मर्टन : सामाजिक संरचना और आदर्श-शून्यता का सिद्धांत - MERTON THEORY OF SOCIAL STRUCTURE & ANOMIE

मर्टन : सामाजिक संरचना और आदर्श-शून्यता का सिद्धांत - MERTON THEORY OF SOCIAL STRUCTURE & ANOMIE


नियमहीनता के संबंध में दुर्खीम ने सर्वप्रथम अपने विचार प्रकट किए है। मर्टन ने विशेष रूप से नियमहीनता के प्रत्यय पर कार्य किया है। इनके अतिरिक्त पारसंस, क्ल" वार्ड, डीन, सिण्डर आदि ने नियमहीनता पर प्रकाश डाला है। अब हम इन प्रमुख विद्वान के नियमहीनता के सिद्धांत का विवेचन करेंगे।


मर्टन का नियमहीनता-संबंधी सिद्धांत और विचार 


मर्टन का नियमहीनता-संबंधी सिद्धांत दुर्खीम के इस विषय पर विचार पर आधारित है। मर्टन ने सर्वप्रथम समाजवैज्ञानिक के सम्मुख यह तथ्य विशेष रूप से स्पष्ट किया कि सामाजिक संरचना का मानव व्यवहार पर विपरीत एवं अस्वस्थ प्रभाव भी पड़ता है। मर्टन के नियमहीनता के सिद्धांत के प्रमुख पक्ष का हम निम्नलिखित उपलब्ध में समझ सकते हैं:


प्राणशास्त्रीय प्रवृत्तिया और सामाजिक नियम के प्राकृतिक संघर्ष का सिद्धांत, अमान्य प्रायः अभी तक यह धारणा रही है कि मनुष्य की प्राणीशास्त्रीय प्रवृत्तियाँ और सामाजिक नियमों में प्राकृतिक संघर्ष पाया जाता है और यह संघर्ष सतत् चलता रहता है। लोगों का मत रहा है कि प्राणीशास्त्रीय प्रवृत्तियाँ या मूल प्रवृत्तियाँ स्वतंत्र रूप से स्वछंदतापूर्वक पूर्ण अभिव्यक्ति चाहती है, परंतु सामाजिक नियमों की व्यवस्था या सामाजिक संरचना इनको नियंत्रित एवं नियमित करने का प्रयत्न करती है और इन दोनों का यह संघर्ष सदैव रहता है। इसके आधार पर यह मान्यता थी कि समाज-विरोधी व्यवहार या नियमहीनता इस संघर्ष का परिणाम है। परंतु मर्टन का कहना है कि यदि यह सत्य होता तो प्रत्येक समाज में समाज विरोधी व्यवहार या नियमहीनता की प्रकृति एवां मात्रा समान होती। पर आधुनिक समाजशास्त्रीय अध्ययनों ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रत्येक समाज में समाज-विरोधी व्यवहार का प्रतिमान, मात्रा भिन्न होती है। अतः यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि समाज-विरोधी व्यवहार या नियमहीनता मानव की प्राणीशास्त्रीय प्रवृत्तियाँ और सामाजिक नियमों के प्राकृतिक संघर्ष का परिणाम है। मर्टन ने मनोवैज्ञानिक के सिद्धांत को अमान्य सिद्ध किया है।


समाज-विरोधी व्यवहार या नियमहीनता सामाजिक-सांस्कृतिक दशाओं या संरचना का परिणाम- मर्टन इस तथ्य परविशेष बल दिया है कि समाज-विरोधी व्यवहार या नियमहनता सामाजिक सांस्कृतिक दशाओं या संरचना का परिणाम है। इस सामान्य तथ्य के संदर्भ में ही मर्टन ने अपनी उपकल्पना का निर्माण किया है और नियमहीनता की व्याख्या एवं परिभाषा की है।