मर्टन की निमयहीनता-संबंधों उपकल्पना - Merton's impermanence-relationship hypothesis
मर्टन की निमयहीनता-संबंधों उपकल्पना - Merton's impermanence-relationship hypothesis
मर्टन ने अपनी उपकल्पना को स्पष्ट रूप से इस प्रकार व्यक्त किया है- “हमारा प्राथमिक उद्देश्य यह ज्ञात करना है कि किस प्रकार कुछ सामाजिक संरचनाएँ समाज में मान्य व्यवहार की उपेक्षा अमान्य व्यवहार करने के लिए कुछ व्यक्तियों पर निश्चित दबाव डालती है।"
सामाजिक संरचना के संदर्भ में नियमहीनता की व्याख्या मर्टन ने निमयहीनता की व्याख्या सामाजिक संरचना के संदर्भ में की है। मर्टन के अनुसार सामाजिक तथा सांस्कृतिक संरचनाओं के विभिन्न आवश्यक तत्वों में तत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। ये दो आवश्यक तत्त्व है- (अ) सांस्कृतिक लक्ष्य, और (ब) संस्थागत नियम सांस्कृतिक लक्ष्य वे लक्ष्य होते हैं जिनका निर्धारण संस्कृति या सामाजिक संरचना करती है। व्यक्तियों के सम्मुख समाज के सदस्यों के रूप में ये सांस्कृतिक लक्ष्य रहते हैं। समाज सामाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा समाज के सदस्यों में इन सांस्कृतिक लक्ष्यों का आंतरिकरण करता है जिसके फलस्वरूप वे व्यक्तियों के भी महत्वपूर्ण लक्ष्यों के रूप में प्रस्थापित हो जाते हैं। ये सांस्कृतिक लक्ष्य इस प्रकार के होते हैं
कि इनके लिए चाह करना उत्तम है। मर्टन ने लिखा है- "वे प्राप्त करने योग्य वस्तुएँ होती है।" ये सांस्कृतिक लक्ष्य अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं और व्यक्तियों को जीवित रहने एवं श्रम करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इनकी प्राप्ति समाज के सभी सदस्यों का इष्ट होते हैं। ये एक प्रकार से सामाजिक व्यक्तियों के साख्य होते हैं, जिन्हें प्राप्त करना उनका मुख्य ध्येय रहता है। इन सांस्कृतिक लक्ष्यों के द्वारा मानव की भावनाओं तथा अभिवृत्तियों का प्रतिनिधित्व होता है। लिंटन ने इनको सामूहिक जीवन के प्रतिमान कहकर पुकारा है। संस्थागत नियम वे नियम होते हैं जो सांस्कृति लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए समाज द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। ये नियम साधन के रूप में होते हैं जिनके द्वारा सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है। मर्टन ने लिखा है "प्रत्येक सामाजिक समूह में अनिवार्य रूप से उसके सांस्कृतिक लक्ष्यों के साथ इन लक्ष्यों की और लो जाने वाली स्वीकार करने योग्य पद्धतियों के नियम विद्यमान रहते हैं जिनकी जड़ें रूढ़ियों या संस्थाओं में होती है।" ये नियम वे साधन हैं, जो समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। इन्हीं निश्चित या अन्य प्रणालियों को संस्थाएँ कहते हैं। ये संस्थाएँ या संस्थागत नियम सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए अपनाये जाने वालों तरीकों, पद्धति एवं प्रणालियों को परिभाषित निर्धारित एवं नियंत्रित करते हैं। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के साधन संस्थागत नियमों द्वारा सीमित होते हैं। संस्थागत नियम समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं और इनके अनुसार व्यवहार करना उचित माना जाता है।
मर्टन के अनुसार सांस्कृतिक लक्ष्य और संस्थागत नियम मिलकर मानवीय व्यवहार की रूपरेखा निश्चित एवं निर्धारित करते हैं। मर्टन से यहाँ पर यह चेतावनी भी दी है कि यह आवश्यक नहीं कि सांस्कृतिक लक्ष्य और संस्थागत नियम सदैव पारस्परिक संबंध बनाए ही रखेंगें। मर्टन के अनुसार जब तक सांस्कृतिक लक्ष्य और संस्थागत नियम संबंधों का यह पारस्परिक सामंजस्य बनाएं रखते हैं, तब तक नियमबद्धता या नियम व्यवस्था बना रहता है। अनेक प्रकार की ऐसी स्थितियाँ होती हैं, जिनमें सांस्कृतिक लक्ष्यों एवं संस्थागत नियमों में यह पारस्परिक सामंजस्य नहीं रहता है। ये मुख्य स्थितियाँ निम्न प्रकार से है
(अ) कुछ सांस्कृतिक लक्ष्यों पर अधिक बल दिया जाता हो, पर उनके प्राप्त करने के संस्थागत नियमों या साधनों का अभाव हो या उपलब्ध न हो। ऐसी स्थिति में उस समाज के व्यक्ति उन सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ति संस्थागत नियमों से न करके मनमाने ढंग से करेगें। इस स्थिति में सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों में सामंजस्य नहीं रहेगा। कुछ समाज ऐसे होते हैं जिनमें कुछ सांस्कृतिक लक्ष्यों पर अत्यधिक बल दिया जात है
