सामाजिक परिवर्तन का अर्थ - meaning of social change
सामाजिक परिवर्तन का अर्थ - meaning of social change
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जिसके कारण मानव के विचारों, आदर्शों तथा मूल्यों में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं, इसी लिए कहा जाता है कि परिवर्तन संसार का शाश्वत नियम है। और यह परिवर्तन मानव जीवन में होना आवश्यक है। इसी प्रकार मानव निर्मित समाज में भी परिवर्तन होते रहते है। जिस प्रकार मनुष्य गतिशील है ठीक उसी प्रकार मानव निर्मित समाज भी गतिशील है। किसी भी समाज में परिवर्तन की दर तेज या मंद हो सकती है लेकिन यह निरंतर प्रक्रिया के रूप में प्रत्येक समाज में गतिमान है। आधुनिक समाज में नई-नई तकनीकों, अविष्कारों, यातायात के साधनों, नगरीकरण, औधोगिकीकरण के परिणाम स्वरूप समाज के ढाँचे या संरचना में होने वाले परिवर्तन को हम सामाजिक परिवर्तन के रूप में परिभाषित करते है। दूसरे शब्दों में प्रत्येक समाज की अपनी एक संरचना होते है, अपने व्यवहार प्रतिमान होते हैं और सामाजिक कार्यों को संपादित करने की अपनी विधियाँ होती है।
इन्हीं सामाजिक संरचना, व्यवहार प्रतिमान कार्य संपादन विधियों में होने वाले स्थायी परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।
किंग्सले डेविड के अनुसार, "सामाजिक संरचना और उसके कार्यों में होने वाले परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।"
मैकाइवर एवं पेज के शब्दों में, “समाज के दांचे में परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन है।"
एम. गिंसबर्ग के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन से आशय है सामाजिक संरचना में परिवर्तन आना, उदाहरणार्थ समाज के आकर एवं उसके संगठन के विभिन्न भागों में संतुलन आने से है।” बी. कुप्पूस्वामी के अनुसार, सामाजिक परिवर्तन सामाजिक संरचना एवं सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन है।"
हैरी जांसन ने सामाजिक परिवर्तन के अंतर्गत निम्नलिखित पांच प्रकार के परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन के रूप में मान्यता प्रदान किया है
• सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन
• संस्थागत परिवर्तन
• संपति तथा पुरस्कार की वितरण प्रणाली में परिवर्तन
• कार्यकर्ताओं में परिवर्तन
• कार्यकर्ता की योग्यताओं या अभिवृत्तियों में परिवर्तन
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं की सामाजिक परिवर्तन के अन्तर्गत हम मुख्य रूप से तीन तथ्यों का अध्ययन करते हैं-
(क) सामाजिक संरचना में परिवर्तन,
(ख) संस्कृति में परिवर्तन एवं
(ग) परिवर्तन के कारक।
सामाजिक परिवर्तन के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कुछ प्रमुख परिभाषाओं पर विचार करेंगे। एवं पेज (R.M. Maclver and C.H. Page) ने अपनी पुस्तक Society में सामाजिक परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए बताया है
कि समाजशास्त्री होने के नाते हमारा प्रत्यक्ष संबंध सामाजिक संबंधों से है और उसमें आए हुए परिवर्तन को हम सामाजिक परिवर्तन कहेंगे। डेविस (K. Davis) के अनुसार सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना एवं प्रकार्यों में परिवर्तन है। एच0एम0 जॉनसन (H.M. Johnson) ने सामाजिक परिवर्तन को बहुत ही संक्षिप्त एवं अर्थपूर्ण शब्दों में स्पष्ट करते हुए बताया कि मूल अर्थों में सामाजिक परिवर्तन का अर्थ संरचनात्मक परिवर्तन है। जॉनसन की तरह गिडेन्स ने बताया है कि सामाजिक परिवर्तन का अर्थ बुनियादी संरचना (Underlying Structure) या बुनियादी संस्था (Basic Institutions) में परिवर्तन से है।
ऊपर की परिभाषाओं के संबंध में यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन एक व्यापक प्रक्रिया है। समाज के किसी भी क्षेत्र में विचलन को सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है।
विचलन का अर्थ यहाँ खराब या असामाजिक नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक, भौतिक आदि सभी क्षेत्रों में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है। यह विचलन स्वयं प्रकृति के द्वारा या मानव समाज द्वारा योजनाबद्ध रूप में हो सकता है। परिवर्तन या तो समाज के समस्त ढाँचे में आ सकता है अथवा समाज के किसी विशेक्ष पक्ष तक ही सीमित हो सकता है। परिवर्तन एक सर्वकालिक घटना है। यह किसी-न-किसी रूप में हमेशा चलने वाली प्रक्रिया है। परिवर्तन क्यों और कैसे होता है, इस प्रश्न पर समाजशास्त्री अभी तक एकमत नहीं हैं। इसलिए परिवर्तन जैसी महत्वपूर्ण किन्तु जटिल प्रक्रिया का अर्थ आज भी विवाद का एक विषय है। किसी भी समाज में परिवर्तन की क्या गति होगी, यह उस समाज में विद्यमान परिवर्तन के कारणों तथा उन कारणों का समाज में सापेक्षिक महत्व क्या है, इस पर निर्भर करता है। सामाजिक परिवर्तन के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए यहाँ इसकी प्रमुख विशेषताओं की चर्चा अपेक्षित है।
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