मिडिल रेंज सिद्धांत का अर्थ - Meaning of Middle Range Theory

मिडिल रेंज सिद्धांत का अर्थ - Meaning of Middle Range Theory


छोटी-छोटी प्राकल्पनाओं में समान रूप से पाई जाने वाली अवधाराणाओं से जिन सिद्धांतों का निर्माण किया जाता है. वे ही मिडिल रेंज सिद्धांत है। मर्टन ने इसे मिडिल रेंज इसलिए कहा है. क्योंकि इसके ऊपर वृहद अथवा महत सिद्धांत होते हैं तथा इसके नीचे या लघु समुदाय जैसे अध्ययनों पर आधारित लघु सिद्धांत होते हैं। मेक्रो अध्ययन और माइक्रो अध्ययन के बीच में स्थिति ही मिडिल रेंज सिद्धांत है।


मर्टन की दलील है कि जब समाज विज्ञान की अनुसंधान पद्धति अत्यधिक विकसित नहीं हो जाती, तब तक हमें मध्य सीमावर्ती सिद्धांत बनाना चाहिए। भौतिकी के मॉडल पर समाज वैज्ञानिक सिद्धांत अभी नहीं बनाए जा सकते। पारसन्स का ऐसा श्याम का निर्माण वास्तव में सच्चाई से मुँह मोड़ना है। मर्टन का मत है कि सिद्धांत ऐसे बनाने चाहिए जिनका निष्कर्ष उनसे भी व्यापक सैद्धांतिक निष्कर्षों से मेल खाता हो। प्रतिदिन की जीवन की समस्याओं पर मध्य सीमावर्ती सिद्धांतों का निर्माण करके उन्हें अति व्यापक सिद्धांतों के आलोक में देखा जा सकता है।


मध्य सीमावर्ती सिद्धांत क्या है? (What is middle-range Theory) समाज वैज्ञानिक सिद्धांतों के निर्माण के संदर्भ में मर्टन की एक स्पष्ट दृष्टि है। वे मानते हैं कि सिद्धांत वास्तव में तर्क वाक्यों अथवा प्रस्थापनाओं (Set of propositions) के तार्किक अंतरसंबंधों की ऐसी व्यवस्था है जिससे तथ्यगत एक समानताएँ (empirical uniformities) प्राप्त की जा सके। समाज वैज्ञानिक सिद्धांतों के निर्माण संबंधी मर्टन की दृष्टि को निम्नलिखित सूत्रों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।


तार्किक नियमानुसार सूत्रबद्ध करने पर आधारित है


उक्त सूत्र (दृष्टिकोण) का अनुसरण करते हुए मर्टन ने मध्य सीमावर्ती सिद्धांत की व्यापार प्रस्तुत की है।


मर्टन के अनुसार समाज विज्ञान में अभी पूर्ण व्याप्त सिद्धांत का निर्माण संभव नहीं है। टालकट पारसन्स तथा सोरोकिन द्वारा दिए गए पूर्ण व्यवस्था के सिद्धांतों की आलोचना करते हुए मर्टन कहते हैं

कि ऐसे सिद्धांत तथ्य और तर्क पर आधारित नहीं है। इसे दर्शन की पद्धति कहा जाना अधिक उचित है। मर्टन कहते हैं कि समाजविज्ञान में जब तक तर्कों और तथ्यों पर आधारित सिद्धांतों का व्यवस्थित ढंग से निर्माण की प्रणाली विकसित नहीं हो जाती है। तब तक मध्य-सीमावर्ती सिद्धांतों का निर्माण किया जाना उचित है।


मर्टन के अनुसार "मध्य अभिसीमा के सिद्धांत सामाजिक घटनाओं के सीमित पक्षों से संबंधित होते हैं।" अर्थात् मध्य अभिसीमा के सिद्धांत एक ही समय में एक साथ सभी प्रकार के सामाजिक व्यवहार, सामाजिक संगठन और सामाजिक परिवर्तन को व्यक्त नहीं कर सकते हैं, बल्कि ये तो सिर्फ किसी सामाजिक घटना के निश्चित तथा सीमित पक्ष से ही संबंधित होते हैं।


भौतिक मॉडल की तर्ज पर समाज विज्ञान में संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के सिद्धांत की वकालत करने वाले टालकट पारसन्स की आलोचना करते हुए मर्टन कहते हैं

