प्रकार्य का अर्थ - meaning of function
प्रकार्य का अर्थ - meaning of function
प्रकार्य का अर्थ संरचना की विभिन्न इकाइयों की उन भूमिकाओं से है, जिनके द्वारा सावयव या
प्राणी का अस्तित्व बना रहता है। संरचचना की निरंतरता तथा क्रियाशीलता के लिए संरचना की प्रत्येक इकाई महत्वपूर्ण होती है। सावयव का अस्तित्व परिस्थितियों से अनुकमलन पर निर्भर करता है। विभिन्न इकाइयाँ अपनी जिन निश्चित और प्रतिमानित क्रियायों द्वारा संपूर्ण सावयव को अनुकमलन करने में सहायाता देती है, उन्हें उन इकाइयों का प्रकार्या कहते हैं। समाज की विभिन्न निर्मायक इकाइयाँ संपूर्ण सामाजिक संरचना की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए कुछ निश्चित भूमिकाएँ अदा जिस प्रकार शरीर के अस्तित्व के लिए शरीर का प्रत्येक अंग कोई निश्चित भूमिका अदा करता है उसी प्रकार सामाजिक शरीर के विभिन्न अंग निश्चित कार्यों के द्वारा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करते हैं। प्रकार्य के अर्थ के स्पष्टीकरण के लिए कुछ परिभाषाएँ द्रष्टव्य है
रेडक्लिफ ब्राउन ने प्रकार्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि- “किसी सामाजिसक इसकाई का प्रकार्य उस इकाई का वह योगदान है जो सामाजिक व्यवस्था को क्रियाशीलता के रूप में सामाजिक जीवन देती है।
इनकी दृष्टि में संरचना विभिन्न सांस्कृतिक लक्ष्यों की क्रमबद्ध प्रणाली है। प्रकार्य सामाजिक संरचना एवं सामाजिक जीवन में सन्निहित अंतः संबंधों की कड़ी है। प्रकार्य द्वारा सदस्यों की आवश्यकताएँ पूरी होती है। प्रकार्य सर्वदा स्वीकारमूलक नहीं होता बल्कि दुष्पिकार्यात्मक भी होता है।
ब्राउन की दृष्टि में सामाजिक इकाइयों की प्रकार्यात्मक अंतः निर्भरता और संबद्धता द्वारा सामाजिक संरचना में व्यवस्था एवं एकता बनी रहती है। इन्होंने जैविकीय सावयव की भाँति सामाजिक सावयव को मानकर प्रकार्य की व्याख्या की है। जिस प्रकार शरीरिक प्रक्रिया का प्रकार्य सावयव की आवश्यकताओं और प्रक्रिया के बीच निरंतर संबंध बताए रखना है। उसी प्रकार व्यक्ति संरचना की आवश्यक इकाइयाँ है जो सामाजिक संबंधों के जटिल जाल में एक संगठित संपूर्णता के रूप में बंधे रहते हैं। इस दृष्टि से प्रक्रिया की व्याख्या करते हुए लिखा है कि- “किसी भी निरंतर होने वाली क्रिया, जैसे अपराध, दंड या अंतिम संस्कार, का प्रकार्य वह भूमिका है जिसे वह संपूर्ण सामाजिक जीवन को पूर्ण करती है और इस आधार पर संरचनात्मक निरंतरता को बनाए रखने के लिए योगदान करती है। "
मेलीनासकी के अनुसार, ( प्रकार्य शब्द का अर्थ है वह भूमिका जो संस्कृति की आतंरिक व्यवस्था के अंतर्गत निभाते हैं, वह पद्धति जिसके द्वारा व्यवस्था के अंतर्गत एक-दूसरे से संबंधित रहते हैं।( इनकी दृष्टि में प्रकार्य उस भूमिका की ओर संकेत करता है जो समाज में किसी सामाजिक या सांस्कृतिक तत्व द्वारा निभाई जाती है। यह भूमिका केवल सामाजिक संरचना या व्यवस्था के लिए ही नहीं वरन् व्यक्ति की जैविकीय आवश्यकताओं की पुर्ति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। दनके विचार से प्रथा, परंपरा, विचार, विश्वास, संस्था और भौतिक संस्कृति से संबंधित तत्व सामाजिक व्यवस्था तथा वैयक्तित जैविक व्यवस्था आवश्यकताओं की पुर्ति की दृष्टि से कुछ प्रकार्य करते हैं।
स्पेंसर की दृष्टि में प्रकार्य में परिवर्तन के बिना संरचना में परिवर्तन संभव नहीं है। समाज में कुछ ऐसे भी परिवर्तन होते हैं जो प्रत्यक्ष तो नहीं दखिलाई पड़ते किंतु उन्हें प्रकार्यो के परिवर्तन द्वारा अच्छी तरहज समझा जो सकता है। उदविकासीय क्रम में प्रकार्य की धारणा व्यापक बनती जाती है। छोटे समूहों में, चाहे वे वैयक्तिक हों या सामाजिक, अंगे के प्रकार्य परस्पर बहुत कम निर्भर होते हैं।