और उनमें इनके प्रति अत्यधिक उद्वेग उद्वेलित किए जाते हैं, पर उसी मात्रा में संस्थागत नियमों पर बल नहीं दिया जाता है। मर्टन ने लिखा है कि इस प्रकार की संस्कृतियों में तीन स्वयंसिद्ध सिद्धांत पर बल दिया जात है (अ) सब व्यक्तियों को ऊँचे लक्ष्य या महत्त्वाकांक्षाएँ रखनी चाहिए। (ब) असफलता की कोई चिंता नहीं करनी चाहिए और इन्हें अंतिम सफलता तक पहुँचने के लिए मार्ग का स्टेशन मानना चाहिए) (स) आकांक्षा को छोड़ देना या कम कर देना ही वास्तव में असफलता है। इन सिद्धांत के कारण व्यक्ति की आकांक्षाएँ बढ़ती जाती है और वह पागल बनकर इनके पीछे भागता रहता है। पाश्चात्य संस्कृतियों और विशेष रूप से अमरीकी संस्कृति के ये लक्षण है। साधनों पर इतना बल नहीं दिया गया है। इसलिए सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों का सामंजस्य समाप्त हो जाता है, जिनके परिणामस्वरूप नियमहीनता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
(ब) प्रमुख स्थितियों की अनिश्चित परिभाषाओं की स्थिति प्रत्येक समाज या सामाजिक संरचना में कुछ
निश्चित स्थितियाँ होती है और उन स्थितियों से संबंधित कार्य की परिभाषा होती है।
इनके अनुसार ही व्यक्ति कार्य एवं व्यवहार करते हैं। परंतु कभी-कभी कुछ समाजों में प्रमुख स्थितियों की निश्चित परिभाषा नहीं होती है, तो ऐसी स्थिति में नियमहीनता पनप जाती है।
(स) किसी एक सांस्कृतिक लक्ष्य पर अधिक बल को स्थिति कई बार कुछ सस्कृतियों में किसी एक
सांस्कृति लक्ष्य पर अधिक बल दिया जाता है। उसके कारण भी नियमहीनता पनपती है। मर्टन की नियमहीनता के संबंध में मुख्य विचार या परिकल्पना अथवा नियमहीनता सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों के असामंजस्य की स्थिति मर्टन ने नियमहीनता को सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत नियमों के असामंजस्य की स्थिति माना है और उसने इसे अपनी मुख्य परिकल्पना कहा है। वह लिखता है - "वास्तव में यह मेरी केंद्रीय परिकल्पना है कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से नियमहीन व्यवहार को संस्कृति द्वारा निर्धारित आकांक्षाओं और इन आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए सामाजिक संरचित साधनों के बीच असंबद्धता के रूप में माना जाता है।
नियमहीनता की परिभाषा मर्टन ने अपनी केंद्रीय परिकल्पना के आधार पर ही नियमहीनता की परिभाषा की है। वह लिखता है- “नियमहीनता सांस्कृतिक संरचना के टूट जने के रूप में समझी जाती है, जो कि विशेषतया उस समय हाती है जबकि सांस्कृतिक नियमों और लक्ष्यों तथा समूह के सदस्यों को सामाजिक संरचनात्मक क्षमताओं के बीच अत्यधिक असंबद्धता हो जाती है।
नियमहीनता के प्रकार - मर्टन ने नियम हीनता के दो प्रमुख कारणों का उल्लेख किया है - (अ) साधारण नियमहीनता, और (ब) तीव्र नियमहीनता ।
(अ) साधारण नियमहीनता साधारण नियमहीनता वह स्थिति है जिसमें समाज में अनिश्चितता की दशा होती है और मूल्यों के बीच संघर्ष पाया जाता है।
मर्टन ने लिखा है- “साधारण नियमहीनता किसी समूह या समाज के अनिश्चितता की स्थिति की और संकेत करती है जो कि मूल्य-व्यवस्थाओं के बीच संघर्ष होने के परिणामस्वरूप कुछ अंशों में व्याकुलता और समूह से पृथकता की भावना को अनुभव करती है।”
(ब) तीव्र नियमहीनता-तीव्र नियमहीनता वह स्थिति है जबकि मूल्य-व्यवस्थाएँ टूटने लगती है, मानव व्यवहार को निर्देशित करने वालों आदर्श प्रतिमानों का अस्तित्व समाप्त समाप्त होने लगता है. संस्थात्मक नियम प्रभावशाली नहीं रहते हैं, सामाजिक जीवन भयंकर रूप से अस्त-व्यस्त होने लगता है, आदि। तीव्र नियमहीनता की स्थिति में केवल मानव की आकांक्षाएँ ही सब कुछ होती हैं और मानव उन्हें मनमाने ढंग से संतुष्ट करने लगता है।
नियमहीनता के लक्षण मर्टन का मत है कि नियमहीनता के वैयक्तिक और वैषयिक दोनों लक्षणों पर ही बल देना चाहिए।
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