कि प्रतिदिन के जीवन की समस्याओं की हम उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। प्रतिदिन जीवन में खड़ी होने वाली छोटी-छोटी किंतु महत्वपूर्ण समस्याएँ ही जिंदगी की कड़वी हकीकत है, इसकी उपेक्षा करके किसी सिद्धांत का निर्माण करना सच्चाई से मुह मोड़ना होगा. साथ ही उस सिद्धांत की उपयोगिता भी संदिग्ध ही होगी। पारसन्स पर ही मर्टन प्रश्न अथवा महत सिद्धांत के निर्माण की वकालत करते हैं। उसके औचित्य पर ही मर्टन प्रश्न अथवा तर्क उठाते हैं। इस कड़ी में मर्टन द्वारा उठाए गए प्रश्न अथवा तर्क निम्नलिखित है।


• सामान्यतया संपूर्ण व्यवस्था का सिद्धांत के निर्माण की वकालत करने वाले इस भ्रांति के शिकार है कि व्यापक आँकड़ों के बिना भी ऐसे सिद्धांत बन सकते हैं जबकि, वास्तविकता तो यह है कि प्राकृतिक विज्ञानों से भी पूर्ववर्ती आँकड़ों के बिना सिद्धांत का निर्माण नहीं हो सकता है। आँकड़ों के संकलन व संग्रह में समाज विज्ञान बहुत पीछे है।


• वे एक ओर इस भ्रांति के शिकार है कि समाज विज्ञान भी प्राकृतिक विज्ञानों के सदृश्य समुन्नत तथा परिपक्व हैं, जबकि हर विज्ञानों की परिपक्वता का स्तर भिन्न भिन्न है। प्राकृतिक विज्ञानों की विकास-यात्रा लगभग 400 वर्षों से अधिक की अवधि का सफर तय कर चुकी है। इसमें पर्याप्त मात्रा में धन, जन और श्रम का विनियोग हो चुका है। इसकी तुलना में समाज विज्ञान की विकास यात्रा 150 वर्षों से अधिक की नहीं है तथा समाज विज्ञान में तुलनात्मक दृष्टि से धन, में जन और श्रम का विनियोग भी बहुत कम हुआ है। इसलिए समाज विज्ञान प्राकृतिक विज्ञानों के समान परिपक्व नहीं हो सकता है।


• तीसरी भ्रांति यह समझना है कि भौतिक शास्त्र में सिर्फ संपूर्ण सिद्धांत ही होते हैं, जबकि सामान्यतया भौतिकशास्त्री यह मानते हैं कि संपूर्ण सिद्धांतों के निर्माण की संभावना निकट भविष्य में दिखलाई नहीं पड़ रही है।


उक्त तीनों प्रकार की भ्रांतियों से सजग करते हुए मर्टन ने मध्य सीमावर्ती सिद्धांत के निर्माण-विधि की विवेचना करते हुए कहा है कि प्रतिदिन की घटनाओं को परिसीमित करके सिद्धांतों का निर्माण करना चाहिए।

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मान्यतया जब सामाजिक घटना को परिसीमित कर दिया जाता है, तो उसे कोई पदनाम दे दिया जाता है। यथा प्रसंग समूह व्यवहार, आदर्शशून्यता कर्मचारी तंत्र, आदि। प्रतिदिन की घटनाओं से जुड़े हुए सामाजिक व्यवहार में तथ्यगत एकरूपता स्थापित करना है। गुणवत्ता की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, जो अतिसीमित भी न हो तथा अति व्यापक भी न हो। इसे ही मध्य सीमावर्ती सिद्धांत कहते हैं।


मूल विचार से कुछ खास प्राकल्पनाएँ उत्पन्न होती है। इन प्राकल्पनाओं के परीक्षण की प्रणाली कुछ इस प्रकार की होती है, जिससे अनुमानों का परीक्षण प्रयोग सिद्ध रूप में होता है। इस तरह से स्वयं विचार की उपयोगिता के आधार पर उसका परीक्षण सैद्धांतिक समस्याओं तथा प्राकल्पनाओं की अभिसीमा को समझ कर दिया जाता है. जिसके आधार पर वायुमंडलीय दबाव की नूतन विशिष्टिताओं से हम अवगत होते हैं।"