इसके विपरीत विकसित समूहों में क्रियाओं का संयोजन इस प्रकार का होता है कि क्रियाएँ ही अंगों में गति उत्पन्न करती है। कोई भी अंग पृथक रहकर क्रिया नहीं कर सकता और न ही किसी के अंग के बिना पारस्परिक क्रिया में क्रियाशीलता आ सकती है। सामाजिक जीवन भी इसी प्रकार की क्रियाओं द्वारा संग्रहित है। संरचना एवं प्रकार्य का संबंध अपरिहार्य है। सामाजिक क्रियाओं में जितनी ही विशिष्टता आती जाती है, सामाजिक सरचना में उतनी ही मात्रा में जीवन शक्ति की वृद्धि होती है।
यदि कोई संगठन समग्र रूप से ऐसे अंगों द्वारा निर्मित है, जो परस्पर निर्भर होकर ही क्रियाशील होते हैं तो ऐसे संगठन से किसी अंग को पृथक करना घातक सिद्ध हो सकता है। ऐसी दशा में सभी अंगों का साथ लगा रहना आवश्यक है। यह सत्य वैयक्तिक एवं सामाजिक सावयव दोनों पर खरा उतरता है।
दुर्खीम के अनुसार - " किसी सामाजिक अथ्य का प्रकार्य सदैव सामाजिक उद्देश्य के साथ उसके संबंध में खोजना चाहिए। दुर्खीम ने प्रकार्य की व्याख्या सामाजिक उद्देश्य के रूप में की है।
इनकी दृष्टि में किसी सामाजिक तथ्य का प्रकार्य किसी सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करना है। इनके अनुसार तब हम किसी सामाजिक घटना का स्पष्टीकरण करते हैं तो हमें उस सामाजिक घटना की उत्पत्ति के कारण तथा उसके प्रकार्यों का पृथक-पृथक अध्ययन करना चाहिए। प्रकार्य शब्द का प्रयोग हम लक्ष्य या प्रयोजन के बदले करते हैं क्योंकि सामाजिक घटना सामान्यतया अपने द्वारा उद्भूत एकमात्र सामाजिक परिणामों के द्वारा अस्तित्व में नहीं रहती। हमें सामाजिक तथ्य एवं सामाजिक आवश्यकता के बीच एक संबंध स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। इस संबंध में दुर्खीम ने लिखा है कि किसी सामाजिक तथ्य का प्रकार्य सदैव किसी सामाजिक उद्देश्य के साथ उसके संबंध में खोजना चाहिए। ( दुर्खीम ने प्रकार्य शब्द का पर्यायवाची नहीं माना है। उनके अनुसार प्रकार्य के दो अर्थ होते हैं, प्रथम महत्वपूर्ण गतिविधियों की व्यवस्था जिसमें परिणामों पर ध्यान दिया जाता है और दुर्खीम ने दूसरे अर्थ में प्रकार्य की व्याख्या की है।
जॉनसन के अनुसार "कोई भी आंशिर संरचना, उपसमूह का एक प्रारूप, एक भूमिका,
एक सामाजिक आदर्श नियम या एक सांस्कृतिक मूल्य का वह योगदान जो एक सामाजिक व्यवस्था या उप व्यवस्था, एक या अधिक सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, उसको प्रकार्य कहा जाता है।"
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रकार्य तथा उद्देश्य में अंतर है। जॉनसन की दृष्टि में सामाजिक संरचना का कोई भाग मूल्य, आदर्श इत्यादि समाज की किसी आवश्यकता की पूर्ति करता है तो वह उसका प्रकार्य है।
मर्टन के अनुसार “प्रकार्य वे अवलोकित परिणाम है जो सामाजिक व्यवस्था ने साथ अनुकूलन या सामंजस्य बढ़ाते हैं।" मर्टन की दृष्टि में प्रकार्य का संबंध क्रिया के परिणामों से हैं अध्ययन कर्ता के सम्मुख वे स्पष्ट परिणाम जो सामाजिक या व्यक्तिगत अनुकूलन में सहायता करते हैं, प्रकार्य कहलाते हैं।
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि प्रकार्य किसी सावयवी संरचनात्मक व्यवस्था से संबंधित है। सामाजिक संदर्भ में इसकी व्याख्या तभी सार्थक है जब समाज को एक सावयव के रूप में स्वीकार किया जाए जिसका निर्माण परस्पर संबद्ध इकाइयों के योग से होता है और जिसकी विभिन्न इकाइयाँ सामाजिक व्यवस्था के स्थायित्व एवं निरंतरता के लिए कुछ निश्चित भूमिकाएँ अदा करती है तथा इन भूमिकाओं के कारण संपूर्ण सावयव पर निर्भर रहती है तथा संपूर्ण संरचना एवं अन्य इकाइयों की क्रियाशीलता में सहायक होती है। विभिन्न इकाइयों की इन भूमिकाओं को ही सामाजिक विवेचन में प्रकार्य की संज्ञा दी जाती है।
वार्तालाप में शामिल हों