क्रिया का अर्थ - meaning of verb
क्रिया का अर्थ - meaning of verb
यदि हम संपूर्ण मानव जीवन की विवेचना करें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि हर क्रिया प्रधान है। अत्यंत ही सरल शब्दों में हम जो कुछ भी करते हैं, उसे क्रिया के नाम से जाना जा सकता है। गीता में इसी क्रिया को कर्म कहकर संबोधित किया गया है और गीता में संपूर्ण जीवन को ही कर्म माना गया है। के अनुसार जीवन और कर्म अभिन्न है और इन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार जीवन में जो भी कार्य किए जाते हैं। क्रिया के नाम से जाने जाते हैं। इसी आधार पर पारसन्स ने क्रिया की व्याख्या करते हुए लिखा है कि “क्रिया कर्ता परिस्थिति व्यवस्था में वह प्रक्रिया है जिसका कि कर्ता के लिए या सामूहिक रूप से उस समूह के कुछ व्यक्तियों के लिए प्रेरणात्मक महत्वपूर्ण होता है। पारसन्स ने इसीलिए लिखा है कि- "क्रियात्मक प्रक्रियाएँ सदैव ही कर्ता की इच्छाओं की पूर्ति या अवांछनीयताओं के पृथक्कीकरण से संबंधित तथा उनमें प्रभावित होती हैं, चाहे कर्ता के व्यक्तित्व का प्रभाव कैसा भी क्यों न हो।
पारसन्स ने सामाजिक क्रिया की विवेचना की है, इसके आधार पर उसकी निम्न विशेषताओं का निर्धारण किया जा सकता है।
(1) पारसंसय का कहना है कि सामाजिक क्रिया को एक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जा कसता है। प्रक्रिया के अभाव में सामाजिक क्रियाओं का संपादन संभव नहीं है। प्रक्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं एकीकरण करने वाली सामाजिक प्रक्रियाएँ और विभेदीकरण करने वाली सामाजिक प्रक्रियाएँ यही कारण है कि सामाजिक क्रियाएँ सहयोगी होती हैं और असहयोगी भी।
(2) सामाजिक क्रिया का मौलिक तत्व प्रक्रिया है। यदि हम इसकी विवेचना करें, तो स्पष्ट होता है कि इस प्रक्रिया के दो तत्व हैं।
(अ) कर्ता और
(ब) परिस्थिति।
कर्ता और परिस्थिति के अभाव में सामाजिक क्रिया संपादित नहीं होस सकता है। कर्ता क्रिया करता है और परिस्थिति उसे सामाजिक क्रिया करने को प्रेरित करती है।
(3) सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में कर्ता जो भी प्रतिक्रिया करते हैं, उसके परिणामस्वरूप ही सामाजिक क्रियाएँ संपादित होती है। उदाहरण (Example) पारसन्स ने सामाजिक क्रिया को समझज्ञने के लिए एक अच्छा उदाहरण दिया है। उसके अनुसार संपूर्ण समाज एक (रंगमंच की भाँति है। इन रंगमंच में सामाजिक नाटकों का प्रदर्शन होता है। इस सामाजिक नाटक व्यक्ति अभिनेता है। इस परिभाषा का तात्पर्य यह है कि व्यक्तियों की अलग-अलग परिस्थितियाँ होती हैं। इन परिस्थितियों के संदर्भ में जब कर्ता उत्तेजना स्वरूप उसी भी प्रकार की क्रिया सामाजिक संदर्भ में की जाती है तो इसे ही सामाजिक क्रिया के नाम से जाना जाता है।
यहाँ मौलिक प्रश्न यह उठता है कि क्रियाओं को संपादित करने के व्यक्ति उत्तेजित क्यों होता है? यहाँ व्यक्ति को क्रिया करने की जो उत्तेजना प्राप्त होती है, उसके दो कारण है।
(1) सामाजिक संदर्भ या सामाजिक परिस्थितियाँ, और
(2) व्यक्ति की आवश्यकताएँ।
सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में व्यक्ति जब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता है तो इसे सामाजिक क्रिया के नाम से जाना जाता है।
वार्तालाप में शामिल हों