मर्टन के अनुसार मध्य अभिसीमा सिद्धांतों की समाजशास्त्र में उपयोगिता मुख्यतः प्रयोगसिद्ध शोधी का दिशा-निर्धारण करना है। मध्य अभिसीमा का सिद्धांत जहाँ एक ओर सामाजिक व्यवहार, संघठन व परिवर्तन की विशिष्ट श्रेणियों से बहुत दूर जो कुछ निरीक्षण किया गया है। उसे बतलाने के लिए सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़े सामान्य सिद्धांतों तथा वहीं दूसरी ओर जिसका सामान्यीकरण नहीं किया गया है ऐसे विवरणों का विस्तृत क्रमबद्ध अध्ययन/वर्णन. इन दोनों के बीच का या मध्यवर्ती होता है।


मध्य अभिसीमा सिद्धांतों को संदर्भ-समूहों और सापेक्षिक वंचना जैसे उदाहरणों द्वारा भी स्पष्ट किया जा सकता है। उसे जेम्स, वाल्डबिन आदि ने प्रस्तुत किया था हाइमन व स्टुफर ने विकसित किया था। इस विचार के अनुसार लोग दूसरे महत्वपूर्ण व्यक्तियों के स्तरों को अपने-अपने विषय में मूल्यांकन करने का आधार मानते हैं। सामान्यतया हम यह समझते हैं कि एक सामूहिक तबाही की अवस्था में एक परिवार को जितनी अधिक छति पहुँचेगी वह अपने आपको उतना ही अधिक वंचित महसूस करेगा, क्योंकि सामान्यतया प्रत्येक परिवार क्षति की मात्रा को अपनी वास्तविक क्षति के आधार पर ही आँकता है।

जबकि सापेक्षित संरचना का सिद्धांत अत्यधिक विपरीत प्राकल्पना को प्रस्तुत करता है। जिसके अनुसार व्यक्ति अपनी परिस्थिति की तुलना दूसरों से करता है तथा तुलनात्मक आधार पर ही वह अपने बारे में निष्कर्ष निकालता है। अर्थात् दूसरों की तुलना में बहुत कम क्षति होने के कारण अपनी क्षति की में महत्वहीन मानेगा। प्रयोग सिद्ध अनुसंधान से भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ऐसे लोग जिनकी सर्वाधिक क्षति हुई है। वे उन लोगों के लिए एक संदर्भ समूह बन जाएँगे जिनकी तुलनात्मक दृष्टि से कम क्षति हुई है। यदि इस अनुसंधान कार्य को और आगे बढ़ाया जाए तो यह भी स्पष्ट होगा कि इस प्रकार के आत्ममूल्यांकन की प्रणाली उस समुदाय के सदस्यों की नैतिकता तथा दूसरों की मदद करने की सोच की प्रभावित करता है। जिसकी हम निरीक्षण परीक्षण और प्रयोग के माध्यम से देख सकते हैं। इस निष्कर्ष को इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है- “जब कतिपय व्यक्ति समान रूप से क्षतिग्रस्त होते हैं तो उनका कष्ट और क्षति बहुत बड़े रूप में दिखाई पड़ता है, किंतु जब व्यापक पैमाने पर लोग क्षतिग्रस्त होते हैं तो बड़े कष्ट और बड़ी क्षति भी हुई होती है तथा उन दोनों की तुलना करने पर वह छोटी नजर आती है। यही सिद्धांत मध्य क्षेत्रीय सिद्धांत होगा।" इसका हर सिद्धांत सिर्फ एक ऐसे प्रयोग सिद्ध सामान्यीकरण से कही सिद्धांत विचारों के एक समुच्चय द्वारा निर्मित होता है। जिससे स्वयं प्रयोगसिद्ध सामान्यीकरणों को निकाला जाता है।


मर्टन का मानना है कि मध्य अभिसीमा सिद्धांतों को विकसित करके इसी के माध्यम से समाजशास्त्र का विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। संभवतः इसीलिए टी. एच. मार्शल ने 1946 के मध्य दूरी में समाजशास्त्रीय कदम रखने अर्थात् मध्यवर्ती नीति को क्रमशः विकास का साधन मानने का सुझाव दिया था।