूप में स्त्रियों का ही दबदबा था। बखोफेन के बाद रॉबर्ट ब्रिफो ने और भी जानकारियाँ जोड़कर मातृसत्ता के सिद्धांत को पुख्ता किया। 'द मदर्स' (1960) नामक किताब में उन्होंने यही प्रतिपादित किया है कि पुरुषों द्वारा सत्ता हासिल करने से पहले मातृ-अधिकार ही संस्कृति और सामाजिक गठन का स्रोत था। नातेदारी, राजनीतिक संगठन, क़ानून, जादू, धर्म और आर्थिक जीवन- सब कुछ स्त्रियों के हाथों में था।
एंगेल्स से प्रेरणा लेते हुए भारतीय विद्वान देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय और शरद पाटिल ने भारत में आर्यों के आने से पहले के जनजातीय समाज के मातृसत्तात्मक संरचना होने का दावा किया है।
शरद पाटिल ने इसके बारे में अपनी किताब द शूद्र स्लेवरी इन एंशिएण्ट इंडिया' (1982) में विचार किया है। उन्होंने न केवल आर्य-पूर्व भारतीय समाज, बल्कि हड़प्पा सभ्यता तक में मातृसत्ता और मातृवंशीयता के होने का दावा किया है। वे इसे स्त्री-राज्य कहते हैं। इसमें स्त्रियाँ शासक वर्ग थीं। हल आधारित खेती और पशुपालन शुरू हुआ, तो मातृ-अधिकार की जगह पितृ अधिकार की स्थापना हुई और मातृसत्ता की जगह पितृसत्ता वजूद में आ गई।
चट्टोपाध्याय या पाटिल एंगेल्स से प्रेरित होने के बावजूद यह गौर नहीं कर पाए कि एंगेल्स ने पितृसत्ता की उत्पत्ति के पहले की समाज-व्यवस्था के वर्ग-विहीन और राज्य-विहीन होने की बात की है। स्त्रियों की बेहतर स्थिति के लिए उन्होंने भी मातृ-अधिकार, मातृसत्ता और मातृवंशीयता का प्रयोग किया है, लेकिन उनका आशय पाटिल के स्त्री-राज्य जैसी किसी व्यवस्था से कदापि न था।
एंगेल्स ने राज्य को राजनीतिक सत्ता के ही एक और रूप भर के रूप में नहीं लिया।
राज्य एक विशिष्ट और केंद्रीकृत संस्था के रूप में वर्ग समाज में आकार लेता है। उसका स्थान न केवल समाज के दायरे के बाहर, बल्कि उसके ऊपर होता है। दिखाने को तो यह खुद को निष्पक्ष के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन वास्तव में यह अधिपति वर्ग का पक्ष लेता है। एंगेल्स के मुताबिक, अलग प्रशासनिक और सैन्य ताकतों से लैस यह संस्था क्षेत्रमूलक होती है, यानि किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले बाशिंदे इसके दायरे में आते हैं। जबकि वर्ग- पूर्व सामाजिक संगठन जो अमूमन कबीलाई होता है का आधार नातेदारी कुटुंब आधारित होता है। उसमें राज्य जैसी संस्था के लिए कोई जगह नहीं होती है। इसलिए समाज की इस अवस्था में एंगेल्स ने यदि मातृ-अधिकार के विद्यमान होने की बात की है तो उसे स्त्री-राज्य नहीं माना जाना चाहिए। इतिहास में ऐसा कोई भी क्षण या दौर नहीं रहा है जिसमें स्त्रियाँ शासक रही हों और पुरुषों के जीवन में उनका दखल रहा में हो अथवा पुरुषों के श्रमोत्पाद पर उनका हक रहा हो। मातृ-अधिकार से एंगेल्स का आशय स्त्रियों की अपेक्षाकृत बेहतर अथवा पुरुषों के समान स्थिति से था ।
मातृसत्ता की बात करने वालों से सबसे बड़ी चूक यह होती रही है कि वे मातृवंशीयता और इसमें भेद नहीं करते। मातृवंशीयता यानि माता के नाम पर वंश चलने के आधार पर वे सीधे उसकी सत्ता के निष्कर्ष तक पहुँच जाते हैं।
स्त्रीवादी मानवविज्ञानियों ने मातृवंशीय समाजों का अध्ययन करके यह तथ्योद्घाटन किया है कि मातृवंशीयता मातृसत्ता का पर्याय नहीं है।
भारत के केरल का नायर समुदाय न केवल मातृवंशीय, बल्कि मातृस्थानिक भी रहा है। मातृस्थानिक का अर्थ यह हुआ कि विवाहोपरांत पत्नी पति के घर नहीं जाती थी। वह अपने ही परिवार में रहती थी। पति रात्रि-निवास भर के लिए उसके पास आता था। पत्नी के घरेलू जीवन में उसका कोई दखल नहीं था। विवाह - बंधन भी ढीला ही था। अपने समुदाय के किसी पुरुष के साथ विवाह के उपरांत स्त्री अपने या अपने से ऊँची जातियों के अन्य पुरुषों के साथ अस्थायी यौन-संबंध बना सकती थी। शेनेडर और कैथलीन गफ ने इस समाज का अध्ययन कर यह जाहिर किया है कि अपेक्षाकृत खुले परिवेश के बावज़ूद स्त्रियाँ अंतत: भाइयों पर निर्भर थीं। फर्क सिर्फ इतना था कि यहाँ पुरुष सत्ता की अभिव्यक्ति पति के माध्यम से न होकर भाई के माध्यम से हो रही थी।
स्त्रीवादियों के बीच अब इस पर आम सहमति है कि मातृसत्ता कभी भी अस्तित्व में नहीं रही है। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने स्त्री के सर्वदा अधीन होने की धारणा को अंगीकार कर लिया है। स्त्रीवादी मानवविज्ञानियों ने बागवानी वाली खेती की अवस्था में कतिपय समाजों में स्त्रियों की स्थिति को पुरुषों के समान पाया। यह और बात है इनमें से अधिकांश हल आधारित कृषि अथवा वाणिज्य की ओर संक्रमण कर रहे थे और इसलिए पुरुष आधिपत्य आकार ले रहा था।
वार्तालाप में शामिल हों